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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 98

From जैनकोष



उपास्यात्मानमेवात्मा जायते परमोऽथवा ।मथित्वात्मानमात्मैव जायतेऽग्निर्यथा तरु: ॥98॥

अभिन्नात्मत्व की उपासना से परमात्मत्व की प्राप्ति – अपने चित्त को दो जगह लगाना उचित है―एक तो परमात्म स्वरूप में और दूसरे अपने आत्मा के सहज स्वरूप में । परमात्मा का स्वरूप मुझसे भिन्न है और परमात्मा को भी ‘भिन्न’ आत्मा बोलते हैं, अर्थात् रागद्वेषादिक विभाव, ज्ञानावरणादिक कर्म और शरीर―इन सबसे वह जुदा हो गया है इस कारण भगवान का नाम भी "भिन्न" है । उस भिन्न आत्मा की उपासना करने से यह उपासक भी भिन्न हो जाता है अर्थात् परमात्मा हो जाता है । जैसे दृष्टांत भी दिया गया था कि बत्ती दिया के पास पहुँचकर खुद दिया बन जाती है । तो परमात्मा में अपना चित्त बसाना हो तो परमात्मा की ओर हमारी दृष्टि अधिक रहनी चाहिये । दूसरी उपासना है निज सहज स्वरूप की । यह अभिन्न आत्मा अपने से भिन्न है, अपने आत्मतत्त्व की उपासना करके भी यह जीव परम आत्मा बन जाता है । जैसे जंगल के बाँस अपने आपसे रगड़ करके अग्नि हो जाते हैं ऐसे ही यह आत्मा अपने आपकी उपासना करके परमात्मा हो जाता है ।अभिन्नात्मत्व की उपासना से परमात्मत्व की प्राप्ति का दृष्टांतपूर्वक समर्थन – भैया ! बाँसों में अग्नि देखोगे तो कहाँ मिलेगी । वे तो केवल वनस्पति हैं, किंतु अग्निरूप बनने की उनमें शक्ति नहीं होती तो वे बांस परस्पर कुछ रगड़ करने से कैसे आग बन जाते । पत्थरों से भी जब एक दूसरे को टक्कर मारते हैं तो अग्नि के कण निकलते हैं, उससे भी विशेषता बाँसों में हैं । बाँसों के जंगलों में प्राय: धोखा ही बना रहता है । न जाने कब आग लग जाय । वे बाँस खुद ही एक दूसरे से रगड़कर आगरूप हो जाते हैं । तो जैसे बाँस बाँस की उपासना करके बाँस स्वयं आग बन जाता है इसी प्रकार यह आत्मा आत्मा के आत्मीय सहज गुणों की आराधना करके परमात्मा बन जाता है ।

सत्पथगमन में बाधा – भैया, बात तो इतनी स्पष्ट है कि जिस पर दृष्टि देने से तत्त्वानुभव का मार्ग साफ समझ में आता है किंतु करते क्यों नहीं बनता; लोग इस पथपर क्यों नहीं चल पाते, और चलना भी क्या है, ऐसे ही स्वरूप का, यथार्थस्वरूप का यथार्थस्वरूप में निरखते रहना है, यही चलना है, उस यथार्थ तत्त्व की ओर दृष्टि क्यों नहीं रह पाती है ? इसमें अज्ञान-संस्कार ही कारण है ।सहज स्वरूप की उपासना – प्रत्येक पदार्थ परस्पर में भिन्न है, अपने अपने स्वरूप में परिपूर्ण है, अपने आपके परिणमन से ही वह परिणमन करता है । एक पदार्थ का किसी दूसरे पदार्थ के साथ संबंध नहीं है । निमित्त नैमित्तिक भाव में हो जाता है, निमित्त पाकर नैमित्तिक भाव, फिर भी एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ से संबंध नहीं है । चतुष्टय सबका न्यारा-न्यारा है । यह मैं आत्मा भी अपने समग्र गुणों में तन्मय और अपने ही स्वरूप में परिणता रहता हूँ । उन सब परिणमनों का स्रोतभूत मूल आधार जो सहज स्वभाव है उस सहजस्वभावरूप मैं हूँ, ऐसी अपने आपकी प्रतीति रखने और ऐसा मानने में ही हित है तथा शांति प्रकट होती है । इस दृष्टि के साथ अपने आपकी ओर ही दृष्टि लगायें तो इस अभिन्न आत्मतत्त्व की आराधना होती है बहुत बड़ा प्रताप है अपने आपके सहज स्वरूप की उपासना का ।