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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 97

From जैनकोष



भिन्नात्मानमुपास्यात्मा भिन्नो भवति तादृश: ।वर्तिर्दीणं यथोपास्य भिन्ना भवति तादृशी ॥97॥

भिन्नात्मा की उपासना से भिन्नात्मत्व की उपलब्धि – मुमुक्षु पुरुष को जिस विषय में ध्यान लगाना चाहिए उस विषय का वर्णन यहाँ दो प्रकारों में किया जायगा । एक तो इस मुमुक्षु का ध्येय भिन्न तत्त्व होगा और दूसरे उपाय से मुमुक्षु का ध्येय अभिन्न तत्त्व होगा । यह जीव भिन्न आत्मा की उपासना करके अर्थात् अपने से भिन्न जो अरहंत-सिद्ध देव हैं उनकी उपासना करके वैसा ही उत्कृष्ट बन जाता है । जैसे अरहंत-सिद्ध देव मुझसे भिन्न हैं और ये खुद भी अपने आपके स्वरूप में शुद्ध होने के कारण कर्म-नोकर्म से भिन्न हैं । इस भिन्न के दो भाव समझना कि वह हम आप से भिन्न है और वह खुद भी भिन्न है, अर्थात् उन्होंने कर्म-नोकर्म का भेदन किया है, ऐसे भिन्न आत्मा की उपासना करके यह जीव उस ही प्रकार का परमात्मा हो जाता है ।भिन्नात्मा की उपासना की उपादेयता का दृष्टांत पूर्वक समर्थन – भिन्नात्मा की उपासना से भिन्नात्मा होने के समर्थन में एक दृष्टांत कहा जा रहा है कि जैसे बत्ती दीप की उपासना करके उस दीप से भिन्न होकर भी यह बत्ती उस ही प्रकार की प्रकाशमय हो जाती है । पहिले समय में दीवा जलते थे सरसों के तेल के । एक दीवा तैल का जल रहा है दूसरा जलाना है तो उसकी बत्ती को लौ में लगा दो । यद्यपि बत्ती का स्वरूप अन्य प्रकार है और उस लौ का स्वरूप अन्य प्रकार है, लेकिन यह बत्ती उस दीपक की लौ का स्पर्श पाकर उसकी उपासना करके यह बत्ती भी प्रकाशमय हो जाती है । जलते हुये दीपक के पास दूसरे दीपक की बत्ती जब ले जाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे यह बत्ती उस दीपक की उपासना कर रही है । उस दीपक से मानो यह बत्ती कुछ भीख मांग रही है, यों सेवा करती है । वह बत्ती दीपक की उपासना करके स्वयं प्रकाशमय हो जाती है । इस ही प्रकार भिन्न आत्मा जो अरहंत सिद्ध देव हैं उनकी उपासना करके भी यह भक्त परमात्मा हो जाता है ।भिन्न में अभिन्न की उपासना – भैया ! वस्तुत: सिद्ध के ध्यान में भी उस ध्यान को माध्यम बनाकर अपने ही स्वभाव की उपासना की जा रही है । किंतु मुमुक्षु यहाँ यत्नपूर्वक साक्षात् अरहंत, सिद्ध विषयक ध्यान बनाता है इस कारण कहा गया है कि यह भक्त पुरुष भिन्न आत्मा की उपासना करके भिन्न हो जाता है । इस मुमुक्षु पुरुष को जिसमें चित्त लगाना चाहिए ऐसा वह आत्मध्येय दो प्रकार का है । एक तो स्वयं अपना आत्मा जो अभिन्न ध्येय है इसकी बात इसके आगे के श्लोक में कही जायगी, और दूसरे प्रकार यह भिन्न ध्येय यह भिन्न आत्मा है जो समस्त दोषों से विविक्त हो गया है; जिसमें आत्मगुणों का पूर्ण विकास है । ऐसे भिन्न ध्येय की उपासना से भी यह आत्मा परमात्मा बन जाता है । जैसे बत्ती अपना अस्तित्त्व न्यारा रख रही है; अपना व्यक्तित्व अपना परिणमन सब अपने से न्यारा रख रही है फिर भी जब दीपक की उपासना में यह बत्ती तन्मय होती है तो यह बत्ती भी जल उठती है । जिसमें कुछ प्रकाश न था ऐसी बत्ती अब प्रकाशमय बन जाती है ऐसे ही भिन्न अस्तित्व रखने वाला यह आत्मा परमात्मा की उपासना करके परमात्मा हो जाता है ।