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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 8

From जैनकोष



नरदेहस्थमात्मानमविद्वान् मन्यते नरम् ।तिर्यंचं तिर्यगंगस्थं सुरांगस्थं सुरं तथा।।8।।नारकं नारकांगस्थं न स्वयं तत्त्वतस्तथा।अनंतानंतधीशक्ति: स्वसंवेद्योऽचलस्थिति:।।9।।

व्यामोह से आत्मा में नरत्व की मान्यता–बहिरात्मा पुरूष मनुष्य के शरीर में स्थित आत्मा को मनुष्य मानता है। नरदेह जड़ है, आहार वर्गणावों के स्कंधों का पिंड हैं और यह आत्मा चेतन है, ज्ञान दर्शन स्वभावी है, ऐसा अत्यंत भिन्न है, फिर भी चूंकि उपाधि के वश शरीर के साथ बंधन लगा हुआ है ऐसी स्थिति में बहिरात्मा पुरूष मनुष्य देह में रहने वाले आत्मा को समझता है कि यह मनुष्य है। मनुष्य पर्यायें जीव, कर्म व शरीर ऐसे अचेतन की पिंडरूप पर्यायें हैं, इन्हें असमानजातीय द्रव्यपर्यायें कहते हैं। शरीर मैं नहीं हूँ, शरीर में अनुभव नहीं होता है, मुझमें अनुभव होता है। ऐसा प्रकट जुदा हूँ, फिर भी मोही जीव देह से भिन्न आत्मा का परिचय नहीं पा सकता और यह मानता है कि मैं मनुष्य हूँ।

आये थे हित काम को धोने लगे हैं चाम–जहां मनुष्य शरीर में आत्मा की बुद्धि की, शरीर को आपा माना तो फिर शरीर के पोषक शरीर के संबंधी इन सब जीवों को भी अपना मानने लगा। इस जीव ने अपने स्वरूप की दृष्टि को त्याग दिया और अचेतन पदार्थों से यों कहिए सिर मारने लगा-जैसे कहते हैं ना कि ‘आये थे हित काम को धोने लगे हैं चाम।’ इस मनुष्यभव में जन्म तो इसलिए हुआ कि अन्य अनेक भवों में इस जीव को उद्धार का अवसर नहीं मिलता। एक मनुष्यभव ही संसार-संकटों से छुटकारा पाने का अवकाश देता है। सो पा तो लिया मनुष्यभव, किंतु विषय कषाय मोह राग इनमें ही समय बिताया। आये थे प्रभुभजन को और धोने लगे हैं चाम। शरीर की परवाह करने लगे हैं, इसको देखकर फूले नहीं समाते हैं।

बाहरी ममता–देखो भैया ! कैसी ममता है, बूढ़े भी हो जायें, कपोल भी सूख जायें, हड्डी भी निकल आयें, फिर भी अपना यह शरीर ही प्रिय लगता है। एक तो शरीर की वेदना नहीं सही जाय यह बात अलग है और शरीर में ही आपा समझकर उसमें प्रीति बुद्धि की जाय, यह बात जुदा है, जैसे कोयला को कितना ही घिसो निकलेगा काला ही काला। साबुन लगा दो तो कोयला सफेद नहीं हो जायेगा, ऐसे ही शरीर है, कितना ही इसे सजावो, कितना ही साफ करलो, इसमें असार ही असार बात निकलेगी। अपवित्र गंदी-गंदी ही धातु उपधातुयें निकलेगी। किंतु वाह रे मोह की लीला कि इस निज सहजस्वरूप को तो यह आत्मा भूल जाता है और देह ही सार सर्वस्व है ऐसा मानने लगता है।