अज्ञान में समय यापन – अज्ञानीजन पुण्योदय में प्राप्त हुए समागम, शान, इज्जत, प्रतिष्ठा, यश में बह जाते हैं और उसकी ही मौज में अपने स्वरूप की खबर छोड़ कर एक बाह्य दृष्टि में ही उलझ जाते हैं । जीवन के क्षण ऐसे निकले जा रहे हैं जैसे पर्वत से गिरने वाली नदी का वेग निकल जाता है, जो वेग निकलता है वो लौटकर पर्वत के ऊपर नहीं बह सकता है । गया सो गया । इसी प्रकार ये हम आपके अमूल्य क्षण जो बीत गए सो बीत गए । कोई कितनी ही मिन्नतें करे, प्रार्थना करे पर वे एक भी बीते हुए क्षण वापिस नहीं आ सकते हैं । जितने क्षण व्यतीत हो गए उनसे ही अंदाज कर लो कि जिन कार्यों में तुम लग रहे, धन-संचय अथवा लोक सम्मान आदि उनमें जुटे-जुटे कितना समय गमा दिया, पर उनके फल में आज कुछ हाथ है क्या ? शांति, इज्ज्त कुछ है क्या ? लोगों की सेवा करते-करते अपना जीवन गुजार दें और उन्हीं लोगों के द्वारा अपमान हो जाय, वे ही लोग, कहो, इज्जत बिगाड़ दें ऐसा भी आज का समय है । खैर, इज्जत भी करे कोई तो उससे कुछ हाथ नहीं आता है ।परमार्थविभूति – यह जैन सिद्धांत जो वस्तुस्वरूप का यथार्थ प्रतिपादन करता है उस सिद्धांत की बात सुनने को मिलना और समझ सकना इससे बढ़कर और क्या विभूति चाहते हो ? वास्तव में इसके सिवाय और कुछ वैभव नहीं है । यदि वैभव मानते हो किसी जड़ पदार्थ के होने से तो यह बतावो कि उस वैभव से क्या आपका गुजारा होता है ? वही पावभर अन्न और दो मोटे कपड़े, यही चाहिए ना, इसके अलावा जो सारा वैभव जुटा है वह आपके लिये बेकार है ना । यदि वैभव के रखे रहने से ही कुछ मौज मानी जा रही हो तो जरूरत के माफिक तो सबके पास है ही । उसके अतिरिक्त दो चार मन पत्थर जमीन में गाड़ दो, और सोच लो कि जैसे लोगों के पास करोड़ों का धन गड़ा है वैसे ही हमारे पास भी करोड़ों का धन गड़ा है । जैसे उसके लिए वह करोड़ों का गड़ा हुआ धन बेकार है वैसे ही यह भी बेकार है । कौन सी बात पा ली है अब तक के समय में सो बतावो । एक अपने स्वरूप की खबर होना और ऐसे निष्पक्ष वस्तुस्वरूप के प्रतिपादन करने वाले शास्त्रों का अभ्यास कर लेना उससे बढ़कर जगत में कुछ नहीं है । मानने को कुछ भी मानते जावो । उन्हीं उपदेशों के प्रसाद से जो तत्त्वज्ञान पाया है, आत्मा की झलक पायी है उस अभिन्न आत्मा की उपासना में जो जितना समय गुजर जाय वे क्षण क्षण अमूल्य हैं, उससे अनुपम लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।