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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 96

From जैनकोष



यत्रानाहितधी: पुंस: श्रद्धा तस्मान्निवर्तते ।यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्चित्तस्य तल्लय: ॥96॥

बुद्धि के अनवधेय में श्रद्धा का अभाव – जिस विषय में जीव की बुद्धि नहीं लगी होती है उससे श्रद्धा, रुचि हट जाती है और जिससे श्रद्धा, रुचि हट जाती है फिर चित्त की लीनता उस विषय में नहीं हो सकती है । ज्ञानी पुरुषों का चित्त विषयों में क्यों नहीं लगता है ? उसका कारण यह है कि उनकी विषयों में श्रद्धा ही नहीं है, रुचि ही नहीं है । यह बात जीव के स्वयं ही होती है । जैसे कोई देहाती पुरुष मामूली भोजन में ही रुचि करता हो क्योंकि उसे उससे और मिष्ट भोजन मिला ही नहीं । उसे जब मिष्ट भोजन मिल जाता है और उसके स्वाद का अनुभव होता है तो उसकी रुचि फिर साधारण भोजन की ओर नहीं रहती है । ऐसे ही भोगरुचिक पुरुष सुभवितव्यता से ज्ञानानुभव की ओर आ जाय तो उनसे भी भोग में रुचि नहीं रहती, वह उनसे दूर ही रहने में कल्याण मानता है ।आनंदप्राप्ति की कला – आनंद दो प्रकार के हैं-एक तो कल्पित आनंद विषय-वासना संबंधी और एक आत्मीय सहज आनंद । लोक में बहुत से बड़े-बड़े आदमी हैं, जिनके ठाठ हैं, इज्जत है, हजारों-लाखों पुरुष जिनका स्वागत करते हैं, किंतु वे कैसे हैं ? स्वयं अपने आपके लिये शांत हैं या नहीं ? निर्दोष हैं, कैसे हैं ? यह उनकी बात उनके ही पास है । लोक की इज्जत से, लोक के बढ़ावा से शांति और आनंद नहीं मिलता है । यह तो स्वयं की ज्ञानकला पर निर्भर है ।विषयसुख की पराधीनता और शांतता – विषयों के आनंद में ज्ञानी की रुचि नहीं है, वह जानता है कि ये सुख तो पराधीन हैं । कर्मों का उदय अनुकूल हो तो सुख मिलता है उसमें यों प्रधानतया प्रथम तो कर्मों की अधीनअधीनता है । और, फिर उस सुख की आश्रयभूत जब सामग्री मिलती है तो सुख मिलता है, सो दूसरी अधीनता विषयों की है । फिर मन के अनुकूल उनका परिणमन हो तो सुख मिले । कितनी ही अधीनताएं उनमें बसी हुई है, उनका संयोग इस भोक्ता के अधीनअधीन नहीं है वे जब तक हैं, हैं; नहीं हैं, नहीं हैं । पराधीनता का यही अर्थ होता है । खैर, ये विषय पराधीन सही, पर सुख तो मिल जाता है, उसे क्यों छोड़ा जाय ऐसी शंका नहीं करना चाहिये । उसमें दूसरा ऐब यह है कि वह नष्ट हो जाता है । कौन-सा सांसारिक सुख ऐसा है जो सदा रहता हो ? बड़े-बड़े पुरुषों के भी तो सुबह कुछ, शाम को कुछ, दोपहर को कुछ । दोपहर से पहिले श्री राम को राजगद्दी हो रही थी, उसी समय दोपहर होते ही वन को जा रहे हैं । कितनी दोनों विरुद्ध बातें हैं, कहाँ राज्याभिषेक और कहाँ वनगमन । सच पूछो तो बड़े पुरुष, बड़े धर्मात्माजन ही वे होते हैं जो इतने बलशाली होते हैं कि संसार के समस्त संकट, उपसर्ग सहन करने की शक्ति दृढ़ कर लेते हैं ।