पावन प्रभुभक्ति – इस पवित्र अरहंत-सिद्धदेव के प्रति भक्ति पहुँचे यह बहुत पवित्रता का काम है । जगत के मोही जीव में ऐसी सुबुद्धि कहाँ है कि वे विषय-कषायों में रुचि न करके, उनमें आस्था न बनाकर निर्दोष जो परमदेव हैं उनकी भक्ति में, उनके गुणानुराग में रहकर प्रसन्न रहा करें । कुछ खोजकर भी देख लो; एक छोर से दूसरे छोर तक सारे नगर में ढूंढकर भी देख लो, विषय-कषायों में रुचि रखने वाले लोगों की संख्या नजर आयगी । कोई बिरला ही पुरुष ऐसा है जो इंद्रिय के विषयों से उदासीन है और भगवद्भक्ति में जिसका उत्साह है । यह भी बहुत कठिन बात है कि प्रभु से नेह लगे । यह मोह की कितनी कठिन मलिनता है कि इस में ही जीव का मन मलिन दुःखी पुरुषों में पहुंचता है । हालांकि जिस प्रकार भिन्न अरहंत, सिद्ध भगवान हैं वैसे ही भिन्न परिवार के लोग हैं । समस्त जीव एक दूसरे से न्यारे हैं लेकिन इन मोही मलिन पुरुषों में नेह लगाने से जवाब में क्या मिलेगा । जैसा विषय बनाया, परिणाम किया उस ही प्रकार की बात तो मिलेगी । निर्दोष, सर्वज्ञ, वीतराग प्रभु की भक्ति करने के जवाब में क्या मिलेगा, अर्थात् अपने आपमें क्या प्रभाव पड़ेगा ? निर्मलता प्रकट होगी ।जगजंजाल – अहो ! यही तो जगजंजाल है कि मिलता कुछ भी नहीं है पर नेह लगाते जा रहे हैं इन भोग के साधनों में । वृद्धावस्था में तो कुछ खबर भी आती होगी कि सारी जिंदगी यों ही व्यर्थ में खोई, अंत में रहा कुछ नहीं । कितनी विडंबनाएँ की, कितने मंसूबे बनाए, कितना श्रम किया पर आज कुछ नहीं है । आती है वृद्धावस्था में खबर, लेकिन साथ ही मोह और प्रबल भी होता जाता है । हाय ! कैसी परेशानी है कि क्लेश भी भुगतना जारी रहता है व मोह की बात ही चित्त में समायी रहती है । जिनके कारण दुःखी हुए हैं उनके ही प्रति नेह बढ़ाया जाता है यह स्थिति हो रही है भ्रमों में । इस जीव का यह काम था क्या कि शरीर में यों फँसे रहना । स्वयं यह ज्ञानस्वरूप है और अपने ज्ञानस्वरूप को भूल जाय और इन इंद्रिय के साधनों से ऐसा ज्ञान किया करे, क्या यह कोई जीव का काम था लेकिन हो तो यही रहा है । इंद्रियों से प्रीति, इंद्रिय के विषयों से प्रीति और इंद्रिय-विषय के साधनों से प्रीति । शुद्ध निर्दोष प्रभु में चित्त लगाना यह बिरले ही ज्ञानी पुरुष के होते हैं ।चित्तलीनता की परख – प्रभु में चित्त ज्यादा बसा है, या स्त्री पुत्र में चित्त ज्यादा बसा है ? इसकी परख यह है कि अपने संबंधित तन, मन, धन, वचन इन सबका न्योछावर किसके प्रति करने की उमंग है, इसे विवेक-तराजू से तौल डालो, उससे यह परख होगी कि हमारा किस ओर अनुराग विशेष है । बड़ों की संगति जैसे इस लोक में कठिन है तो उस बड़े से बड़े देवाधिदेव सर्वज्ञ प्रभु में नेह लगाना, उनकी भक्ति में चित्त जाना यह कितनी कठिन बात है । जो पुरुष प्रभु की भक्ति करते हैं उनके लिए मोक्ष का मार्ग सब स्पष्ट सामने आता है । ऋषि संतों का अथवा किसी पुरुष का ज्ञान भी शुद्ध हो जाय और आचरण भी शुद्ध हो, किंतु जब तक प्रभु में भक्ति नहीं होती तब तक मुक्ति का मार्ग उसे नहीं प्राप्त होता है । प्रभुभक्ति का बड़ा मूल्य है, साक्षात् परिणामों में उज्ज्वलता होने का साधन है तो यह प्रभुभक्ति है ।

