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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधिभक्ति - श्लोक 2

From जैनकोष



शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुति: संगति सर्वदार्यै: ।

सद् वृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम्।।

सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्त्वे ।

संपद्यंतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्ग: ।।2।।

समाधि के उपासक की सात भावनायें- हे देव ! जब तक मेरा अपवर्ग न हो जाए, मोक्ष न हो जाए, तब तक ये 7 बातें मुझे भव-भव में प्राप्त होती रहें।अपवर्ग कहते हैं वर्गरहित स्थिति को।वर्ग मायने क्या है? ये तीन- धर्म, अर्थ और काम।वर्ग का संबंध गृहस्थ से रहता है।इन तीन वर्गों से संपूर्णतयारहित जो स्थिति है वह है अपवर्ग।संसारक प्राणी धर्म, अर्थ, काम इन तीन वर्गों में अपनी-अपनी योग्यतानुसार अपने विकल्प ही बनाये रहते हैं।उन तीन वर्गों से जो अपगत हो गया हो, उसे कहते हैं मुक्त जीव। तो ऐसी मुक्त स्थिति जब तक मुझे प्राप्त न हो, तब तक मुझे भव-भव में ये 7 बातें प्राप्त होती रहें।साधक के उद्देश्य में अपवर्ग से बढ़कर और कुछ संपत्ति नहीं है।केवल खालिस शुद्ध आत्मा रह गया, कोई झगड़ा ही साथ नहीं, उपयोग ही कहीं नहीं लगता।केवल एक शुद्ध ज्ञान प्रतिभासमात्र का निरंतर सम्वेदन किया जा रहा है और वहाँ बिना ही आकांक्षा के तीन लोक, तीन काल के समस्त पदार्थ ज्ञात हो रहे हैं- ऐसी स्थिति ही विवेकी संत पुरूष को आदरणीय होती है।

ज्ञान का सहज वृंहण और सहज आनंद का शाश्वत लाभ- यह ज्ञान का स्वरूप है कि जब स्वच्छ ज्ञान हो तो अवश होकर समस्त त्रिलोक त्रिकालवर्ती पदार्थ ज्ञान में झलकें, वरना इसकी जरूरत कुछ नहीं।भगवान को जो आनंद आया है, सहज अनंत आनंद जो उमड़ा है, वह समस्त पदार्थों के जानने के कारण नहीं, किंतु अपने आपमें अपने को समा लेने के कारण जो निर्विकल्पता उत्पन्न हुई है, उसका आनंद है और साथ ही वह आनंद कभी बिखर न जाए, उस आनंद में कभी कमी न आ जाए, इसके लिए नियंत्रण है केवलज्ञान।जब तीन लोक, तीन काल के समस्त पदार्थ ज्ञान में आ रहे हैं तो इच्छा उत्पन्न होने की वहाँ गुंजाइश नहीं है।इच्छा तब हुआ करती है, जब कुछ तो जानने में आ रहा है और कुछ नहीं जानने में आ रहा है।जिसको त्रिलोक त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थ स्पष्ट ज्ञात हैं, अब उसके इच्छा की गुंजाइश नहीं।एक तो वैसे ही विकार रहित एक बार ही चुकने के बाद पुन: विकारक।कारण नहीं है, अतएव विकार नहीं आ सकते।फिर भी इस दृष्टि से देखें कि जब कुछ ज्ञान हो, कुछ न हो, ऐसी स्थिति इच्छा को उत्पन्न होने के लिए प्रेरणा दिया करती है।संसारी जीवों की इच्छा इसी बुनियाद पर बराबर चलती रहती है।यदि स्पष्ट असीम पूरा ज्ञान हो कि सब कुछ यह होने को है तो उसके इच्छा न रहेगी।तो प्रभु ऐसे अनंतज्ञान, अनंत आनंद से संपन्न हैं और सदा रहेंगे।ऐसी स्थिति जब प्राप्त हो जाती, तब किसी चीज की इच्छा हो ही नहीं सकती।