विषयसुखों में दु:खों की अंतरिमता – अहो ! संसार में किसे चैन है ? अविवेकी जीव हो, वह अविवेक से दुःखी है और विवेकी जीव हुआ तो अपना न्याय रखने के लिये उसे अनेक संकट भोगने पड़ते हैं । यों उन पर क्लेश आते हैं । सांसारिक सुख विनाश करके सहित है । इन सुखों के बीच-बीच दुःख आते रहते हैं । कौन सा सुख ऐसा है कि जो लगातार बना रहता हो अथवा आधा घंटा भी रहता हो । कोई सुख ऐसा न मिलेगा । बीच-बीच में दुःख की लहर आती रहती है । निरंतर सुखी कोई नहीं रह पाता है । धनी होने के सुख हैं तो उसके बीच की विपत्तियां देख लो । धन की रक्षा की चिंता, बीच में कहीं कुछ विरुद्ध खबर आ जाय, टोटा मालूम पड़े, धन के टैक्स लग गए, कितने ही उसमें मुकदमें भी चलते हैं, और अब शहरी संपत्ति का जो कुछ नियम बनने वाला है; इतने से ज्यादा कोई धन नहीं रख सकता, इसको सुनकर तो कितने लोगों के चित्त अधीर हो उठते होंगे । धन-वैभव का सुख दु:खों से भरा हुआ है । परिवार का सुख ले लो, परिवार अच्छा है, आज्ञाकारी है तो सुख और आज्ञाकारी नहीं है तो दुःख । राग में सिवाय क्लेशों के और कुछ नहीं है । इज्जत के सुख देख लो, इज्जतवाला पद-पद पर अपनी कल्पनाएँ करके अपनी तौहीनी समझकर दु:खी हो जाया करता है । अब इतनी इज्जत मिली तो इतनी और मिलना चाहिये, न मिल सके मनचाही इज्जत तो दुःख बना हुआ ही है अथवा मिली हुई इज्जत में भी तो बड़े धोखे हैं । कोई भी लौकिक सुख ऐसा नहीं है जिसके बाद दुःख न आता हो । वैषयिक सुख भी दुःख से भरे हुए हैं ।

ज्ञानी की विषयसुखों में अनास्था – ज्ञानी पुरुष का विषय सुखों में आदर नहीं है । ये विषय -सुख स्वयं पापरूप हैं, इनसे पाप ही बंधता है । कहाँ तो यह जीव सुखस्वभावी, अपने ही सुखस्वभाव में ठहरता तो आनंदमय था, किंतु अपने स्वरूप से चिगकर बर्हिमुख उपयोग हुआ सो इसमें कल्पना-जाल बढ़ गया, दुःख हो गया । पाप के कारणभूत हैं ये सब विषयसुख । इस ज्ञानी पुरुष को विषयसुखों में श्रद्धा नहीं होती है, लीनता नहीं होती है, फिर इनमें चित्त कहाँ लीन होवे ।ध्येयनिर्णय की प्रथम आवश्यकता – भैया ! अपने ध्येय का निर्णय कर लेना प्रथम काम है । बहुत से लोग पूजन करते चले आ रहे हैं और भी व्रत, तप, संयम, शोध, छुवाछूत, शुद्ध भोजन सब कुछ करते चले आ रहे हैं पर ध्येय का जिन्हें पता नहीं है कि ऐसा शुद्ध चैतन्यस्वभाव है, ज्ञानप्रकाश है, सामान्यस्वरूप है इस रूप ही वर्तना, ज्ञाता-दृष्टा रहना यह है सर्व धर्मों का निचोड़ । यही करना चाहिये, इसी के लिए सब कुछ किया जाता है ऐसा जिन्हें पता नहीं है वे सब नये के नये से लग रहे हैं, 40-50 वर्ष के त्यागी पुजारी आदि हो गए फिर भी कुछ उन्नति नहीं हुई, वैसे के वैसे ही हैं जैसे पहले थे ।उन्नति के लक्षण – भैया ! उन्नति किसे कहते हैं ? क्रोध में कमी आये, घमंड में कमी हो, मायाचार में कमी हो, या लोभ-तृष्णा में कमी हो, उसका नाम उन्नति है । कषायरहित पवित्र वीतराग प्रभु की भक्ति में लग रहे हैं पर अपने कषाय में फर्क रंच नहीं आया तो उन्नति किसे कहा जाय । कर्म तो कषायों से बँधते है । इस जीव ने पर्यायदृष्टि की अज्ञानता की और फिर उस अज्ञान का पोषण कलापूर्वक भी करने लगा । यह कला नहीं तो फिर क्या है कि ऐसे ढंग से बोलना, यों भेष रखना, ऐसे बैठना―ये कलाएँ आ गयीं दुनिया को बताने के लिये जिससे दुनिया यह जाने कि यह साहब ऊँचे धर्मात्मा , बहुत बड़े साधुसंत हैं, और अंतर में जितनी बात वर्षों पहिले थी उससे भी बिगड़ी हुई बात अब है, तो बतावो क्या उन्नति हुई ? उन्नति नाम किसका है सो बताओ ।