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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 73

From जैनकोष




ग्रामोऽरण्यमिति द्वेधा निवासोऽनात्मदर्शिनाम् ।दृष्टात्मनां निवासस्तु विविक्तात्मैव निश्चल:॥73॥

अनात्मदर्शी का निवासदर्शन – जो आत्मा अनात्मदर्शी हैं, जिन्हें आत्मा का दर्शन अनुभवन नहीं हुआ है – ऐसे पुरुष की दृष्टि में गांव तो गांव हैं और जंगल जंगल ही है अर्थात् यह गांव है, यह जंगल है―ऐसे दो तरह के निवास की कल्पनायें होती हैं, किंतु जिसने आत्मस्वरूपदर्शन अनुभवन किया है–ऐसे पुरुष के लिये रागादिक रहित शुद्ध ज्ञानदर्शनस्वरूप निश्र्चल आत्मस्वरूप रहने का स्थान है । जिन्हें स्वयं के स्वरूप का परिचय नहीं, वे बाहर अपना निवासस्थान मानते हैं । उनकी दृष्टि में ये अमुक ग्रामवासी लोग हैं, ये सब नगरवासी लोग हैं, ये सब वनवासी लोग हैं―इस प्रकार के बाहरी स्थानों के भेद से ही निवास स्थान का भेद मान लिया है और इस प्रकार का सोचते हैं कि मेरा इस अमुक मकान में निवासस्थान है । मैं तो अमुक के घर में रहता हूं, यह भी तो मिथ्याकल्पना है । यह भी अनात्मदर्शियों की बात है । वस्तुत: तो मैं विविक्त आत्मतत्त्व में रहता हूं, अपने आत्मा में ही रहता हूं ।

आत्मा का निवासक्षेत्र व परिजन – भैया ! किसी से पूछो कि ऐ भाई ! आप कहां रहते हैं ? वह उत्तर दे कि हम अपने आत्मा में रहते हैं । यह सही उत्तर है, पर सुनने वालो को संतोष न होगा । सही बात यह है कि आप कहां रहते हैं ? हम अपने आत्मा में रहते हैं । तुम्हारे कुटुंब में कितने लोग हैं ? मेरे कुटुंब में ज्ञान, दर्शन, आनंद, चारित्र अनेक गुण बताते जाइये । वे मेरे कुटुंब के हैं और तुम्हारे रिश्तेदार कहां कहां हैं ? हमारे रिश्तेदार―कहीं हल्की रिश्तेदारी है, कहीं खोटी रिश्तेदारी है, कहीं बड़ी रिश्तेदारी है, हम कौन सी रिश्तेदारी बतायें । अरे आखिर बताओ तो । हमारी तो सब पर्यायों से रिश्तेदारी है । गति, इंद्रिय, काय, योग―ये सभी के सभी हमारे रिश्तेदार हैं । कभी बनते हैं, कभी बिगड़ते हैं । इनसे खोटी रिश्तेदारीयां भी हैं व भली रिश्तेदारी भी हैं । जैसे गतिरहित, इंद्रियरहित, योगरहित, वेदरहित, कषायरहित―ये भली रिश्तेदारियां हैं । तुम्हारा घर कहां है ? हमारा घर हमारे आत्मा के प्रदेश में हैं । उत्तर देने वाला बड़ा ही अजीब सा है । इसके विरुद्ध जो उत्तर देने वाला है, वह गलत है ।