अपवर्ग प्राप्त होने तक संपूजनक की भव-भव में सात बातों की अभ्यर्थना- ये जो 7 बातें चाही जा रही हैं, जो भावना की जा रही है, वह सदा के लिए नहीं कहा जा रहा है कि हे प्रभो ! भव-भव में मुझे ये 7 बातें मिलती रहें।यद्यपि ये 7 बातें अच्छी कही जायेंगी, जैसे- शास्त्रस्वाध्याय, प्रभुभक्ति आदिक; लेकिन इन्हें भव-भव के लिए चाहने का अर्थ है भव का चाहना।वह चाह रहा है मानो संसार।मेरे खूब जन्म हों और प्रत्येक जन्म में प्रभुभक्ति मिले।तो जिसको भव की चाह है, उसको प्रभुभक्ति मिलना कठिन है।इसी कारण यह कहा गया है कि हे प्रभो ! जब तक मेरा अपवर्ग न हो, जब तक जितने भव शेष हों, उन सब भवों में मुझे ये सात बातें प्राप्त हों।

संपूजक की शास्त्राभ्यासभावना- अभ्यर्थनीय 7 तत्त्व क्या हैं? तो प्रथम कह रहे हैं शास्त्राभ्यास।शास्त्राभ्यास का कितना महत्त्व है, यह वहीं परख सकता है जिसने कुछ शास्त्राभ्यास किया है।शास्त्राभ्यास से रहित लोग इसके महत्त्व को नहीं जान सकते।अब तक बीसों-पचासों वर्ष मंदिर में आते रहे- ऐसे अनेक लोग मिलेंगे, जिनसे पूछा जाए कि सम्यक्त्व किसे कहते हैं? सम्यक्त्व के कितने अंग हैं? श्रावक के कितने व्रत हैं? इनका नाम तक भी न याद होगा।तो उन्होंने वह पद्धति तो अपनाई कि मंदिर में आना, जाना, पूजा करना, रहना; लेकिन ज्ञानमार्ग में, ज्ञानप्रकाश में कुछ भी कदम न बढ़ा सके और तब ऐसी स्थिति रहती है कि जैसे थे, तैसे ही हैं।जैसे- जैसे जिंदगी गुजरती है, अवस्था बड़ी होती है तो परिग्रह, संग, समागम अधिक हो जाता है तो कहो पहिले से भी हीन स्थिति हो जाए धर्म के मार्ग में।और शास्त्राभ्यास का महत्त्व वे तो न समझ सकेंगे, किंतु जिन्होंने थोड़ा भी विवेक किया है समझा है कि अहो ! प्रभु के शासन में वस्तु का कैसा विशुद्ध स्वरूप बताया है।प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वरूपास्तित्त्व को लिए हुए है।स्वयं ही उत्पादव्यय ध्रौव्यात्मक है।सहज ही वह है और परिणमता रहता है।यही बात समस्त पदार्थों की है।ऐसा ज्ञान होने से फिर मोह नहीं रहता।जान लिया कि समस्त पदार्थ पूर्ण स्वतंत्र हैं।जब एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ के साथ कर्तव्य, भोक्तृत्व, स्वामित्व कुछ भी नजर में नहीं आ रहा तो मोह वहाँ विराजे? और मोह ही इस जीव पर सबसे बड़ी विपदा है।वह विपदा जिस ज्ञान से मिटे, उस ज्ञान की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है?

अहिंसाणुव्रत का उपदेश देने वाले शास्त्र का आभार- ज्ञान की तो महिमा है ही और अपने आपके स्वरूप में पहुंचने के लिए जो चारित्र की विधि बताई गई है- 5 अणुव्रत, 3 गुणव्रत, 4 शिक्षाव्रत।श्रावक के इन 12 व्रतों के माध्यम से जो पात्रता करायी गई है, वह भी एक अपने महत्त्व की बात है।गृहस्थधर्म में कितनी उत्तम विधि से शिक्षा की बात दी गई है- अरे ! हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन 5 पापों से दूर हो।पूर्णतया दूर नहीं हो सकते हो, सो एक देश दूर हो।देखो- त्रस जीवों के वध करने से तुम्हें कौनसा लाभ मिलेगा? क्या त्रस जीवों के वध बिना खूब अच्छी प्रकार से जीवन नहीं चल सकता? हाँ, थोड़ा गृहस्थावस्था में इतनी विवशता अवश्य है कि आग जलाये बिना, पानी भरे बिना, मिट्टी लाये बिना, अनाज लाये बिना, साग-सब्जी लाये बिना, हवा चलाये बिना काम नहीं चल सकता, सो उपदेश किया है कि भाई, व्यर्थ स्थावर की हिंसा मत करो कितना सुंदर अहिंसाणुव्रत पालन के लिए एक पथ पर चलने का दिग्दर्शन कराया है।

