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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 62

From जैनकोष




यावद् स्वबुद्धया गृण्हीयात् कायवाक्चेतसां त्रयम् ।संसार तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु निर्वृति:॥62॥

जब तक यह जीव काय वचन और मन – इनको आत्मबुद्धि से ग्रहण करता है तब तक इस जीव के संसार लगा रहता है और जब यथार्थ परिज्ञान के बल से इन तीनो योगों से भिन्न अपने आपकी दृष्टि रखता है तो इसको निर्वाण प्राप्त होता है ।

काय वचन मन के क्रमविन्यास का मर्म – इस जीव को भूल भटकावे में भ्रमाने का कारण शरीर, वचन और मन का संसर्ग है । कोई पुरुष तो इन तीनों का नाम इस क्रम से लेते हैं । मन वचन और काय, और कहीं इस क्रम से नाम लिया गया है, काय वचन और मन । जैसे तत्त्वार्थ सूत्र में भी लिखा है--कायवाङ् मन: कर्मयोग: । उस श्लोक में भी यही क्रम दिया गया है काय वचन और मन । इस क्रम का कारण यह है कि दिखने में आने वाले शरीर का योग स्थूल है । उससे सूक्ष्म है वचन का और उससे भी सूक्ष्म योग है मन का । इस क्रम से शरीर वचन और मन कहना चाहिए । दूसरा कारण यह है कि इस शरीर के कहने में वचन

और मन अंगरूप में गर्भित हैं, पर वचन के कहने से काय नहीं ग्रहण में आता और मन के कहने से भी यह काय ग्रहण में नहीं आता इसलिए कम व्यापक है । वचन और मन व्याप्य है ।

अज्ञानी का मिथ्या अभेदाध्यास – यह व्यामोही प्राणी शरीर में आत्मबुद्धि बनाये हुए हैं कि यह शरीर मैं हूं । अज्ञानी नहीं सोचता है कि यह शरीर मैं हूं क्योंकि ऐसा यदि सोचे तो उसमें थोड़ा भेद तो उसने डाल लिया, यह शरीर मैं हूं । दो चीजें तो इस वाक्य में आ जाती हैं, पर अज्ञानी को दो की बात भी मालूम नहीं है । वह तो मैं हूं, ऐसा समझता है शरीर के संबंध में । अज्ञानी की भूल को ज्ञानी बता रहा है । इस कारण यह वचनरचना बनती है कि यह शरीर में आत्मबुद्धि करता है, किंतु अज्ञानी की दृष्टि में दो चीजें हैं कहां शरीर और आत्मा । वह तो मैं हूं ऐसा मानता है । ज्ञानी कह रहा है यों अज्ञानी को । अज्ञानी इस शरीर को ही यह मैं हूं, ऐसा मानता है । अज्ञानी की दृष्टि में तो शरीर ही रहता है । उसका तो वही सर्वस्व है ।

शरीरस्नेह से कष्ट होने का कारण – इस शरीर के स्नेह में कष्ट क्यों होता है ? मोटी बात तो यह है कि शरीर भिन्न वस्तु है, अत: वह अपने परिणमन से परिणमता है । यह जीव किसी भी प्रकार का परिणमन चाहता है । इसका चाहा हुआ परिणमन चेष्टा में हो जाय ऐसा तो हो ही नहीं सकता ना, तब शरीर के विरुद्ध परिणमन को देखकर यह जीव दु:खी होता है । दूसरी बात यह शरीर रोग से भरा है । इस शरीर के कारण नाना क्लेश हो रहे हैं । क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, डांस मच्छर काटे, कांटा, सूई, कंकड़ चुभ जाय । ये अनेक प्रकार की पीड़ाएँ

चलती हैं । शरीर को यह मैं हूं ऐसा मानने पर पीड़ा को भी अंगीकार कर लिया जाता है । तीसरी बात यह है कि शरीर आत्मा से भिन्न है । भिन्न पदार्थों की ओर, अर्थात् अपने से बाहर की ओर दृष्टि करने का स्वभाव ही क्लेश करने का है । बाह्य चीजों में क्या होता है और किस कारण से फिर क्लेश होता है ? यह सोचना तो दूर की बात है, किंतु अपने से बाहर अपनी दृष्टि लगाई कि वहां क्लेश होने लगता है । यों इस शरीर को अपनाने से जीव दु:खी हुआ करता है ।