णमोकार मंत्र में आद्यपद – हम णमोकार मंत्र का स्मरण करते हैं, पर पाठ पढ़कर चले जायें, स्वरूप का स्मरण न करें तो उससे अपने आत्मा पर कुछ भी असर नहीं होता है । जब जिस पद का उच्चारण करें, जिसको नमस्कार कहने की बात कहें उसका स्वरूप भी उसके साथ-साथ स्मरण में हो तो उसमें अलौकिक लाभ होता है । उत्कृष्ट पद 5 हैं – अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु । सर्वप्रथम कोई मनुष्य साधु बनता है, न पहिले आचार्य हो सके, न उपाध्याय हो सके । प्रथम तो दीक्षा होगी तब वह साधु कहलायेगा । आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी ये दो पद आत्महित के लिए आवश्यक नहीं है । आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी न बने तो मोक्ष न मिलेगा ऐसी बात नहीं है, मुक्ति के लिये तीन पद अवश्य आते हैं साधु हो, अरहंत हो और सिद्ध हो । आचार्य, उपाध्याय भी साधु ही हैं, थोड़ी व्यवहार की विशेषता भर है । जो समस्त साधुओं के प्रमुख हों, साधुजनों को प्रायश्चित दें, उत्तम सम्मति दें, उन्हें आदेश दें तो वे आचार्य कहलाते हैं । और, जो उन साधुओं में विशेष ज्ञानवान साधु हैं, जिन्हें आचार्य ने उपाध्याय घोषित किया है वे उपाध्याय कहलाते हैं । ये तीनों साधु परमेष्ठी हैं ।णमो लोए सव्वसाहूणं – साधुओं का काम आत्मसाधना का है । कैसे आत्मसाधना होती है, कैसे ये योगीजन अपने आपमें इस परमार्थ आत्मतत्त्व की साधना करते हैं ? इन सब बातों की जिसे परख हो ऐसा भक्तपुरुष जब ‘णमो लोए सव्वसाहूणं’ कहता है तब उसके उपयोग में विभिन्न प्रकार से तपस्या में रत साधुजन दृष्ट होते हैं । कोई गर्मी में पहाड़ पर एकाकी ध्यानस्थ होकर तपस्या करते हैं, कोई कितने ही दिनों तक उपवास ठाने हुए अपनी तपस्या में तुष्ट हैं; कोई किसी गुप्त एकांकी गुफा में साधना के लिए विराजे हुए इस शुद्ध ज्ञानतत्त्व की साधना करके तृप्त हो रहे हैं । यों अनेक प्रकार से साधुजन दिख जायें ऐसी उपयोग-धारा के साथ णमो लोए सव्वसाहूणं का जाप है ।णमो उवज्झायाणं – उपाध्याय परमेष्ठी ज्ञानी साधु होते हैं, जो स्वयं अपनी विद्या चर्चित कर रहे हैं और साधुवों को अध्ययन कराते हैं । जब णमो उवज्झायाणं बोलो तो ऐसा दृश्य उपयोग में आये कि इस ओर एक उपाध्याय परमेष्ठी विराजा है और 4, 6, 10 साधुजन विनयपूर्वक उपाध्याय से ज्ञानाभ्यास कर रहे हैं, जिनका केवल ज्ञानार्जन ही प्रयोजन है, किसी अन्य ध्येय में जो हैं ही नहीं । एक ज्ञान की ही लौ लगी है ऐसे साधुजन, देखो, कैसे रुचिपूर्वक विनय सहित उपाध्याय परमेष्ठी से अध्ययन कर रहे हैं यहाँ बैठे हैं, उस जगह हैं, टीले पर हैं, मैदान में हैं, वृक्ष के नीचे हैं, कितनी ही जगह शास्त्र पढ़ते हुए साधुसंतों के दृश्य उपयोग में रहें और सब उपाध्यायों को एक नजर में देखते हुए बोले "णमो उवज्झायाणं" । स्वरूपदर्शन सहित भक्ति में अतुल प्रताप होता है ।