सत्याणुव्रत व अचौर्याणुव्रत का उपदेश देने वाले शास्त्र का आभार- भाई,वचन बोलो, बोले बिना गृहस्थी का काम चलेगा नहीं, लेकिन जो दूसरे का वध कर दें, दूसरे की निंदा भरे हुए कठोर शब्द हों, दूसरे का हृदय मर्म छेद दें, ऐसे वचन मत बोलो।सत्याणुव्रत के संबंध में कितना सीधा उपदेश दिया है? इससे इसी समय शांति पावोगे और आत्मदर्शन की पात्रता भी रहेगी।किसी दूसरे की चीज बिना दी हुई ग्रहण किए बिना जीवन अच्छा गुजरेगा।चोर, डाकुवों का जीवन भला नहीं बनता।वे धर्म के पात्र नहीं, और शांति के पात्र नहीं और लौकिक सुख के भी पात्र नहीं, भयभीत रहें, शल्य बनी रहे।चोरी पाप है।कुछ भी बिना दी हुई चीज ग्रहण मत करो।हाँ, गृहस्थी में पानी और मिट्टी- ये दो चीजें ऐसी हैं कि बिना दिए हुए लाना ही पड़ता है।कहीं ये कुवें और तालाब थोड़े ही आपको जल दे जायेंगे अथवा खान से मिट्टी लानी ही पडे़गी।कहीं खान आपको घर बैठे थोड़े ही मिट्टी दे जायेगी।तो ये जल और मिट्टी तो बिना दिए हुए ही ग्रहण करने पड़ेगे, पर जल और मिट्टी के बिना तो सब कुछ बिना दिए हुए ग्रहण न करें, इसमें तो खूब गृहस्थों का निभाव है।तो हम बिना दी हुई चीज ग्रहण न करें।अपने व्यापार आदिक से अर्जन करके आजीविका चलायें, यह उपदेश हमारी शांति के लिए समर्थ है।

ब्रह्मचर्याणुव्रत व परिग्रहपरिमाणुव्रत का उपदेश देने वाले शास्त्र का आभार- अपनी स्त्री के अलावा अन्य पर स्त्री, वेश्या आदिक पर अपनी दृष्टि मत डालो।गृहस्थों का कितना सुगम मार्ग बताया गया है और इसी कारण विवाह को भी गृहस्थधर्म में किसी अंश में धर्म की बात कही गई है।विवाह में जो परदारनिवृत्ति का लक्ष्य है, वह धर्म है।और इस गृहस्थधर्म में श्रावक का सारा जीवन बहुत भले प्रकार निभ सकता है।यों तुम ब्रह्मचर्याणुव्रत पालो।परिग्रह का परिमाण कर लो।परिग्रह तो पिशाच है।जितना परिग्रह संचित करोगे, उतनी ही उलझनें बढ़ती जायेंगी।इस दुनिया में रह रहे हैं, मोही लोगों में रह रहे हैं, उनकी बातें तक रहे, सो कुछ अपने आपसे चिगना हो जाता है और उस ममता के जाल में फँसना बन जाता है।जो आरंभ में परिग्रह बढ़ता है, यह परिग्रह जिसका जितना बड़ा है, वह उतना दु:खी होता है।कारण यह है कि लाखों रूपये आ रहे हैं, उनका सुख नहीं भोग पाता, क्योंकि उससे आगे की और संपदा की तृष्णा लग रही है।तो जब निरंतर तृष्णा का भाव बना हुआ है और उससे अधिक पर तृष्णा लग गयी है तो वर्तमान में पाये हुए लाखों के वैभव से भी आनंद नहीं पा सकता, एक बात तो यह है और दूसरी बात यह है कि पायी हुई चीज में एक हजार भी कहीं घट जायें या गिर जायें तो उसकी उसे बड़ी वेदना माननी पड़ती है।कभी एक हजार का ही सारा ठाठा था और अब हो गया एक लाख का ठाठ, तो अब हजार नष्ट होने पर 99 हजार तो अभी पडे़ हैं पर उसके घटने का दु:ख उसके उपयोग पर लदा हुआ है और यह होता है।जब संपदा बढ़ रही है तो अनेक जगह लुटना, भूल होना, गुम जाना आदि बातें होगी ही।तो जितनी वृद्धि होती है परिग्रह की उतनी ही आकुलता है।यदि मुक्ति की अभिलाषा है तो अपना प्रोग्राम बदल दो और परिग्रह का परिमाण रख लो।कैसा हितकारी सुखप्रद उपदेश है, ये सब बातें जब विदित होती हैं तो शास्त्र के प्रति भक्ति उमड़ती है।कितना हितकारी शिक्षण शास्त्र से प्राप्त हुआ? तो यह समाधिभक्त पुरूष शास्त्राभ्यास की भावना कर रहा है कि जब तक मेरा अपवर्ग न हो तब तक भव-भव में मेरा शास्त्राभ्यास रहो।