सकलसंकटों का मूल–सारे संकट इस बात पर आए हैं कि इसने देह को आत्मा माना है। दुनिया में सम्मान अपमान, प्रशंसा निंदा, पोजीशन, तृष्णा ये सब भी शरीर को आत्मा मानने के विकल्प पर चलते हैं। जितने भी संकट हैं सर्वसंकटों का मूल देह को आत्मा मानना है। ये बहिरात्मा जीव अपने को मान रहे हैं कि मैं मनुष्य हूँ। मनुष्य कितने प्रकार के होते हैं ? शरीरों की कितनी विभिन्नता है कि सूक्ष्म स्थूल भेद करके शरीरों की जातियां 12 लाख, करोड़ हो जाती हैं। जो जीव जिस देह में जाता है उस देह में ही इसकी ममता जग जाती है, यों ही जब यह तिर्यंच की देह को धारण करता है तो अपने को तिर्यंच मानने लगता है।पर्यायव्यामोह–एक कथा प्रसिद्ध है कि राजा ने मुनि से पूछा कि महाराज मैं मर कर क्या बनूंगा ? मुनि अवधिज्ञानी थे। सो उन्होंने बताया कि तुम अमुक दिन इतने बजे मरोगे और अपने घर के संडास में कीड़ा बनोगे। राजा को बड़ा खेद हुआ। कहां तो मैं राजा, लोग हजूरी में आते हैं। इतना मेरे ऐश्वर्य हैं और कहां मरकर मैं मलकीट बनूंगा, तो पुत्रों को हुक्म दिया कि देखो इतने समय पर अमुक दिन अमुक स्थान पर मैं मरकर मलकीट बनूँगा सो तुम हमें वहाँ आकर मार डालना क्योंकि वह बहुत बुरी पर्याय है। वह राजा मरकर उसी स्थान पर मलकीट हुआ, पुत्र पहुंचा उस कीट को मारने के लिए तो वह कीट डर के मारे मल में ही घुस गया। तो राजपुत्र जाकर मुनि से पूछता है कि महाराज मेरे पिता यों कह गए थे, सो मैं वहाँ मारने पहुंचा तो वह कीट जान बचाकर मल में घुस गया। मुनि कहता है कि जगत् के मोही जीवों की ऐसी ही परिस्थिति है। वह जिस देह को धारण कर लेता है उस देह में ही रम जाता है। गधा सूकर और भी निंद्य पशु कौवादिक पक्षी बन गया तो यह अपने ही शरीर से प्रीति करने लगता है।

मोहियों का व्यामोह–भैया ! जो काम बड़े मोही प्राणी कर रहे हैं वही काम गधा सूकर भी कर रहे हैं। विषयों का सेवन करना और शरीर में आपा मानकर मस्त बने रहना यह काम सूकर भी करते हैं, यह काम मनुष्य भी करते हैं, यही काम संसार के अनेक जीव करते हैं। कोई मन वाले तिर्यंच हैं तो वे भी सोच समझ सकते हैं–मैं यह हूँ। कोई मन वाला नहीं है तो वह संज्ञियों की तरह विकल्प नहीं कर सकता। फिर भी शरीर में आपा मानता है। एकेंद्रिय पेड़ आदि ये भी अपने शरीर को आत्मा मानते हैं। जितना उनमें ज्ञान है उसके अनुसार वे अपनी देह में ही आसक्त हो रहे हैं। जिस भव में जाता है उस ही भव के अनुसार इस जीव की प्रकृति बन जाती है। आज मनुष्य है सो पलंग में गद्दा बिछाकर सोते हैं और आसपास सुहावनी वस्तुयें भी लगा लेते हैं और मरकर गाय बैल हो गए तो जैसी जमीन मिली, गोबर मिट्टी, कीचड़ से भरी उसी में पड़ गए। पर पर्याय ऐसी हैं कि वहाँ भी इसी तरह रम जाते हैं।