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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 95

From जैनकोष



यत्रैवाहितधी: पुंस: श्रद्धा तत्रैव जायते ।यत्रैव जायते श्रद्धा चित्तं तत्रैव लीयते ॥95॥

चित्त की लीनता का स्थान – जिस किसी भी विषय में पुरुष की बुद्धि लग जाती है उस ही विषय में उसको श्रद्धा हुआ करती है और जिस ही विषय में उसे श्रद्धा हो, रुचि हो उस ही विषय में मन लीन हो जाता है । जिस किसी को यह आवश्यक हो कि मेरा मन आत्मस्वरूप के ध्यान में लीन हो तो उसे आवश्यक है कि पहिले आत्मस्वरूप में उपादेयता के रूप में श्रद्धान हो । इस आत्मस्वरूप में उपादेयता के रूप में श्रद्धान हो, इसके लिए आवश्यक है कि उस आत्मस्वरूप की ओर ही अपनी बुद्धि लगाते हैं, जिस ओर बुद्धि लगाते रहेंगे उस ओर ही श्रद्धा बनेगी उसमें ही चित्त लीन होगा ।ज्ञानी की चित्तवृत्ति – ज्ञानी पुरुष अपने जीवनभर इस ज्ञानसाधना में ही उपयोग लगाये रहता है तो उसका चित्त उस ओर ही लीन होता है उस ज्ञानी पुरुष के निद्रा भी आये तो निद्रा में भी पहिले जिस ओर उसका चित्त लगा है उसकी वह बात स्वप्न में दिखती है । सोती हुई अवस्था में भी वह काम करेगा; जैसे काम का इस मन से पहिले संस्कार बनाया था । ऐसे ही कदाचित् कोई बेहोशी हो जाय उसमें बड़बड़ाने लगते हैं, बकवाद करते हैं, तो जिस ओर पहिले चित्त लगा हुआ होगा बकवाद में भी वही बात निकलेगी । कभी कोई विद्वान् पुरुष पागल बन जाय तो वह पागलपन में भी विद्यावाली बात बकता रहेगा । यहाँ चित्त की लीनता की उपपत्ति बतायी है कि चित्त कैसे कहाँ लीन होता है । इस श्लोक से हमें यह शिक्षा लेनी है कि हम परमार्थतत्त्व की और अपनी बुद्धि लगाया करें । ज्ञान करें तो वस्तुस्वरूप की, चर्चा करें तो वस्तुस्वरूप की, रुचि बनाएँ तो वस्तुस्वरूप की अर्थात् स्वयं यह आत्मा सहज जिस रूप का है उस ही में दृष्टि दें । ऐसा अभ्यास बना रहेगा तो उसकी ही रुचि बढ़ती जायगी, उसकी ही श्रद्धा होती जायगी और फिर वह चित्त वहाँ ही लीन रहा करेगा ।

चित्त न लगाने का यत्न – जहाँ चित्त अपना न लगाना हो उसका भी यह ही उपाय है कि उस जाति की श्रद्धा न बन सके इसका उपाय है कि उस कुतत्त्व के ढिग न जायें, वहाँ बुद्धि न लगायें । यदि विषयों में अपना मन नहीं लगाना है तो यह श्रद्धा होना आवश्यक है कि ये विषय दुःखदायी हैं, असार हैं, विनाशीक हैं, इनसे कोई लाभ नहीं है, इनसे केवल जीव की बरबादी है । तो उसकी असारताविषयक श्रद्धा होनी चाहिए । भोगों की असारता की श्रद्धा तब हो सकती है जब यथार्थज्ञान में हम अपना चित्त लगायें । जिस विषय में किसी मनुष्य की बुद्धि लग जाती है अर्थात् जहाँ खूब सावधानी से बुद्धि प्रवर्तती है उसी में आसक्ति बढ़ती जाती है । किसी भी अन्य व्यक्ति में स्नेहभरी बात छेड़ना, यह भविष्यकाल में बड़े संकट की बात बन जाती है क्योंकि स्नेहभरी बात का उत्तर भी स्नेह में मिला तो अब चित्त वहाँ ही लगने लगा । जब चित्त वहाँ लग गया तो श्रद्धा भी उसी की हुई और जिसमें श्रद्धा हो वहाँ ही चित्त लीन हो जाता है ।ज्ञानी के सुषुप्ति में भी मोक्षमार्ग – इसमें पूर्व के श्लोक में यह बताया गया था कि ज्ञानी पुरुष सोया हुआ भी संवरवाली प्रकृतियों से युक्त है अथवा विभ्रम के साधनों से मुक्त है । ज्ञानी पुरुष कभी रोगवश बेहोश भी हो जायेगा तो उस बेहोशी की हालत में भी वह कर्मों से मुक्त होता है । ऐसा क्यों होता है ? उसके समाधान में यह श्लोक कहा जा रहा है । चूंकि उसने अपने जीवनभर तत्त्वज्ञान में ही बुद्धि लगाई और इस ही कारण उसे तत्त्वविषयक श्रद्धा हुई, आत्मस्वरूप विषयक श्रद्धा हुई अतएव चित्त वहाँ ही बना रहता था तो अब सोई हुई हालत में भी वहीं चित्त रहता है । जिसने कितनी ही बार आत्मा का अनुभव किया हो तो सोई हुई हालत में भी, स्वप्न जैसी स्थिति में भी, सही आत्मानुभव की बात की जाती है । जो बात जगत में की जा सकती हैं वे सब बातें स्वप्न में भी की जा सकती हैं । फर्क इतना है कि स्वप्न में केवल भाव ही भाव हैं, बाहरी काम नहीं है, लेकिन आत्मानुभव जैसी चीज तो जगते में भी बाहर का काम नहीं हो तब जो सोये में आनंद पाया और जो जगते में आनंद पाया, वह एक समान हुआ ।