उन्नति का मूल मूल का आलंबन – भैया ! कैसे उन्नति हो, पहिले इसका निर्णय कर लो मुझे निष्कषाय होना है, शुद्ध ज्ञानमात्र होना है, इस जड़ शरीर का आग्रह नहीं करना है, पहिले ध्येय का निर्णय तो कर लीजिये । मुझे किसी-पर में मुग्ध नहीं होना है, मेरा कहीं कोई नहीं है; नाती, पुत्र, मित्र कोई भी मेरे साथी नहीं है ऐसा अपने आपको एकत्व स्वरूपमय तो निरखलो, ध्येय बना लो । क्या करना है मुझे ? मुझे अपने निकट आना है और ज्ञानमात्र रह जाना है । बाहर में और क्या काम करना है, किया भी क्या जा सकता है, इतने महल बनाए वे गिर गए, अरे ! किसका विकल्प लादते हो ? बाहर में जिस पदार्थ का जो होता हो हो, बाहरी पदार्थ छिदे-भिदे किये जाँय, विनाश हो, वियोग हो; मैं तो परिपूर्ण निजस्वरूपमात्र यह आत्मतत्त्व हूँ ऐसे आत्मा की जहाँ पकड़ नहीं है और बाहर के विषयसाधनों में जिसकी दृष्टि लग रही है, उसे तो क्लेश ही क्लेश है, अशांति ही अशांति है । शांति का नाम नहीं ।संसार में थकने पर ही कल्पित विश्राम – भैया ! अशांति करते-करते भी तो थक जाते हैं सो शांति दिखती है, जिसे कहते हैं कि अब परेशान होकर, झक मार कर बैठ गये, सो लोगों को लगता है कि बड़ा शांत है, पर अंतरंग में अशांति वर्त रही है क्योंकि शांतस्वरूप निज ज्ञानप्रकाश की तो पकड़ ही नहीं की । जैसे किसी घर में कोई इष्ट गुजर जाय जो बड़ा ही प्यारा हो तो घर के सभी लोग रो रहे हैं, बड़ी वेदना है, अच्छा घंटा भर रो लिया अथवा दो चार घंटा रो लिया । अब रोया तो दिनभर नहीं जाता । सो अब रोते-रोते थक गया तो थकान की वजह से सुन्नसा पड़ा है, लोग तो यह जानेंगे कि इसे शांति आ गयी । अरे ! अशांति तो वही वर्त रही है जैसी, थी दिनभर हो गया रोते-रोते बहुत समय गुजर गया इस श्रम को करते सो अब नींद तो आ गयी, पर जहाँ सबेरा हुआ, चार बजे, तो फिर वही रोना-गाना शुरू हो गया । पड़ोस में कोई गुजर गया हो तो फिर एलार्म की जरूरत नहीं है वे पड़ोसी खुद जगा देंगे । तो थककर बैठे हुए को लोग भले ही समझें कि अब यह शांत है पर वह शांत है नहीं; ऐसे ही सभी मोही-मलिन पुरुषों की दिनचर्या देख लो, सभी दुःखी रहते हैं । और जब भी यह मौज में हो सो समझो कि यह दुःख से थक गया है, सो अब दुःख का ढंग बदल लिया है, क्लेश तो निरंतर है, छूटता ही नहीं है । अब क्लेशों का रूप बदल लिया है विषय-भोगों के रूप में । पहिले क्लेश का रूप था कोई धन छीन ले गया, लूट ले गया, चोरी चला गया तो उसके वियोग में था; अब थक गया दुःख से । खाने की इच्छा हुई अब स्वाद ले रहा है, दुःख का ढंग ही अब बदल गया । मोही जीव इसे दुःख नहीं मानते । दुःखी हो जाते, पर दुःख की समझ नहीं आ पाती कि मैं दुःखी हो रहा हूँ ।ज्ञानी की वृत्ति – ज्ञानी पुरुष का चित्त विषयों में यों नहीं लगता है कि उसे ज्ञान के सिवाय अन्यत्र कहीं लगने की श्रद्धा नहीं है । इन हेय वस्तुओं में, कुतत्त्वों में श्रद्धा न रहे इसका उपाय है कि उनके ढिग न जावो, व्रतों की जो बाढ़ें बतायी गयी हैं जैसे शील की बाढ़ अनेक हैं – किसी स्त्री का वस्त्र न पहिनें, किसी पुरुष का वस्त्र न पहिनें, निकट न बैठें, रागभरी दृष्टि से बोलचाल न करें आदि जैसे अनेक बाढ़ें हैं उन बाढ़ों का प्रयोजन यह है कि थोड़ा भी ढंग स्नेह का मत रक्खो, क्योंकि थोड़े ही ढंग के बाद यह स्नेह बढ़-बढ़कर एक विशाल भयंंकर रूप में बढ़ जाता है । तो किसी भी बाह्य पदार्थ में रंच भी बुद्धि मत लगाओ, क्यों उनकी ओर रुचि होने का अवकाश हो । यदि उनकी ओर रुचि न होगी तो चित्त लीन न होगा, यह तो ज्ञानी पुरुष की बात है, अब अज्ञानी की बात देखो ।