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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 7

From जैनकोष



बहिरात्मेंद्रिय-द्वारैरात्मज्ञान-पराङ्मुख:।

स्फुरित- स्वात्मनो देहमात्मत्वेनाध्यवश्यति।।7।। त्रिविध आत्मा के स्वरूप के विवरण में क्रम―बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा इन तीनों को बताने के प्रकरण में सबसे पहिले परमात्मा का लक्षण किया, क्योंकि परमात्मा के संबंध में थोड़ा ही कहना था। बनना है परमात्मा। उसका उपाय है अंतरात्मा होना, इसलिए अंतरात्मा का वर्णन बहुत अधिक होगा और बहिरात्मा का जो वर्णन किया जाता है उस से भी अधिक होगा। बहिरात्मा का वर्णन परमात्मा से कुछ अधिक किया जायेगा। इस क्रम के अनुसार अब बहिरात्मा का लक्षण किया जा रहा है, बहिरात्मा की विशेषता बतायी जा रही है। बहिरात्मा की वृत्ति―ये बहिरात्मा जीव इंद्रियों के द्वार से बाहर की ओर उपयोग दौड़ाता है और आत्मज्ञान से परांगमुख हो जाता है और विषयों में स्फुरित होता है, जागरूक, सावधान, सजग रहता है और इस पद्धति से यह मिथ्यादृष्टि जीव अपने देह को आत्मरूप से निर्णय कर लेता है। लोग तो इन इंद्रियों से बड़ी प्रीति करते हैं क्योंकि उनके जानने का साधन इंद्रियां हैं, उनके आनंद का साधन इंद्रियां हैं, किंतु ये इंद्रिय साधन ज्ञान के परमार्थत: बाधक हैं और इंद्रियां आनंद के साधक नहीं हैं, परमार्थत: आनंद के बाधक है। इंद्रिय द्वारों की प्रतिबंधकता―जैसे एक कमरा है, उसमें चार, पाँच खिड़कियाँ हैं, उन खिड़कियों के अतिरिक्त सब जगह भींत ही भींत बनी हुई है, अब उस कमरे में रहने वाला व्यक्ति उन खिड़कियों के द्वार से देख सकता है। सो वह व्यक्ति भले ही ऐसा माने कि इन खिड़़कियों ने मुझे बाहर की बात दिखा दिया। वे खिड़कियाँ साधक हैं या बाधक ? परमार्थत: उसे ज्ञान होना था सब ओर से किंतु भींत का आवरण होने से अब वह केवल खिड़कियों से ही देख सकता है। यदि ज्ञान का साधन होती तो भींत और खिड़कियाँ मिट जाने पर फिर ज्ञान न होना था। सो इसी तरह ये अंग इस देह के कमरे की भींतें हैं। इस कमरे के भीतर कोई पुरूष पड़ा हुआ है और वह इस स्थिति में इंद्रिय के द्वार से ही जान सकता है, वस्तुत: इसमें जानने का स्वभाव सर्व ओर से है।

खंडज्ञान के विचित्र द्वार―देखो भैया ! कैसी विचित्र खिड़कियाँ हैं ये कि कान के द्वार से हम शब्दों की ही बात जान सकेंगे, नेत्र के द्वार से रूप रंग की बात ही जान सकेंगे और कुछ नहीं जान सकेंगे। घ्राण से गंध ही, रसना से स्वाद ही और स्पर्शन इंद्रिय से स्पर्श ही जान सकेंगे। नर इसमें कैद पड़ा हुआ है। कहां तो यह ज्ञानमय भगवान् आत्मा जो अपने स्वरूप के कारण ही समस्त विश्व का ज्ञाता हुआ करता है और कहां यह बंधन, कहां यह कारागार जैसे कैदखाना। इस देह से यह कैसा बँधा हुआ है जो जंगल के शेर में होता है। इसी तरह हम आप इस देह के कटघरे में बंद हैं, पर शौर्य स्वभाव हम आपका वही है जो प्रभु का है पर बंधन ऐसा बँधा हुआ है कि यह आत्मा इंद्रिय के द्वार से जानता है, सो क्या हानि है इससे इसे परखिये।