संसारवृद्धि का उपाय – बहिरात्मा शरीर में ‘यह मैं हूं’ ऐसी स्वबुद्धि ग्रहण करता है । इस कारण इसका संसार लंबा होता चला जा रहा है । शरीर के मिलने का ही नाम संसार है और शरीर के मिलते रहने का उपाय है शरीर को अपनाना । शरीर को ‘यह मैं हूं’ ऐसी आत्मबुद्धि से ग्रहण करना यह है इन शरीरों के मिलते रहने का उपाय और शरीरों के मिलते रहने का ही नाम है संसार । यों शरीर को अपनाने से संसार होता है और जब शरीर में और आत्मा में भेद बुद्धि कर ली जाती है, भेदाभ्यास हो जाता है तब इसका शरीर से छुटकारा होने का वातावरण बन जाता है । अज्ञानी शरीर को स्वबुद्धि से ग्रहण करता है, किंतु ज्ञानी शरीर को पर जानकर इसकी उपेक्षा रखता है, आत्मबुद्धि से ग्रहण नहीं करता ।

विवाद का कारण वचन – दूसरा योग है वचन का । अज्ञानी पुरुष वचनों में भी आत्मबुद्धि किया करता है । जैसे जो इस मनुष्य ने बोला, वचन कहे, उन वचनों में कोई अड़चन डाले, विघात करे, अपमान करे तो यह अज्ञानी ऐसा महसूस करता कि मेरा अपमान किया गया । उन वचनों को आत्मारूप से इसने ग्रहण किया । तब वचनों के निराकरण से इसने अपना निराकरण माना । बहुत बड़ी विपदा और विडंबना की यह बात है कि इस मनुष्य के वचनों में आत्मबुद्धि रहा करती है । कोई अपमान की बात कहे, गाली दे, इसके मन के प्रतिकूल कहे तो इसे कितनी पीड़ा पहुंचती है, और उसमें अपना अपमान समझ कर यह कितना झगड़ा बना लेता है ? झगड़े की जड़ अधिकतर ये वचन होते हैं ।

बैर विवाद विस्तार का हेतु – गांव में अनेक घर हैं । सभी घर अपना-अपना कमाते हैं । खाते हैं, किसी को किसी भी पराये धन की अभिलाषा नहीं है क्योंकि ऐसा होता नहीं है कि दूसरे का धन अपने को मिल सके । ऐसी सबके मन में बात है । इसीलिए धन के कारण तो किसी पड़ौसी से दूसरे पड़ौसी का झगड़ा नहीं होता क्योंकि उसका हिसाब तो साफ-साफ है । जो आपने कमाया, आपने जोड़ा, आपने रखा । आपके नाम पड़ा, आपके कब्जे में है, वह आपका है और दूसरों के नाम जो लिखा है, दूसरों के कब्जे में है वह दूसरे का है । कोई किसी दूसरे के धन पर कभी विवाद भी करता है क्या ? आज आप इस मकान में रहते हैं तो क्या आपकी ऐसी भी इच्छा होती है कि कल हम उसके मकान में रहेंगे ? ऐसा तो आप कभी न सोचते होंगे तो धन वैभव संपदा पर विवाद नहीं खड़ा होता है, किंतु वचनों पर विवाद खड़ा हो जाता है । जिससे जिसका कोई संबंध नहीं है न धन का संबंध है, न वैभव संपदा से संबंध है, किंतु वचन व्यवहार अनुचित हो जाय तो वहां विवाद खड़ा हो जाता है । अब आप समझो कि शरीर से और धन से भी बढ़कर वचनों को कितना अपनाया है इस मोही ने । बड़ी से बड़ी विडंबनाएँ, बड़े से बड़े कलह न कुछ वचनों के कारण हो जाते हैं । जो वचन न चिपकते हैं, न लगते हैं, न जिनकी कोई शकल दिखती है वे वचन इतने विवाद के कारण बन जाते हैं कि जिसका वर्णन भी नहीं किया जा सकता है ।

युद्ध में जोशवृद्धि का उपाय – जब पहिले जमाने में युद्ध होता था तो आमने-सामने दोनों सेनाओं के सुभट खड़े होते थे, पर लड़ने की ताकत बड़े इसके लिए एक सुभट उस विरुद्ध पक्ष के दूसरे सुभट को अनापसनाप पहिले बातें करता था । क्या खड़ा है बेसुर्त, तुझे कुछ सुर्त भी है । तू तो एक कायर की भांति खड़ा है । ऐसे शब्द वह बोलता था कि जिसके बदले में उससे भी सुनने को बातें मिलें । तब लड़ने का जोश पैदा होता था । इतना वचनों का संसर्ग है, संबंध है और अपनायत है, इन वचनों की अपनायत से भी यह मोही प्राणी बड़े क्लेश सहता रहता है ।