कारण परमात्मत्व के दर्शन की विधि – यह अपने आपका स्वरूप अपने आपको विदित हो जाय यह बहुत कठिन लग रहा है अज्ञानी को, किंतु ज्ञानी को विशद व्यक्त हो रहा है । चकमक में आग किसी को दिखती है क्या !, थैलियों में भरे रहते हैं । वह आग हो तो थैलियाँ जल जानी चाहियें । है उसमें आग, किंतु यों ही नहीं प्रकट है, ज्ञानीजन समझते हैं । जो जानते हैं वे पहाड़ में से तलाश लेते हैं कि यह चकमक पत्थर है, इसमें शक्तिरूप से आग विद्यमान है पर बाहर नहीं प्रकट है । बाँस में आग शक्तिरूप विद्यमान है पर ऊपर नहीं प्रकट है । जानने वाले सब जानते हैं, और प्रकट होने का जो उपाय है उस उपाय से प्रकट भी कर लेते हैं । ऐसे ही आत्मा में, हम आप में यह परमात्मप्रभु विराजमान है । उन दृष्टांतों में दिये गये पदार्थों में तत्त्व की बात कुछ भी प्रकट नहीं है, किंतु यहाँ तो प्रकट है । कुछ भी हो तो अंत:व्यक्त है; किसी अंश में, किसी रूप में वह शक्ति वर्त रही है, लेकिन जिस स्वरूप के निरखने पर भव-भव के कर्म-क्लेश दूर हो जाते हैं उस रूप में नहीं निरखने में आ रहा है अज्ञानीजनों के ।आत्मानुभव की पद्धति – लोक में कौन-सी वस्तु ऐसी है जिसके पा लेने पर सब कुछ पा लिया ? लोक में कौन सी वस्तु ऐसी है जिसके देख लेने पर सब कुछ देख लिया ? वह वस्तु है निज सहज चैतन्यप्रकाश । यह दूसरों की आशा रखकर नहीं मिलता है । इस आत्मतत्त्व के प्रतिपादक, उपदेशक साधुजनों की ओर निगाह रखते हुए, अरहंत की ओर दृष्टि रखते हुए की हालत में आत्मतत्त्व अनुभूत नहीं होता । वे ही उपदेश देने वाले हैं उनको ही तकते रहें तो आत्मानुभव की बात नहीं मिलती है । अरहंत देव भव्य जीवों को साफ कह रहे हैं कि मेरी ममता छोड़ो, मेरी भक्ति छोड़ो, मेरी दृष्टि छोड़ो, जानो वस्तु का स्वरूप तो तुम्हें वह तत्त्व मिलेगा । इतना स्पष्ट प्रतिपादन कौन कर सकता है ? जिनेंद्र देव का यह उपदेश है कि तुम वस्तुस्वरूप को समझो और हमारी भी दृष्टि छोड़ दो । तुम ही में तुम्हारा प्रभु मिलेगा । शांत हो कर विश्राम से अपने आपमें अपना कल्याण पावो ।आत्ममनन का उपदेश – भैया, बात जहाँ जैसी सच होती है वहाँ वह सच ही है, जिनेंद्र देव का उपदेश है कि मुझे छोड़ो, मुझे भूलो, मुझसे स्नेह मत करो किंतु सच्चे भक्तों में यह माद्दा अवश्य है कि वे प्रभु का अनुराग करके कुछ ही समय बाद प्रभु की प्रभुता को स्वरूप में गर्भित करके परदृष्टि छोड़ देंगे और अपने आपके ही स्वभाव का अनुभव करेंगे । जैसा भगवंत का उपदेश है वैसा ही कर लेंगे । जैसे बाँस में आग छिपी है पर बाँस के घर्षण का निमित्त पाकर वहाँ आग प्रकट हो जाती है, इसी प्रकार आत्मा में ज्ञान, दर्शन, आनंद आदि गुण शक्तिरूप से विद्यमान है; प्रकट नहीं है, किंतु आत्मा का आत्मा में ही घर्षण हो, आत्मा में ही अपना पुरुषार्थ करे, दृष्टि करे तो सर्व गुणों की व्यक्ति हो जाती है ।केंद्रीयकरण का प्रताप – आत्मीय गुणों की प्राप्ति के लिये अन्य सब बाहरी आडंबर, क्रियाएँ, चेष्टाएँ, दृष्टियाँ, आश्रय, सब कुछ छोड़कर, समस्त परतत्त्वों से उपयोग हटाकर स्वरूपचिंतन में एकाग्र करना है । केंद्रित होने के बाद शक्ति विशेष प्रकट होती है । जैसे आक्सी काँच में सूर्य का प्रकाश केंद्रित होने के बाद उसमें परवस्तु को जला देने की ताकत आ जाती है । जैसे हाई जंप करने वाला बालक याने रस्सी को फांदकर निकलने वाला बालक पहिले अपनी शक्ति को पृथ्वी की ओर लगाता है फिर उचकता है तो वह ऊँचा उचक जाता है । जो लोग ऊँची कूद करने का काम करते हैं वे उस कूद से पहिले अपने को जमीन पर बोझ देकर उठाते हैं । शक्ति को अपने आप की ओर उन्होंने केंद्रित की जिसके फल में वे ऊँची कूद कर सके ।