प्रतिबंध में तृष्णा की उत्कटता―भैया ! कुछ प्राकृतिक बात ऐसी है कि रूकावट के साथ जानता हो तो उसमें तृष्णा बढ़ती है और बिना रूकावट के जानना हो तो उसमें तृष्णा नहीं होती है। जैसे किसी बच्चे को ऊधम करने से रोको तो उसकी हठ ऊधम करने की ही होगी और उससे कहो कि करो खूब ऊधम और ज्यादा ऊधम करो तो उसकी चाल में फर्क पड़ जायेगा। बच्चे को कहीं जाने की इच्छा हो और बहुत रोवे और अपन उसे वहीं रोके रहें तो उसकी यह आंतरिक इच्छा बनेगी कि हमें तो जाना ही है और उसे रूकावट न हो तो थोड़ा चलकर लौटकर वहीं रमेगा। इंद्रिय द्वार से जानने के कारण उसके ज्ञान में और धैर्य में रूकावट होती है। ऐसी स्थिति में जब वह थोड़ा कुछ जानता है तो जानने की तृष्णा होगी, कुछ सुख पाया है तो वहाँ सुख भोगने की तृष्णा होगी। भगवान् सर्वज्ञदेव समस्त लोक अलोक द्रव्यगुण पर्याय त्रिकालवर्ती समस्त दशावों को जानते हैं। इस कारण उन्हें कोई प्रकार का खेद नहीं होता है। खेद मानते हैं कम जानने वाले। सर्व कुछ जानन में आ गया, अब खेद किस बात पर हो और सर्व कुछ जानन में आ गया तो आवश्यकता किस बात की ? फिर वह प्रभु निराकुल, शांत, बीततृष्ण हो जाता है।

इंद्रियों की प्रीति और मिथ्या आशय―यह बहिरात्मा इंद्रियों से प्रीति किए हुए है। क्यों न करे प्रीति ? इसको यह भ्रम हो गया है कि मुझे जितना सुख होता है वह इन इंद्रियों के कारण होता है। इस जीव से मुझे बड़ा सुख ही सुख हुआ करता है। मनमाना आम चखें और नाना व्यंजन खावें बड़ा स्वाद आता है, मौज मानते हैं। पर यह जगत गोरखधंधा है। इस सुखाभास में उलझे तो इसे क्लेश ही क्लेश है। इस सुखाभास से मुख मोड़े और अंतर में मैं आनंदस्वभावी हूँ ऐसी पहिचान करे तो इस जीव को अनुपम आनंद प्रकट हो। पर मोह का ऐसा भूत नाच रहा है कि हम सब संसारी जीव गम नहीं खाते हैं। मरण के बाद सब छूट जायगा मगर जीवनकाल में इतनी भी भावना नहीं ला पाते कि ये सब छूट जायेंगे। इतना तक भी ख्याल करने के प्रमादी हो रहे हैं। यदि इतना भी ध्यान में हो कि यह सारा बखेड़ा छूट ही जायेगा। तो इस भावना में भी बहुत सी निराकुलता जग जायगी। पर यों ध्यान जाता है कि छूटता है दूसरों का, हमारा क्यों छूटेगा ? ऐसी कुछ कल्पना लिए हुए हैं, अपने आपको मृत्यु पर विश्वास ही नहीं बनता है। अपने आपकी अनिष्ट बात पर विश्वास ही नहीं आता है। मरते हैं तो कोई दूसरे मरा करते हैं। ऐसा उल्टा देखने की चश्मा पाटी लगा रखी है।