हितकारी अर्जन – ज्ञान का अर्जन बहुत बड़ा काम है, यह जगे में भी आनंद दे, सोये में भी आनंद दे । और यह विषयसाधनों के संचय का काम तो क्लेशकारी है । विषयों के साधन जोड़ने की अथवा धनसंचय की जो इच्छा होती है उससे पहिले भी इसमें आकुलता मची थी । जब धन संचय कर रहा है तब भी आकुलता मच रही है, धन आ गया तो उसकी रक्षा करने की आकुलता मच रही है, और कदाचित् धन नष्ट हो जाय तो उसके विनाशपर भी आकुलता मचती है और वह पुरुष सो भी जाय तो स्वप्न भी ऐसा बुरा आता है कि इसे आकुलता मचती है ।स्वप्न का भुगतान – एक देहाती व्यापारी किसी समय सोया हुआ था । उसे स्वप्न आया कि मैं एक कस्बे के बाजार में पहुँच गया, देखा कि एक रुपये की मन-भर ज्वार बिक रही है और उसके गाँव में 2) की मन-भर ज्वार बिकती थी । सोचा कि 1 रु. की मन भर ज्वार खरीदलें सो गाँव में ले जाकर बेच देने पर 1 रु. भी मिल जायगा और 20 सेर ज्वार खाने को हो जायगी । सो स्वप्न में उसने 1 मन ज्वार खरीद ली । अब एक मन ज्वार का बोझ वह अपने सिर पर लादकर चला । स्वप्न की बात कही जा रही है । स्वप्न में ही चलते चलते उसकी गर्दन दु:खने लग गयी, अब बड़ा कष्ट हो रहा है सो उसने आधी ज्वार निकाल कर फेंक दी पर जो एक बार दर्द हो जाता है वह दर्द फिर थोड़ा भी बोझ हो तो भी बढ़ता जाता है । अब भी उसकी गर्दन का दु:खना बंद न हुआ । धीरे-धीरे उसने सारी ज्वार फेंक दी फिर भी गर्दन का दु:खना न मिटा । अब तो उसकी नींद खुल गयी, नींद खुलने पर भी गर्दन दुःख रही थी, सोचा कि अभी कोई ज्वार का दाना तो सिर में नहीं अटका है । तो जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वैसा संस्कार बनता है और उस संस्कार के माफिक चित्त उसी जगह लीन रहता है ।