णमो आयरियाणं – जब "णमो आयरियाणं" बोलें तब अनेक जगह ऐसे दृश्य अपने ज्ञान से दिखे कि 10, 20, 50 साधुओं के बीच आचार्य परमेष्ठी विराज रहे हैं । ये आचार्य स्वयं संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हैं, अपने आत्मा की साधना का ही जिनका मुख्य लगाव है, साथ ही पर जीवों पर परमकरुणाभाव होने से साधुसंत जनों को मोक्षमार्ग में चलने की पद्धति बताते जा रहे हैं और कभी-कभी किसी से दोष बन जाय तो उस दोष की शुद्धि करके प्रायश्चित्त देकर शिष्य को मोक्षमार्ग में आगे बढ़ने में सहयोग देते हैं । ऐसे विभिन्न क्षेत्रों में विराजे हुए साधुसंतों के बीच आचार्य परमेष्ठी नजर आयें और उस नजर के साथ ही साथ चिंतन हो "णमो आयरियाणं" ।

णमो अरहंताणं – आचार्य, उपाध्याय व साधु―ये तीन परमेष्ठी आत्मसाधना के प्रताप से एक अभिन्न ज्ञानस्वरूप के ध्यान में रत होते हैं, जिस विशिष्ट ध्यान का नाम शुक्लध्यान है उसके प्रताप से भव भव के संचित कर्मों का विनाश कर रहे हैं । ये साधुसंत, अशुभोपयोग और शुभोपयोग से निवृत्त होकर शुद्धोपयोग में लीन हो रहे हैं । ऐसे विशुद्ध उपयोग द्वारा ये साधुजन दोषों का व्यय करते जा रहे हैं, जब समस्त दोष नष्ट हो जायें तो इस ज्ञानस्वरूप में स्वत: ऐसा बल प्रकट होता है कि सारे विश्व का ज्ञाता हो जाता है । जैसे किसी लोकविद्या के पढ़ने की पद्धति है―पुस्तक लेकर बैठना और गुरु से पाठ सीखना । सभी लोक-विद्याओं की करीब-करीब इस ही प्रकार की पद्धति है जो समस्त लोकालोक को जान जाय ऐसी अतुलविद्या की सिद्धि करने का उपाय सब उपायों से कुछ विलक्षण है क्योंकि अपने ज्ञान को सब ओर से समेट लें, किसी भी अन्य वस्तु के जानने की रुचि न करें; यह सारे विश्व को जानने का उपाय कहा जा रहा है । सारे विश्व को जानने के उपाय में यह कर्तव्य है कि एक भी अन्य पदार्थ को जानने श्रम न करे, अपने उपयोग को अपने ज्ञानस्वभाव में केंद्रित कर दे । इस केंद्रीकरण का ऐसा अतुल प्रभाव पड़ता है कि एकसाथ अर्ंतमुहूर्त में ही समस्त तीन काल के पदार्थों का यह ज्ञाता हो जाता है । जब यह सर्व विश्व का ज्ञाता हुआ तब अरहंत कहलाता है, अरहंत देव के चार घातिया कर्म नहीं हैं, सभी दोष नहीं हैं, केवल शुद्ध ज्ञान विकासरूप है ।णमो सिद्धाणं – जब णमो सिद्धाणं का स्मरण करें तो यों लोकाकाश में विराजे हुए निर्दोष परमात्मा का स्वरूप दृष्ट होना चाहिए । जब णमो सिद्धाणं कहे तो केवलज्ञानपुंज लोक के अंत में विराजे हुए परमात्मा दृष्टि में रहना चाहिए । इस तरह भिन्न आत्मा की उपासना करके यह भक्त भिन्न अर्थात् निर्दोष परमात्मा हो जाता है । इस प्रकार परमात्मा की ओर बुद्धि करने से परमात्मा में अपनी श्रद्धा बढ़ती है और इस ही पवित्र स्वरूप में चित्त लीन होता है । इसके प्रसाद से यह आत्मा सर्वकलंक के मुक्त होकर सर्वथा निष्कलंक हो जाता है ।


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