यथार्थ उत्तर में जनसामान्य का परितोष – आप कहां रहते हैं ? हम साहब अमुक नंबर की हवेली में रहते हैं । अरे कहां हवेली में निवास है ? देह में रहता हूं, इतना भी कह देता तो भी आधाफादा उत्तर ठीक उत्तर था । अरे भैया ! वह उत्तर तो बताओ कि अनजान आदमी भी सुने तो अर्थ समझ जाये । कोई अपरिचित आदमी इंगलैंड, अमेरिका का आये और वह भी आपकी बात को समझ जाये, वह सही उत्तर होगा । आपने कह दिया कि मैं अमुक हवेली में रहता हूं, दूसरा तो इस बात को न समझ सकेगा । आप कहेंगे कि मैं इस देह में रहता हूं तो वह अपरिचित भी समझ जायेगा कि यह ठीक कह रहा है । आप कहेंगे कि मेरे 5,7 ये मकान हैं । अपरिचित तो न समझ सकेगा । यह मकान किसका है ? यह अमुक चंद का मकान है । उस मकान को नीचे से देखा, ऊपर से देखा, किवाड़ों पर देखा, मगर पता तो नहीं चलता कि यह मकान अमुक चंद का है । जो पड़ौस के लोग हैं, उन्हें मालूम हैं, वे जानते हैं, पर कोई दूसरा भी समझ जाये, यह बात पक्की है, यह तो मनमानी बात है । ये साहब अमुक के मामा हैं, अपरिचित तो न समझेगा । हां यह इतने लंबे हैं, सांवले हैं, काले हैं, यह बात कुछ कुछ समझ जायेगा दूसरा, पर ज्ञानियों की दुनिया में तो यह भी बात प्रतिष्ठा नहीं पाती ।

वस्तुत: मेरा निवासस्थान – अब देख लीजिए ऐसा निर्णय बनाना कि यह जंगल में रहने वाला है, यह गांव का रहने वाला है, यह नगर का रहने वाला है, यह शहर का रहने वाला है। यह तो भेद ठीक नहीं बैठता है । अनात्मतत्त्व में आत्मतत्त्वरूप से स्वीकार कर ली जाने वाली दृष्टि अनात्मदर्शी पुरुषों के होती है, किंतु जिन्होंने आत्मस्वरूप को निरखा है, उनको नि:शंक स्पष्ट ऐसा परिज्ञान है कि अन्य सर्वपदार्थों सर्वपरभावों से भिन्न यह मेरा आत्मा ही मेरा निवास स्थान है । इस देह को भी छोड़ेंगे तो भी मेरा घर न छूटेगा । देह छूट जायेगा, देह पड़ा रह जायेगा, देह को लोग जला देंगे, पर मेरा घर मेरे साथ जायेगा । वह मेरा घर है मेरा स्वरूप, मेरा प्रदेश मेरा घर है । इस आत्मा में ही मेरा निवास है । ऐसी दृष्टि ज्ञानी पुरुष के होती है । जो लोग आत्मानुभव से रहित हैं, उनका ही मन में, वचन में और काय में ऐसा उद्यम रहता है कि उनका निवास स्थान गांव में या जंगल में होता है अर्थात् कोई गांव को अपनाता है तो कोई जंगल को अपनाता है तो कोई जंगल से प्रेम रखता है, पर वस्तुत: गांव बाह्यपदार्थ है और जंगल भी बाह्य पदार्थ है ।

निवासस्थानविषयक औपचारिक उत्तर – भारत से आप बाहर हों और कोई पूछे कि आप कहां रहते हैं ? उत्तर दोगे कि हम भारत में रहते हैं । तो भारत तो लाखों वर्ग मील क्षेत्र का होगा एक ओर से दूसरी ओर तक । क्या आप इतने में फैलकर रहते हैं ? जब भारत के किनारे पर आ जावोगे । कोई पूछेगा कि कहां रहते हो ? आप बोलते हैं कि हम यू0पी0 में रहते हैं । आप यू0पी0 भर में फैले हैं क्या ? यू0पी0 में आ गये तो पूछा जाये कि कहां रहते हो ? तो उत्तर दोगे कि साहब हम इटावा जिले में रहते हैं । आप इटावा जिलेभर में फैले हैं क्या ? फिर इटावा जिले में आये तो पूछा कि कहां रहते हो ? तो कह दोगे कि जसवंतनगर में रहते हैं । अब और सीमित होते जावो । अमुक घर में रहता हूं और हुए तो इस शरीर में रहता हूं, यह उत्तर सही नहीं बनता है, क्योंकि यह भी झूठ हो जाएगा । कभी शरीर को भी छोड़कर चल देंगे आप । कहां रहा शरीर का निवास ? तो सही उत्तर यह है कि हम अपने आत्मप्रदेश में रहते हैं ।