व्यामोह से आत्मा में तिर्यंचरूप की कल्पना–यह बहिरात्मा जीव कैसा परतंत्र और दीन बन रहा है अपने आपके स्वरूप की संभाल के बिना तिर्यंच की देह में पहुंचता है तो यह जीव अपने को तिर्यंच मानता है। न शब्दों से माने, पर जो देह धारण किया सद्​रूप ही अपने को मान डालता है। भ्रम का क्लेश बहुत बड़ा क्लेश होता है। भ्रम में कुछ सूझता ही नहीं है। रागद्वेष में तो फिर भी अक्ल ठिकाने रहती है किंतु मोह में, भ्रम में मिथ्यात्व में बुद्धि ठिकाने नहीं रहती है।अगृहीत व गृहीत मिथ्यात्व–ये सब अगृहीत मिथ्यात्व की बातें चल रही हैं। कुगुरू, कुदेव, कुशास्त्र को देव, शास्त्र, गुरु मानना यह सब है गृहीत मिथ्यात्व। जिन जीवों के गृहीत मिथ्यात्व है उनके अगृहीत मिथ्यात्व तो है ही, पर ऐसे भी जीव बहुत से हैं कि जिनके अगृहीत मिथ्यात्व तो है और गृहीत मिथ्यात्व नहीं है। देह और जीव को एक माने यह है अगृहीत मिथ्यात्व। इसके वश अज्ञानी जीव परतंत्र हो रहे हैं। कुगुरू, कुदेव, कुशास्त्र को गुरु मानना यह सिखाई हुई बात है, दोस्त सिखा दें, माता पिता सिखा दें, सिखाई हुई बात है पर शरीर को आपा मान लेना यह किसी की सिखाई हुई बात नहीं है, इसमें यह प्रकृत्या चल रहा है।भव की अनुसारिणी प्रवृत्ति–यह बहिरात्मा जीव तिर्यंच के शरीर में पहुंचता है तो यह अपने को तिर्यंच मानने लगता है। कैसी-कैसी विलक्षण दशाएँ हो जाती हैं। जीव यही एक है। आज मनुष्यभव में मनुष्य जैसा शरीर मिला और मरकर हो गए साँप गुहेरे छिपकली तो उन जैसा ढांचा उन जैसा चलन फिरन, सब वैसी ही बातें हो जाती हैं। भैया ! अपन ने यहाँ कोई ऐसी महत्त्व की चीज नहीं पा ली है धन वैभव समागम परिचय जिनमें कि आसक्त रहा जाय, मस्त रहा जाय। ये जितने काल हैं उतने काल भी भिन्न हैं और वियोग तो होगा ही। जिनको समझते हैं कि मेरे घर के हैं उनके अर्थ तो तन, मन, धन, वचन जो कुछ भी पाया है सब स्वाहा कर देता है और यह खुद बन जाता है रीता का रीता ही।नश्वर समागम का सदुपयोग–भैया ! यहाँ तो यह सब मुफ्त ही मिला और मुफ्त ही जायेगा। विवेकी पुरूष वह है कि मुफ्त मिला है तो इसका सदुपयोग कर जाय। जिनमें मोह है ऐसे मोही पुरूषों में अपना धन खर्च करता जाय तो यह उदारता नहीं है और लोभ का त्याग नहीं है किंतु जिनसे संबंध नहीं है उन दीन दुःखी गरीबों के लिए कुछ व्यय हो अथवा जीवोद्धार धर्म के कोई काम हों और उनमें व्यय हो तो समझो कि मुफ्त मिली हुई चीज का हमने सदुपयोग किया।