परम साधना – जो पुरुष मौन रखकर, चुप रहकर अपने आपमें कुछ विचारणा करके कहते हैं तो उनके बात करने में कुछ विशेष प्रताप प्रकट होता है क्योंकि उन्होंने दूसरों को कहने के पहिले अपने आपमें संयम बनाया । तीर्थंकर प्रभु मुनि होने के बाद पूर्ण मौन रहते हैं । किसी से बात नहीं करते जिसके फल में उन्हें केवलज्ञान प्रकट हुआ और फिर केवलज्ञान के बाद वांछा की निरीह वृत्ति से उनका दिव्य ध्वनिरूप में उपदेश हुआ । बल कहाँ से लाना है ? स्वयं ही यह अनंत शक्ति का पिंड है । अपने आपमें अपने आपको केंद्रित करें उतना ही बल, आनंद, ज्ञान, दर्शन असीम प्रकट होता है । अपने आपकी उपासना से ऐसी ध्यान-अग्नि प्रकट होती है कि भव-भव के बसे हुए कर्म भी भष्म हो जाते हैं और समता-जल से सारी भष्म उड़कर यह आत्मा स्वच्छ, शुद्ध, अमूर्त, ज्ञानस्वरूप प्रकट हो जाता है । इस ही में परम कल्याण है, ऐसी ही शुद्ध स्थिति हमारे लिए उत्तम है । यही मंगलस्वरूप है, यही वास्तविक शरण है ।बाह्य में शरण कहाँ – हम शरण कहाँ ढूँढने जायें ? बाहर में कहीं मिलता नहीं शरण, क्योंकि वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है कि कोई पदार्थ हमें अपना नहीं सकता, बातों में कोई कैसी ही शान मारे, कितना ही कोई चतुराई होशियारी की बातें करे पर मुझे वह अपना कैसे सकेगा । वस्तु के स्वरूप में भी यह बात नहीं है कि कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु को अपना सके, फलत: यह मैं आत्मा, स्वयं ही अपने आपके लिए शरण हूँ और परम शरण हूँ ।महती विडंबना और संपदा – भैया ! व्यर्थ ही मोह का परिणाम करके दुःखी होता है यह जीव । दुःखी होने का कारण कुछ नहीं है । कौन करता है दुःखी ? धन मिटा, मिट गया, पर वस्तु है उसका यों परिणमन हो गया । उसमें दुःख की कौन सी बात थी ? मोहकल्पना बनाकर इसने खुद को व्यर्थ दुःखी कर डाला । कोई इष्ट-मित्र का कुटुंबी, का वियोग हो गया, दूसरा जीव था जब तक यहाँ था, वहाँ था, चला गया तो चला गया । इससे अपने आत्मा में कौन सा नुकसान हुआ ? तत्त्व से देखो, स्वरूप की बात निरखो । कुछ भी तो हानि की बात नहीं है ना, लेकिन यह अज्ञानी पुरुष कल्पना करके अपना ऐसा दिमाग बना लेता है कि हाय, मुझ जैसा कोई दुःखी नहीं है बड़ा संंकट आ जाता है । संकट ही नहीं है क्षणमात्र भी, परकल्पना में पहाड़ बराबर संंकट अपने ऊपर डाल लिया । अज्ञान अवस्था से बढ़कर कुछ विडंबना नहीं है और ज्ञानदृष्टि के बराबर लोक में कहीं भी कुछ संपदा नहीं है । इस अपने आपमें अनादि, अनंत, अहेतुक, अंत:प्रकाशमान ज्ञायकस्वरूप की दृष्टि करें और अपने में अपना प्रसाद पायें तो यह आत्मा बहिरात्मावस्था को छोड़कर परमात्मा हो जाता है ।


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