दृष्टि की दिशा में – गांव जंगल दोनों ही बाह्यवस्तुएँ हैं । उनमें निवास की चर्चा करना यह अनात्मदर्शी का काम है । अब बताओ हाथ हाथ भर की जगह पर 4-6 अंगुल की जमीन पर परस्पर में लड़ाई हो जाये, मुकदमे बाजी चल जाये, दोनों पार्टी बरबाद हो जायें, यह कितनी मूढ़ता है ? अरे जमीन किसकी होती है ? देह भी अपना नहीं है तो अन्य चीजों की कथा ही क्या करना है और ऐसा ही प्रेम हो, कदाचित् कि हम जंगल में ही रहें, वहीं पर आत्मकल्याण होगा तो मात्र जंगल का निवास किसी को कल्याणमय नहीं बना देता, आत्मदर्शी नहीं बन सकता । प्रत्युत जो आत्मदर्शी पुरुष हैं, उनका निवास स्थान उन्हें स्पष्ट विदित है कि मेरा निवासक्षेत्र यह आत्मस्वरूप ही है ।

भेदकथन की एक आवश्यकता – मैं अलग और मेरा निवासभूत अलग हो तो है ही नहीं, फिर मेरा घर मैं हूं, इसका मतलब क्या है ? मतलब तो कुछ नहीं है, पर जिन्हें समझाना है, वे भेद वाले हैं । वे इतने भेद में पहुंच गये हैं कि अपने से भिन्न देह को ही अपनाने से इतना भी नहीं, किंतु गांव या जंगल भी अपना लिया है । उनको समझाने के लिए उनकी ही भाषा में यह समाधान है । हम कहां रहते हैं ? हम हम ही में रहते हैं । जिनको इस आत्मा से ही प्रयोजन हो―ऐसे मनुष्यों का समूह बैठा हो तो उनमें यह चर्चा देना भला लगेगा, पर पर्यायमोही पुरुषों के बीच में ऐसी बात कहें तो उसका कुछ अर्थ न निकलेगा । कोई न्यायालय में पहुंच जाये और वहां जज यह बात पूछे कि तुम कहां पर रहते हो ? और वह उत्तर दे कि हम अपने आत्मा में रहते हैं तो वहां तो केवल यही एक फैसला है कि अब तुम जावो, मुकदमा खारिज । जहां की भी गोष्ठी है, वहां वैसा ही चलता है तो चलो, उसके बिगाड़ नहीं है, किंतु श्रद्धा यथार्थरूप में बनी रहे ।

व्यर्थ का श्रम – भैया ! व्यवहार ही जिन्हें परमार्थ बन गया, उनका बिगाड़ है । व्यवहार व्यवहार का रहे, परमार्थ का भी अवगम बना रहे तो कुछ बुरा नहीं है, पर अनात्मदर्शी पुरुष तो श्रद्धा ही रख रहे हैं कि यह मेरा घर है, मैं बस घर में रहता हूं, मेरा यह निवासस्थल है और इसी के कारण थोड़ी सी जमीन पर कोई विवाद हो तो जरा भी नहीं छोड़ना चाहते हैं । यह जो एक आधार के प्रश्न पर उत्तर दिया गया है, पर अर्थ सभी अपने में लगाते हैं । मेरा यह धन, मेरा यह रुपया है, मेरा यह वैभव है, यह सब अनात्मदर्शियों का मंतव्य है, पर जो आत्मदर्शी हैं, उन्हें तो सब कुछ अपना आत्मा ही है । हम आपको कोई दुःख नहीं है । दुःख बना लिया है । भाई-भाई में बंटवारा हुआ, वहां इतनी कल्पना हुई कि इसे इतना ज्यादा हिस्सा मिला, इतना मुझे कम मिला, इसमें जरा अपने आपके स्वरूप को तो परखो कि जितना मिला, उससे भी आधा मिलता तो भी क्या बिगाड़ था ? जब ज्ञान जगेगा तो जो मिला मिलाया है, उसे भी तो त्याग करके जावेगा । न विवेक जगे, न जीव में त्याग कर सके तो मरने पर तो त्याग करके जावेगा ही ।