इन वचनों को बाण की उपमा दी जाती है । जो खोटे वचन बोले, वे बाण की तरह दूसरे के मर्म को छेद देते हैं । यदि वचन बाण हैं तो मुख तो धनुष हो गया । जब कभी गुस्से में आकर कोई मुंह तानकर बोलता है तो उस समय उसके मुंह का आकार भी तना हुआ धनुष जैसा हो जाता है और उसके बीच से फिर वचन का बाण निकलता है, जिसके यह वचनबाण लग जाता है, वह फिर पागल होकर प्रतिक्रिया की बात सोचने लगता है । इन वचनों को इस मोही प्राणी ने आत्मरूप से ग्रहण किया है और इसीलिए इसका दु:ख और बढ़ता जाता है ।

मन का उत्पात – तीसरा योग है मन का । यह मन दिखता भी नहीं है, बड़ा सूक्ष्म है । दूसरे के मन का भी हम ज्ञान नहीं कर सकते हैं, इतना सूक्ष्म है यह मन, किंतु मन का जो योग है, मन की जो चेष्टा है, विचारों की जो कल्पना है, यह बड़े दु:ख का कारण बन जाता है । आज भी और पहिले भी, सदा से यह सुखिया मनुष्य, यह सुखिया जीव, जिसको खाने पीने का और सब प्रकार का अच्छा साधन लगा हुआ है, यह भी निरंतर दुखी रहता है। काहे का दुख है ? भोजन भी मिलता है, कपड़े भी हैं, आराम भी है, किंतु देखिए कि यह दुख किस बात का है ? यह सब मन का दुख है ।

भैया, इस मायामयी दुनिया में जहां कुछ रहने वाला नहीं है अथवा ये मायामयी मूर्तियां जो स्वयं मलिन हैं, पतित हैं, कर्म के प्रेरे हैं, इन मायामयी मूर्तियों में जहां यश चाहा, पोजीशन चाही, बस वहीं नाना खोटी दशायें बन जाया करती हैं और यह जीव दुखी हो जाया करता है । मन के अनुकूल बात न होने में यह कितना व्यग्र हो जाता है, जिसका क्लेश इस काय और वचन से भी अधिक है । देखिये कि स्थूलता में तो काय स्थूल है ही, वचन कम स्थूल हैं, मन उससे भी कम स्थूल है, पर क्लेश का कारण बनने में काय से बड़ा है । क्लेश का कारण वचन है और वचनों से भी बड़ा क्लेश का कारण मन है ।

मन के प्रसाद व अप्रसाद का महत्व बताने वाली कहावत – लोग तो कह देते हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। कठौती जानते हो किसे कहते हैं ? काठ की परात, जिसमें चमड़ा बनाने वाला चमड़ा भिगोकर जूते बनाता है, उसे कठौती कहा करते हैं । चर्मकार उस कठौती में बार-बार चमड़ा भिगोता है । एक कोई घटना सुनते हैं कि एक ब्राह्मण गंगा में नहाने जा रहा था तो चर्मकार ने कहा कि पंडितजी हमारे दो पैसे लेते जावो और गंगामैया को हमारे दो पैसे और ये फूल चढ़ा देना और देखो कि जब गंगा मैया हाथ निकाले, तब उसके हाथ में चढ़ाना । ऐसे ही न फेंक देना । दो पैसे और फूल उस ब्राह्मण ने ले लिए और मन में सोचा कि अरे भाई, गंंगामैया हाथ कहां निकालती है ? खैर दो पैसे और फूल ब्राह्मण ने लेकर कहा कि चढ़ा देंगे। अब वह गंंगा किनारे पहुंचा और सोचा कि दो पैसे का कुछ खाने पीने का ही ले लें और फूल फेंक दें । जब पंडितजी गंगा स्नान करके वापिस लौटे तो चर्मकार ने पूछा कि पंडितजी, हमारे दो पैसे और फूल चढ़ा आए ना ? हां चढ़ा आए । तो गंगा मैया के हाथ में ही चढ़ाया था ना ? अरे गंगामैया कहीं हाथ भी निकाला करती है क्या ? चर्मकार ने कहा यह तो तुमने ठीक नहीं किया, न हाथ निकालती गंगामैया तो न चढ़ाते ।

अब ब्राह्मण ने एक दो बातें सुनाईं तो चर्मकार कहता है कि हम तो फूल और पैसे अभी चढ़ायेंगे । गंगामैया हाथ निकालेगी तो चढ़ायेंगे, नहीं तो न चढ़ायेंगे । अब वह गंगामैया का ध्यान करके बैठ गया और कहा कि हे गंगा मैया ! मेरे ये फूल ग्रहण करो । अब गंगामैया ने उस कठौती से हाथ निकाला और फूल ग्रहण किए । ऐसा हुआ नहीं होगा और हुआ भी होगा तो कौतूहल करने वाले व्यंतर बहुत से फिरते हैं तो उनमें से किसी ने अपना हाथ निकाल दिया होगा, तभी से यह बात प्रसिद्ध है कि मनचंगा तो कठौती में गंगा ।