सत्​कर्तव्य की प्राथमिकता–एक मनुष्य को एक वर्ष को तो लिखे गये भाग्य में अच्छे दिन, संपदा मिले, भोग मिले, आराम मिले, और मान लो कि 59 साल को मिले दुःख के दिन। तो मिल जाने दो, अगर बुद्धिमानी से काम लिया तो वह यह करेगा कि पहिले सुख का वर्ष मांग लेगा, बाकी वर्ष फिर बितायेगा। सुख के वर्ष में विषयों की आकांक्षा न रखकर तप, दान, संयम, त्याग परोपकार सेवा इनमें ही व्यतीत करेगा। ऐसी विशुद्ध करनी से पापकर्मों का संक्रमण हो जायेगा और बाकी वर्ष भी उसके अच्छे गुजर जायेंगे। वर्तमान परिणाम संभाला तो समझ लीजिये कि हमने अपना सारा भविष्य संभाल लिया। बने रहने दो पापकर्म भव-भव के बाँधे हुए, कुछ हर्ज नहीं है। किंतु वर्तमान में परिणाम निर्मल हों, शुद्ध ज्ञान भावना हो तो उसके प्रसाद से सर्व पाप कर्म दूर हो जाते हैं।ज्ञानकला–जैसे कोई समर्थ अधिकारी है और दूसरे लोग गड़बड़ करें तो वह देखता रहता है। क्या हर्ज है, करने दो। जिस समय चाहेगा उसी समय वह मिटा सकता है। यों ही इस ज्ञानी जीव के भी पूर्वभवों के बाँधे हुए पापकर्म इकट्ठे हैं, तो रहने दो। जान रहे हैं ज्ञानी कि ये पृथ्वी पिंड के समान हैं। यदि वर्तमान में निर्मल परिणमन हो तो उन कर्मों में भी फेर हो जायेगा। इससे इन सर्व संकटों से बचने का उपाय मात्र आत्मा को आत्मस्वरूप से परख लेना है।मूल भूल पर भूल के पूल–यह व्यामोही आत्मा तिर्यंच की देह में पहुंचता है तो अपने को तिर्यंच मानता है, देव के शरीर में पहुंचता तो अपने ही देव मानता है। यह सुधि भूल जाता है कि मैं परमार्थ सत् अखंड अव्याबाध एक चेतन तत्त्व हूँ। मूल बात भूल जाने पर फिर ऊपर की जितनी क्रियाएँ होती हैं वे सब भूल वाली होती है। जैसे औंधी डेगची धर देने पर 5, 7 डेगची धरें तो औंधी ही धरी जायेंगी और सीधी पतीली रखने पर सीधी ही उसके ऊपर धरी जावेंगी। ऐसे ही मूल में सम्यग्ज्ञान होने पर जो हमारी वृत्ति होगी वह सब भूलभरी होंगी। तो देह को आपा मान लेना यह सबसे बड़ी भूल है और इस भूल के होने पर फिर सारी विडंबनाएँ लग जाती हैं।अपूर्व कार्य के लिए प्रेरणा–भैया ! सभा सोसाइटियों में इज्जत पाने की गोष्ठी में अपने आपकी पोजीशन बढ़ाने आदिक में जैसा श्रम किया जाता है, हित माना जाता है। तो जहाँ पचासों काम कर डाले हित के ख्याल से वहाँ एक काम यह भी तो करके देखो कि अपने सहजस्वरूप को परमार्थ जानकर बाह्य विकल्पों को त्याग दें और परम विश्राम से स्थित हो जायें, ऐसी स्थिति में जो आनंद प्रवाह बढ़ेगा उस अनुभव के बल पर इसे सम्यक्त्व होगा, चारित्र बढ़ेगा व मोक्षमार्ग में चलेगा। इसके सब संकट अब दूर होने का समय आ गया ऐसा जानना चाहिए।बहिरात्मवृत्ति प्रदर्शन–यहां बहिरात्मावों की वृत्ति दिखाई जा रही है कि वे यह करते क्या हैं ? जिस देह में पहुंचा, जिस भव के शरीर में पहुंचा उस भव के शरीररूप ही यह अपने को मानने लगता है और ऐसा मानने पर इस पर सर्वसंकट छा जाते हैं। अब बहिरात्मा की प्रवृत्ति में और आगे जो शेष रहा है इसी प्रकार से उसे कहेंगे।