व्यर्थ का विकल्प – लोभी कन्जूसअनुदार पुरुष के स्वपर की अन्याय भरी प्रवृत्ति के मुकाबले में यह तो संतोषकारक बात बनती है । कर लेने दो 10,20 वर्ष तक मनमानी, मक्खीचूसी, जब तक जिंदा है । आखिर छोड़ जायेगा पूरा का ही पूरा । ऐसा संतोष रहता दूसरों को । तो क्या रहा अपना ? कौन सा संकट है ? कम धन हो गया तो क्या बिगड़ गया ? यहां कोई संकट नहीं है । मान्यता का संकट है । आज मानो दो लाख की जायदाद है, उनमें से यदि दो हजार भी कम होते हैं तो क्लेश माना जाता है । बड़ी कठिन समस्या है । घाटा पड़ गया । यदि हम दो लाख के वैभव वाले शुरू से न होते और होते 500 रुपये के वैभव वाले । ठेला चलाकर अथवा कुछ साधारण चीज का सिलसिला लगाकर पेट पालते तो क्या ऐसा हुआ नहीं जा सकता था ? कौन सा कष्ट आ गया ? आध्यात्मिक मंच पर बात कही जा रही है । आज क्लेश मान रहे हैं । दूसरे देश वाले यदि इस देश को हड़प लें, कब्जा कर लें तो बड़ा अनर्थ होगा । हम शान से कहां रहेंगे ? हमारा गुजारा कैसे चलेगा? यदि मरके उसी देश वाले बन गये, जिसके अधिकार की आशंका में बीमार हुए थे, अब वह जीव बड़ा खुश होगा । हमारा इतना विस्तार है ।

आत्मदर्शी का निवास दर्शन – भैया ! कहां हैं कहीं पर संकट ? अपनी कल्पनाओं में संकटों का विस्तार बना जाता है और अपने ही विचारों से संकटों का संहार कर दिया जाता है । जो ज्ञातादृष्टा ज्ञानी संत पुरुष हैं, उनके बाह्यविषयक ये कल्पनाएँ श्रद्धा का रूप नहीं रख सकती हैं । उन्हें न तो ग्रामवास से प्रेम है और न उन्हें जंगल के निवास से प्रेम है,क्योंकि वे दोनों ही स्थान अपने आत्मस्वरूप से बाहर के स्थान हैं । पुरुष को बाहरी क्षेत्र में, बाहरी पदार्थों में आसक्ति नहीं होती है, प्रीति नहीं होती है । वे किसी भी बाह्य क्षेत्र को अपना निवास स्थान नहीं मानते हैं । जिनको भेदविज्ञान जग गया है और इसी कारण अपने आत्मा में अनाकुलता का प्रसार होने लगा है, उन्हें तो कहां गांव का निवास व कहां जंगल का निवास । उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं रहती है ।

परमार्थ निजनिवास के अदर्शन में आत्मदर्शिता का अभाव – भैया, घर तक भी कोई त्याग दे और जंगल के निवास के स्नेह बढ़ा ले, कोई कुटिया उठाले या जिस शिलापर बैठकर ध्यान करते थे उस शिला पर मानो कोई धोबी ही अपने कपड़े धोने लगे तो उनके चित्त में विकल्प होने लगे, यह मेरा निवासस्थान है, यों शिला को अपनले व अन्य किसी प्रकार भले ही वह जंगल में जंगल जैसी ही सीनरी बनाये, जंगल जैसा ही वहां कुछ उपक्रम करे । फिर भी गांव में रहकर जैसे ग्रामनिवास का स्नेह था, वैसे ही जंगल में रहकर जंगलनिवास का स्नेह बनाया तो जो मिथ्यात्व पहिले था, वही मिथ्यात्व अब है । ज्ञानी पुरुष तो शुद्ध आत्मस्वरूप को ही अपनी विहार भूमि मानते हैं । कहां रहते हैं ? अपने विविक्त आत्मा में । कहां गमन करते हैं ? अपने विविक्त आत्मा में । वे मैं ही में सदा रमते हैं । किसी भी क्षेत्र में हो, ज्ञानियों का यत्न अपने आपमें अपने आपको ही देखने में रहा करता है । कहीं किसी क्षेत्र के निवास से आत्मदर्शी नहीं बना जा सकता है, किंतु अपने ही गुणपर्याय की निरख से आत्मदर्शी तो हो ही सकता है । इसी प्रकार से यह विविक्त निश्चल आत्मा तो केवल ज्ञानियों का निवास स्थान है ।


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