तत्त्वश्रद्धा के अभाव का व्यक्त कारण – इस अज्ञानी पुरुष का चित्त तत्त्वज्ञान में क्यों नहीं लगता है, धर्मचर्चा में चित्त क्यों नहीं लगता, ज्ञान की बात क्यों कठिन दिखती है ? कोई कहता है कि क्षयोपशम नहीं है साहब ! अरे ! नहीं है तो इस करणानुयोग की विशेष बातें, कर्मों की अन्य-अन्य स्थितियाँ न जान सकोगे, न जानो, पर यह मैं आत्मा केवल ज्ञान-प्रकाशमात्र हूँ ऐसा अनुभव करने लायक क्षयोपशम ले सकते हैं । नाना प्रकार की विचित्र विद्याओं का क्षयोपशम न भी हो, पर अपने आपके स्वरूप का ज्ञान करने का क्षयोपशम तो प्रत्येक मनुष्य में है । अक्षरविद्या में पढ़ने और बाँचने का क्षयोपशम तो पशुओं के भी नहीं होता । किसी भैंस के आगे शास्त्र रख दो और कहो कि पढ़, तो क्या वह पढ़ देगी ? नहीं पढ़ सकती है ? मगर उसके भी इतना क्षयोपशम है कि अपने आत्मा के स्वरूप का अनुभव कर सकती है । यहाँ की नानाप्रकार की विद्याओं के पाने का क्षयोपशम होने से मोक्षमार्ग न मिल जायगा किंतु आत्मानुभव की बुद्धि मिले, आत्मानुभव जगे तो उससे मोक्षमार्ग मिलेगा । देखो भैया ! है तो स्वयं ज्ञानमय, केवल ज्ञान की दिशाभर पा जाय इतनी ही तो बात है, मगर अज्ञानी जीव का तत्त्व की बातों में चित्त नहीं लगता, क्योंकि तत्त्व में उसकी श्रद्धा ही नहीं है । क्यों , श्रद्धा नहीं है कि इसने वस्तुस्वरूप की ओर बुद्धि ही नहीं लगायी है ।अज्ञानी के विवेचन का दिवाला – भैया ! बताओ इतना समझने में क्या कठिनाई है कि प्रत्येक पदार्थ जुदा है । कुछ कठिनाई तो नहीं है, पर मोह की लगार हो तो यह बात समझ में नहीं आती है । किसी का मान लो 10-20 हजार का धन गिर गया हो अथवा किसी ने छीन लिया हो, चुरा लिया हो तो वह दुःखी हो रहा है । और उसे समझाने बैठो, देखो भाई ! इतनी बात समझ लो कि वह धन हमारे पास था ही नहीं, तो वह कहता है कि तुम कह तो ठीक रहे हो, पर यहाँ समझ में आता ही नहीं । तो मोह का लगार है इस कारण समझ में नहीं आता है । वही बात दूसरे को समझाये वही पुरुष जिसके 20 हजार गिर गए थे तो दूसरे को समझाने लायक तो समझ है इसके पर खुद समझने लायक समझ इसके नहीं आती है कितनी विचित्रता है । अज्ञानी पुरुष ने वस्तुस्वरूप की ओर बुद्धि ही नहीं लगायी इसलिये उसके तत्त्व में श्रद्धा नहीं है और जब श्रद्धा नहीं है तो उस स्वरूप में चित्त कहाँ लग सकता है ।कल्याणप्रद शिक्षण – इन दो श्लोकों से हमें यह शिक्षा लेना है कि अनादिकाल से ही संसार में हम जन्म-मरण पाते चले आ रहे हैं । आज दुर्लभ मानवजीवन पाया है तो इसका खूब सदुपयोग कर लें, ध्येय का निर्णय कर लो । जिस ओर चित्त लगाने से संकट मिट सके उस ओर ही चित्त लगाओ, शेष सर्व पदार्थों में उदासीनता वर्तो, इस वृत्ति से ही कल्याण होगा ।


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