नारकत्वव्यामोह–पर्याय व्यामोही, अज्ञानी पुरूष जिस जिस पर्याय में पहुंचता है उस उस पर्याय को आत्मारूप से मानता हैं। जब यह नारकी के शरीर में पहुंचता है तो नारक देह में रहने वाले अपने आत्मा को यह नारकी मानता है। नारकी जीव नीचे सात पृथ्वियों में रहा करते हैं और उन पृथ्वियों के मध्य में हजारों लाखों मील के लंबे चौड़े बिल हैं। जिस जमीन पर हम आप रहते हैं यह एक पृथ्वी है। इस पृथ्वी के नीचे तीन हिस्से हैं। तो ऊपर के दो हिस्सों में भवनवासी और व्यंतर के देव रहते हैं, तीसरे में नारकी रहते हैं। उसके नीचे कुछ आकाश छोड़कर एक पृथ्वी और लग गयी है उसमें दूसरे नरक के नारकी रहते हैं। फिर उससे नीचे कुछ आकाश छोड़कर तीसरी पृथ्वी है, उसमें चौथा नरक है, फिर कुछ आकाश छोड़कर चौथी पृथ्वी है उसमें चौथा नरक है, फिर कुछ आकाश छोड़कर 5 वीं पृथ्वी है उसमें 5 वां नरक है। फिर कुछ नीचे नीचे कुछ आकाश छोड़कर छठी पृथ्वी है उसमें छठा नरक है, फिर कुछ आकाश छोड़कर नीचे 7 वीं पृथ्वी है, उसमें 7 वें नरक के नारकी हैं।

पृथ्वियों का आधार–सातवीं पृथ्वी के नीचे केवल हवा-हवा है, वातवलय है। उन वातवलयों में स्थावर जीव हैं और मुख्यतया निगोद जीव हैं। लोग कहा करते हैं कि यह पृथ्वी शेष नाग के फन पर सधी हुई है। शेषनाग का अर्थ क्या है ? कोई सर्प नहीं है जो फन वाला हो। यदि ऐसा हो तो कभी फन के थक जाने पर पृथ्वी उलट-पलट जाय। उसका अर्थ है नाग मायने हुआ। इसमें तीन शब्द हैं-न, अ, ग। ग कहते हैं जाने वाले को गच्छति इति ग:। न ग: इति अंग:। जो न जाय उसे अग कहते हैं। तो जो न जाय वह है पर्वत। अचल चीज, जो स्थिर रहे और न अंग: इतिनाग:। जो स्थिर न हो उसे नाग कहते हैं। तो नाग कहो या ग कहो उसका अर्थ है जो स्थिर न रहे, सदा चलित रहे उसे नाग कहते हैं। सदा चलती रहे ऐसी चीज है हवा और शेष का अर्थ है बची हुई। सर्व पृथ्वियों के नीचे हवा रहती है। ये जो 7 पृथ्वियां हैं इन प्रत्येक के नीचे हवा है और चारों दिशावों में हवा है। तो यह पृथ्वी हवा पर सधी हुई है। तो शेष नाग का अर्थ है शेष की बची हुई वायु। उस वायु पर पृथ्वी आधारित है।

नारकियों का क्लेशमय वातावरण–यह नारकी जीव उन पृथ्वियों के ऊपर नहीं रहता, किंतु ठीक मध्य में ऐसे ही बड़े बिल बने हुए हैं जिन में वे नारकी जीव रहा करते हैं। उनका देह दुर्गंधित वैक्रियक है कोई तलवार से खंड-खंड कर दे तो भी पारे की तरह फिर एक हो जायें और शरीर फिर तैयार है। वे नारकी जीव चाहते हैं कि मेरी मृत्यु हो जाय पर जितनी आयु उनकी है उनके पहिले वे मरते ही नहीं हैं। यहाँ मनुष्य चाहते हैं कि हम अभी न मरें। लेकिन उनकी आयु बीच में ही कट सकती है। नारकी चाहते हैं कि अभी मर जायें, बड़े क्लेश हैं पर वे नहीं