मन का महाक्लेश – भैया ! मन की प्रसन्नता और अप्रसन्नता का इतना बड़ा हिसाब है, सब आराम है । कोई सेठ है, करोड़पति भी है, सैंकड़ों हजारों पुरुष जिसकी हजूरी में रहा करते हैं, ऐसे पुरुष भी मन से चाह की कि बस इतने से ही दुखी हो जाते हैं । मनचाही बात किसी की पूरी फलती नहीं है, क्योंकि कोई बात फल भी जाए तो मन आगे की चाह कर बैठता है । तो वह कर्जा तो बराबर बना ही रहता है । कहां तक कमायी हो ? कहां तक बाह्यपदार्थों की पूर्ति हो ? पूर्ति हुई कि मन से फिर आगे की बात की चाह करी । इस प्रकार मन का क्लेश भी बहुत बड़ा क्लेश होता है ।

मन के क्लेश का एक दृष्टांत – एक गरीब ब्राह्मण राजा के पास गया और कहा कि महाराज ! हमारी कन्या की शादी है, सो कुछ अच्छी तरह से हो जाय, सो ठीक है । राजा ने कहा कि जावो, तुम कल जो मांगोगे सो दिया जाएगा । अब वह बड़ा खुश होता हुआ घर आया और एक खरेड़ी खाट पर लेट गया । उसे नींद न आए । रोज वैसे ही लेट जाता था, और नींद आ जाती थी, पर उस रात नींद न आयी । सोचा कि कल मैं राजा से क्या मांगू ? हो न हो 100 रु.. मांग लें । उस गरीब के दिमाग के लिए 100 रु. बहुत थे । फिर सोचा कि 100) तो अमुक के पास हैं, वह भी सुखी नहीं है, तो हजार मांगू । अरे हजारपति तो अमुक भी है, वह भी सुखी नहीं है तो लाख मांगू । अरे अमुक लखपति है, वह भी सुखी नहीं है । न हो तो करोड़ मांगू । अरे अमुक सेठजी भी तो करोड़पति हैं, वह भी तो सुखी नहीं है । फिर मन में आया कि राजा से आधा राज्य मांग लूं । अरे आधा शासन तो हमारा चलेगा और आधा राजा का चलेगा, लेकिन लोग यह कहेंगे कि इसका आधा राज्य मांगा हुआ है । न हो तो पूरा ही राज्य मांग लूं।

अब आया प्रात: और प्रभुभजन का समय हुआ । अब वह प्रभु का भजन करते हुए में सोचने लगा कि अरे राज्य में क्या सुख है ? देखो कि राजा भी तो दुखी है, इन्हें रात दिन चैन भी न आती होगी । जैसे आजकल के राजावों को देख लो । अब सोचा कि राज्य लेने में तो बहुत ही बड़ी विडंबना है । करोड़ मांगू क्या ? नहीं नहीं, करोड़ भी लेने ठीक नहीं हैं । लाख मांगू ? अरे लाख भी मांगना ठीक नहीं है । हजार ही ठीक हैं, अरे हजार भी ठीक नहीं हैं । 100 रू. ही अच्छे हैं । लो 100) से शुरू किया था और 100) पर ही आ गया । अचानक ही राजा वहां से निकला और राजा ने कहा कि कहो विप्रदेव ! क्या चाहते हो तुम अपनी कन्या की शादी के लिए ? सो वह हाथ जोड़कर बोला कि महाराज माफ करो । जब हमने आपसे कुछ मांगा न था, तब तो नींद नहीं आयी और जब आपसे मांग लूंगा तो न जाने मेरा क्या हाल होगा ? तो राजन् माफ करो, हम जिस स्थिति में हैं, उसमें ही भले हैं ।

देहविविक्तता का दर्शन -- भैया ! मन की विडंबना देखो कि बड़े ही आराम के साधन हैं, तब भी यह मोही जीव सुखी नहीं रह सकता है । यों शरीर, वचन और मन, इनको जब तक यह जीव आत्मबुद्धि करके ग्रहण करता है, तब तक इसका संसार और लंबा होता है और जब इन तीनों से भिन्न ज्ञानस्वरूपमात्र अपने आपका आश्रय लेता है । इस आश्रय के प्रताप से मोक्षमार्ग प्रकट होता है और निकट भविष्य में समस्त संकटों से इसे मुक्ति मिल जाएगी । अत: हम सब कल्याणार्थियों को चाहिए कि काय, वचन और मन से अपने को विविक्त ज्ञानमात्र निरखें ।


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