स्वप्न की कसौटी – स्वप्न एक बड़ी ईमानदार कसौटी है । कैसा इसका भाव बन रहा है रात-दिन,, उसकी परख स्वप्न करा देता है । स्वप्न खोटी बात का देखें, खोटे आचरण का देखें तो उस जाति का उसका संस्कार बना रहता है, इसका परिचायक है । कोई स्वप्न ऐसा भी आ जाता कि जिसके माफिक कुछ भाव बनाया था ऐसा भी न विदित हो और स्वप्न आ जाता । तो समझिये उस जाति की भी कोई वासना बनी रही है, क्योंकि संस्कार वैसे हुए बिना वैसा स्वप्न ही न आयगा । इस ज्ञानी पुरुष को आत्मबोध का बड़ा संस्कार होता है, इससे सोई हुई अवस्था में भी ये सावधान है, होशवाला है ।बेहोशी में होश – ज्ञानी संत बेहोश की अवस्था में भी होशवाला है, सावधान है । कैसा अंदरूनी कार्य है संस्कार का कि ज्ञानी पुरुष रोगवश बेहोश पड़ा हो अथवा करने के समय उसकी सारी इंद्रियाँ बेहोश हो गयी हों, शिथिल हो गयी हों, उल्टी साँस ली जा रही हो, मरने का समय निकट आ रहा हो तो लोगों को यों दिख रहा है कि यह बड़ा बेहोश है, कई दिन से इसे होश नहीं है, लेकिन ज्ञानी का संस्कार ऐसा होता है कि कई दिन की बेहोशी में भी उसके निरंतर अंतरंग में ज्ञानप्रकाश बना रहता है । जिस ओर बुद्धि लगी हो उस ओर ही प्रीति और रुचि होती है, जहाँ रुचि होती हो, वैसा ही चित्त बना रहता है । ज्ञानी पुरुष का चित्त ज्ञान की ओर रहा आये तो उसकी यह लीनता सोई हुई और बेहोशी जैसी अवस्था में विषयों की ओर नहीं आने देती और आत्मस्वरूप की ओर प्रवृत्ति रहती है । कदाचित् वह स्वप्न देखेगा तो ज्ञान के, धर्म के, भक्ति के देखेगा और कभी बकवाद करने जैसी बेहोशी हो जाय तो ज्ञान की ही बातों का बकवाद निकालेगा ।ध्येय का निर्णय और अमल – भैया ! आत्महित के लिए प्रयत्नपूर्वक यह काम करें कि ज्ञान का अर्जन हो, ज्ञान की ओर बुद्धि लगे, अच्छा परिणाम रहा करे । यह बात तभी बन सकती है जब धन की असारता समझ में आये । गृहस्थावस्था में आवश्यकता के लिए कुछ धन की आवश्यकता होती है, पर इतना आवश्यक नहीं है कि अपने धर्म को भूल जायें और धन-वैभव के ही स्वप्न देखें । उन्हें बड़ा धोखा होगा जो धन की रुचि में धर्म को भूल जायें और धन की ओर ही लगे रहें । उनकी तो दुर्गति ही होगी । उसको न वर्तमान में चैन है न भविष्य में चैन होगी । आवश्यक है कुछ समागम गृहस्थावस्था में, ठीक है, जान लिया । सहज योग से आवश्यकता की पूर्ति प्राय: मनुष्य को हो जाती है पर जीवन इसलिए समझें कि हमें धर्म करके, ज्ञानदृष्टि करके आत्मा का बल बढ़ाना है, बाहरी कुछ काम नहीं करना है ।व्यवहारविवेक – भैया ! यदि जाती हुई हालत में भी धन कम हो रहा है अथवा त्याग किए जा रहे हैं तो उसका क्या खेद करना, मरने पर तो सब छूट ही जायगा । मरने पर सब चीजें छूट जायेंगी उसकी अपेक्षा भी क्या कुछ घाटा है जिंदगी में यदि कुछ धन कम हो गया तो । धन को तो धूल की तरह समझना । ये धन-वैभव सोना-चाँदी अपने से निकलकर कोई मेरे आत्मा में परिणति नहीं ला देते । रही यह बात कि उसके बिना काम तो नहीं सरता । लोक में इज्जत, प्रतिष्ठा, यश सब कुछ धन के ही कारण तो होते हैं । यदि पुण्योदय से अपने आप सहज आये तो आने दो, लेकिन विकल्प मचाकर श्रम करके कुछ मायामयों में मायामय इज्जत पाई तो ऐसी इज्जत का क्या करें, इज्जत के करने वाले भी मरेंगे । आखिर ये मोही-मलिन पुरुष ही तो अपने स्वार्थ के लिए इज्जत करने की बात कहा करते हैं । कुछ भी यहाँ सारतत्त्व नहीं है । जगत् में यदि कुछ नाम भी हो गया तो मरने के बाद यहाँ का नाम क्या काम देगा ? जिस भव में गया, वहाँ जो समागम हुआ, जो साधन मिले उसके अनुसार उसका बर्ताव चलेगा या पूर्वभव के लोगों के गुणगान का कुछ असर उस पर आयगा ? और फिर जितना इस मायामय जगत की ओर अपनी इच्छा बढ़ायेगा उससे अपना बड़प्पन अपनी इज्जत चाहेगा ऐसी विभाव परिणति करने का फल तो तत्काल उतना ही बड़ी आकुलता ही है ।