मरते हैं। तीन आयु पुण्यरूप हैं और नरक आयु पापरूप है। जो जीव मरना नहीं चाहता उसकी आयु पुण्यरूप है और जो मरना चाहता है उसकी आयु पापरूप है। तिर्यंच भी कोई मरना नहीं चाहता पशु, पक्षी आदिक। मनुष्य भी और देव भी मरना नहीं चाहते। नारकी चाहते हैं कि हम मर जायें पर पूर्ण आयु से पहिले नहीं मरते। उनके देह के खंड-खंड हो जायें तो भी पारे के समान सब एकरस हो जाते हैं।नारकियों की अशुभ विक्रिया–नारकी जीवों का शरीर दुर्गंधित होता है, विक्रिया भी होती है। वे सुंदर रूपवान् अपने शरीर की विक्रिया नहीं कर सकते। खोटा करेंगे। निकले दाँत, उठी हुई सींग, जैसे कि आप चित्रों में देखा करते हैं, ऐसी कठिन विक्रिया उनके होती है। उन्हें करोंत चाहिए हो कि किसी के दो टुकड़े कर दें तो हाथ ही करोंत बन जाते हैं। जो हथियार चाहिए हो छुरी तलवार सब उनके अंग बन जाते हैं। उनमें विक्रिया है, मनुष्य में विक्रिया नहीं है। बहुत सी बातें तो मनुष्य की भी बन जाती है। अंजुल की ही कटोरी कल्छुली बन गयी, मुट्ठी बाँध लिया मुगदर सा बन गया, थप्पड़ लगा दिया वह प्रहारक बन गया, लो अपन दसों चीजें बना डालते हैं, विक्रिया नहीं है तिस पर भी नारकी जीवों के तो वे नाना प्रकार के शस्त्र बना डालते ऐसी उनकी अशुभ विक्रिया है। नारकी जीवों के चैन नहीं है। रात दिन वहाँ हैं ही नहीं, अँधेरा ही अँधेरा है। ऐसे नारक देह में रहने वाला आत्मा अज्ञानवश अपने को समझता है कि मैं नारकी हूँ।भ्रम और वस्तुस्थिति–यों अज्ञानवश यह जीव मनुष्य देह में पहुंचा तो मानता है कि मैं मनुष्य हूँ, तिर्यंच देह में पहुंचा तो मानता है कि मैं तिर्यंच हूँ, देव के शरीर में पहुंचा तो अपने को देव मानता है। नारकी के शरीर में पहुंचा तो अपने को नारकी मानता है, किंतु वास्तव में यह जीव उस प्रकार है नहीं। यह तो अनंत ज्ञान की शक्ति वाला अपने आपके ज्ञान के द्वारा ही अनुभव में आ सकने योग्य जिसका स्वरूप कभी भी चकित नहीं होता है ऐसा यह मैं सबसे न्यारा केवल चैतन्य स्वरूप हूँ किंतु बहिरात्मा जीव इस स्वरूप के राज को भूल गया है और बाहर में निरखा तो जो परिणति मिली है उस ही परिणति में यह आत्मीयबुद्धि करने लगता है। तो ऐसी अनंत ज्ञानशक्ति वाला स्वसम्वेद्य अचल स्वभाववान् हूं–ऐसा जो अपने में विश्वास रखता है और ऐसा ही दर्शन करता है उस पुरूष को जगत् के पदार्थों के परिणमन में व्यग्रता नहीं होती क्योंकि वह समझता है कि मैं स्वसम्वेद्य हूँ और अचल स्थिति वाला हूँ, इस प्रकार तो यह अपने देह में ममताबुद्धि करता है और बाहर में अनेक जीवों को देखता है तो वहाँ क्या निर्णय करता है इस संबंध में आचार्यदेव कह रहे हैं–


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