क्लेश का कारण उद्दंडता―ये बहिरात्मा जीव इन इंद्रियों के इतने अधीन हैं कि आत्मज्ञान से ये बिल्कुल विमुख हो रहे हैं। इस जीव का अकल्याण है देह की वांछा और विषयों का उपद्रव। तीसरा कोई क्लेश नहीं है। देख लो यह सबसे न्यारा है, ज्ञानादिक गुण संपन्न है, मेरा है यह कभी छूट नहीं सकता। जो मेरा है नहीं, वह मेरा कभी हो नहीं सकता। कौनसा क्लेश है ? हम आपको बतलावें, पर क्लेश सभी माने हुए बैठे हैं। अभी यह नहीं हुआ, अभी इतना कमती रह गया है। अच्छा धन कम हो जायगा तो उससे क्या बिगाड़ हो जायगा सो बतलावो। आज यह वांछा है कि एक लाख हो जाये तो हम धनी हो जायें। तो क्या यह आशा की जा सकती है कि एक लाख हो जाने पर फिर आगे तृष्णा न रहे या आकुलता न रहे। जितना वैभव होगा उसकी व्यवस्था में उतना ही मन चलता होगा, उतनी ही दौड़धूप होगी।

यथार्थज्ञान व अज्ञान की करामातें―भैया ! जो यथार्थ निर्णय कर के लौकिक संपदा को पुण्योदय पापोदय पर छोड़ते हैं उनसे तो व्यवस्था सहज बनती है और जो कर्तृत्वबुद्धि किए हुए हैं―मैं करता हूँ तो होता है ऐसा, मैं न करुँ तो कहां से परिवार का पोषण हो ? दूसरे जीवों से भाग्य का भरोसा नहीं, इस कारण कर्तृत्वबुद्धि बनाए हुए है। सो पता नहीं कि मालिक बन रहे हैं या चाकर बन रहे हैं। कल्पना तो यह बन रही हैं कि मैं घर का मालिक हूँ और करतूत में यह बात है कि घर के उन 5, 7, 10 आदमियों का यह चाकर बन रहा है। उनके पुण्य का उदय है सो उन्हें भी तो सुख मिलना चाहिए। उनके सुख में कोई न कोई निमित्त तो होना ही चाहिए सो वह निमित्त होता है, अथवा न कोई मालिक है, न कोई चाकर है। सबका अपने-अपने भवितव्य के अनुसार सब हो रहा है। कर्तव्य तो अपना यही है कि जो बात दुर्लभ है अन्य भवों में नहीं की जा सकती है ऐसा काम कर जाय तो भला है। विषयों का पोषण और कषायों में गुजारा करना यह तो अन्य भवों में भी होता है। होता है उन भवों में उन जैसा तब बात तो एक ही है। यदि उन विषयों में ही प्रवृत्ति रही तो मनुष्य हुए न हुए बराबर ही तो रहा। कुछ अंतर भी है क्या ?

नश्वर जीवन में सर्वोत्कृष्ट लाभ–अहो, दमादम क्षण बीते जा रहे हैं। जैसे पर्वत से गिरने वाली नदी वेगपूर्वक बही जा रही है तो उसका पानी उलटकर नहीं जाती, इसी तरह आयु के क्षण दमादम बीते जा रहे हैं। कभी भी यह नहीं हो सकता कि जो एक साल व्यतीत हो गया है वह एक साल वापिस हो जाय, ऐसा नहीं हो सकता। समय गुजर रहा है अपनी रफ्तार से। मृत्यु के निकट रोज ही रोज पहुंच रहे हैं। अगर 60 वर्ष जीना है और आज 40 वर्ष के हो गए तो अब 20 वर्ष ही तो मृत्यु के निकट हैं। और 41 वर्ष के हो गए तो 19 वर्ष ही तो मृत्यु के निकट हैं। ऐसा होते-होते कभी एक दिन वह भी निकट आ जायेगा और कभी मृत्यु भी हो जायेगी। इस नश्वर जीवन में सर्वोत्कृष्ट लाभ लो। सर्वोत्कृष्ट वैभव है अपने आपके ज्ञानानंद स्वभाव का जो कि निर्विकल्प है, आनंदघन ज्ञान से निर्भर है। उसका परिचय होना, दर्शन होना ऐसा जो गुप्त अपने आपमें अपना कार्य है उससे बढ़कर दुनिया में और कोई कार्य नहीं है।