ज्ञान की डोर – भैया ! असार हैं ये सब मायामय समागम । कहाँ चित्त लगाना । श्रद्धा जिसकी निर्मल है, वह अवश्य पार होगा संसार से । पूजा में कहते हैं ना ‘कीजै शक्ति प्रमाण, शक्ति बिना सरधा धरे । ‘द्यानत सरधावान अजर अमर पद भोगवे’ । श्रद्धा तो है किसी को, किंतु श्रद्धा माफिक कुछ नहीं कर पा रहा है, पर दृष्टि है करने की सो वह आगे अवश्य सफल होगा । श्रद्धा तो है, आन तो है उसकी । एक सेठ का लड़का था, वह हो गया वेश्यागामी । सेठजी के एक मित्र ने कहा सेठजी, तुम्हारा लड़का तो व्यसनी हो गया है, वेश्या के यहाँ रोज जाता है और अब बिगड़ गया है, सुधर नहीं सकता है । सेठ बोला कि हमें विश्वास नहीं होता कि मेरा लड़का बिगड़ा है । वह बोला कि हम तुम्हें वेश्या के घर में खड़ा हुआ दिखा देंगे । वह ले गया सेठ को वेश्या के घर उसे दिखाने के लिए । सेठ ने देख लिया उस लड़के को वेश्या के घर में, उसी प्रसंग में लड़के ने भी अपने पिता को देख लिया, किंतु उस लड़के ने झट अपनी आँखों के आगे अंगुली लगा ली, लो इतना भर काम किया । अब जब पिता भी घर आ गया तो पुत्र दूसरे कमरे में बैठ गया ।आन तक सुधार – अब वह सेठका मित्र कहता है सेठ से कि मैं कहता था ना, कि तुम्हारा लड़का बिगड़ गया है । तो सेठ कहता है कि मेरा लड़का अभी नहीं बिगड़ा । सेठ की इतनी बात सुनकर पुत्र के हृदय पर बड़ा असर पड़ा और उसने वह पाप छोड़ दिया । सेठ के मित्र ने पूछा कि सेठजी ! मैंने तुम्हारे लड़के को वेश्या के घर में तुम्हें दिखा भी दिया फिर भी कहते हो कि मेरा लड़का अभी नहीं बिगड़ा । सेठ बोला―हाँ, ठीक है, तुमने दिखा तो दिया वेश्या के घर खड़ा हुआ, किंतु उसने मुझे देखकर अपनी आँखों के आगे अंगुली लगा ली, तो आन तो है उसे हमारी । जब तक के अंदर आन है तब तक वह सुधर सकता है, जब आन ही न रहे तो सुधरेगा ही क्या ?

श्रद्धा का एक रूपक – आन क्या है ? कोई एक श्रद्धान का ही तो रूपक है आन । आन जिसमें फिर उसके कुछ नहीं रहता । कुछ लोग बीड़ी पीते हैं तो अपने से बड़े को देखकर बीड़ी छिपा लेते हैं, छुपाकर पी लेते हैं वे सबके सामने नहीं पीते हैं तो उनके अंदर कुछ आन तो है । जब वे आन छोड़ देंगे तो फिर सबके सामने पीने लगेंगे । जो सबके सामने बीड़ी पीने लगे तो समझलो कि उसका बीड़ी-पीना छूटना कठिन हो गया है, क्योंकि अब उसकी आन निकल गई, अब उसका हृदय स्वच्छंद हो गया । आन हो तब तक उसका सुधार समझलो । जिस ओर बुद्धि लगती, उस ओर रुचि लगती, उस ओर मन आया और वैसा ही भला-बुरा प्रभाव इस पुरुष पर होता है । इससे हम अच्छे विचारों में रहें और बुरे विचारों से दूर हटें !


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