कैवल्य की महानीयता–हम तीर्थंकरों को पूजते हैं और भी श्रीराम हनुमान जी आदि जो भी मुक्त हुए हैं उनको भी पूजते हैं, क्या है उनके पास घर भी नहीं रहा, कुटुंब भी नहीं है, वैभव भी नहीं है और फिर भी हम पूज रहे हैं तो कुछ तो बात होगी। कुछ क्या उनमें सारी बात है। वे ज्ञान और आनंद की महिमा त्यों-त्यों प्रकट होती है ज्यों-ज्यों इस जीव के आकिंचन्य भाव बढ़ता जाता है। मैं देह से भी न्यारा ज्ञानमात्र हूँ। ऐसे ज्ञानतत्त्व की उपासना से अपने आप में निर्मलता बढ़ती है, कर्मभार कम होता है और जो यथार्थ ज्ञान है, यथार्थ आनंद है उसमें प्रवेश होता है।

इंद्रियों की प्रीति का कारण–बहिरात्मा जीव इन इंद्रियों से इस देह से अपनी प्रीति बनाए हुए है। जरा सा भींत की कलई का दाग तो हाथ में लग जाय उसे छुटाए बिना, और ज्यादा नवाब साहब हों तो साबुन से धोये बिना चैन नहीं पड़ती है। हालांकि ये भी बातें होती रहो, किंतु भीतर की रूचि की बात देखो। देह और इंद्रिय से न्यारा और कुछ मैं हूँ ही नहीं, ऐसी धारणा लिए हुए यह बहिरात्मा इंद्रिय के द्वार से देखता है, जानता है इस कारण इंद्रियों में ही प्रेम बढ़ाता है और अतिंद्रिय निर्विकल्प जो अपना स्वभाव है ज्ञानानंद, उसकी दृष्टि नहीं करता है।

बहिरात्मत्वदृष्टि–बहिरात्मत्वदृष्टि में फल यह होता है कि जैसे कुत्ता हड्डी चबाता है तो हड्डी में कुछ दम नहीं है, हड्डी सूखी है लेकिन चबाने में खुद के मसूड़े फूट जाते हैं और उसका खून स्वाद में आता है तो कुत्ता मानता यह है कि यह स्वाद तो हड्डी से आया। सो वह उस हड्डी की रक्षा करता है। एकांत में जाता है, दूसरे कुत्ते से लड़ता है कहीं यह छुड़ा न ले जाय। यों ही बहिरात्मा जीव को जो सुख मिल रहा है वह विषयों में नहीं मिल रहा है किंतु स्वयं का जो आनंदस्वभाव है उसके उपभोग से सुख मिल रहा है पर मानता यह है कि मुझे विषयभूत पदार्थों से सुख मिल रहा है। सो उनके संचय में, उनकी रक्षा में, उनको एकांत में सुरक्षित रखने में इसका उपयोग जाता है और दुःखी रहा करता है।

रोगपरिचयपूर्वक चिकित्सा–भैया ! यह बहिरात्मा की दशा बतायी जा रही है। जैसे पहिले रोगियों को रोग बताया जाता है दवा पीछे बतायी जाती है। रोगी लोग इसे जानते हैं कि रोग का पहिले निर्णय हो जाय कि वैद्य महाराज ठीक कहते हैं, इन्होंने हमारे रोग को समझ लिया है। तो वैद्य पूछता है कि तुम्हारे पेट में अफारा रहता है कि नहीं ? अरे अफारा तो सर दर्द में रहे, पेट दर्द में रहे, अन्य रोगों में रहे (हँसी)। तो पहिले यह रोग बताया जाता है, पीछे इलाज बताया जाता है, ऐसे ही आचार्यदेव पहिले रोग बता रहे है कि देखो ऐसी बात है कि नहीं। यह मोही जीव इंद्रिय द्वार से जानता है, देखता है और बाहर को भागता है, अपने को रीता रखता है, आत्मज्ञान से विमुख हो जाता है, विषयों में उलझा रहता है। ऐसा प्राणी देह को ही मानता है कि यह मैं हूँ। और भी विशेषरूप से यह जीव अपनी देह में कैसी आत्मीयता रखता है ? इस विषय में अब आगे कहा जायेगा। बहिरात्मा जीव अपने आपको किस-किस प्रकार मानता रहता है, इस विवरण को दो श्लोकों में बताया जा रहा है।


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