शास्त्र में उपकारक दिग्व्रत का उपदेश- रागद्वेष पर विजय करने वाले वीतराग जिनेंद्रदेव के शासन में जो चारित्र की विधि बतायी गई है वह विकार रहित ज्ञानानंदमात्र निजस्वरूप में लीन हो सकें, इस ध्येय को लेकर बतायी गयी है।इसी सिलसिले में जो पुरूष सर्वपापों का परित्याग करके सकलव्रती मुनि नहीं हो सका है ऐसे पुरूष को श्रावक के बारह व्रतों का उपदेश किया है।5 अणुव्रत तो मुख्य हैं श्रावक के और 5 व्रतों की रक्षा के लिए 7 शील बताये गए हैं- जिसमें तीन गुणव्रत हैं- दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदंडव्रत और चार शिक्षाव्रत हैं- सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग परिमाण और अतिथिसम्विभाग।दिग्व्रत में यह विधि बतायी गई है कि आजीवन दसों दिशाओं में आने जाने व्यापार करने का परिमाण करले और फिर उससे बाहर आने जाने व्यापार आदिक से संबंध न रखे।इस व्रत से बाह्य के विकल्प हट जाते हैं और यों भी कह लीजिए कि दिग्व्रत की सीमा के बाहर के क्षेत्रों के लिए तो उसका सकल व्रत है, मुनि की तरह व्रत है क्योंकि बाहर में सबका त्याग कर दिया है।जितना कम आरंभ हो, कम परिग्रह हो, भावों में ममता कम हो उस जीव के उतना ही आत्मा में लगने की पात्रता आती है।तो सर्वोत्कृष्ट पुरूषार्थ है ज्ञानमय आत्मा में इस ज्ञान का लीन हो जाना और उसके लिए यह एक दिग्व्रत का उपाय बताया गया है।तो यह कितना उपकारी उनका संदेश है।ऐसे उपकारक तत्त्व का जिसमें वर्णन है उस शास्त्र के अभ्यास करने का महत्त्व शास्त्रकथित तत्त्व के मर्म जाने वाले ही समझते हैं।

शास्त्र में उपकारक देशव्रत का उपदेश- दिग्व्रत के अंदर भी और संक्षेप करके कि यह मन यत्र तत्र न डोले और भी कम में आरंभ परिग्रह रहे उसके लिए देशव्रत बताया गया है।यह देशव्रत कुछ काल की मर्यादा लेकर किया जाता है।जैसे- एक माह तक इस शहर से बाहर में अपना संबंध न रखूँगा तब फिर बाहर का व्यापार अथवा आना जाना छोड़ दें।कुछ काल की मर्यादा लेकर इस तरह का नियम ले लेना इसका नाम है देशव्रत।तो देशव्रत में और भी अभ्यास होता है बाह्यपदार्थों की दृष्टि हटाने में।थोड़े से देश में ही अपना संबंध रखा।यद्यपि साक्षात् घात तो अब भी है कि जितनी सीमा में संबंध रखा है उसमें उपयोग लग रहा है लेकिन अब ज्यादा विकल्प नहीं चल रहे, भारी उलझनों में अब चित्त नहीं रहा, इस कारण उसमें ऐसी पात्रता रहती है कि आत्मा के स्वरूप में लीन हो सके तो उसमें सुगमता रहती है।इसमें भी अहिंसा व्रत की सिद्धि की गई है।समाधिभाव कहो अथवा अहिंसा भाव कहो- दोनों का एक तात्पर्य है।रागद्वेष न होकर केवल समतापरिणाम रहना, उसे कहते हैं समाधिभाव।रागद्वेष से इस आत्मा की हिंसा हो रही थी।तो रागद्वेष का भाव न करके आत्मस्वरूप के ध्यान के बल से अपने आपकी हिंसा बचा लेना, अपनी सुरक्षा कर लेना यह है अहिंसा।तो इस समाधि की सिद्धि का लक्ष्य इस देशव्रत में है।

शास्त्र में उपकारक अनर्थदंडव्रत का उपदेश- तीसरा गुणव्रत है अनर्थदंडव्रत।इस साधक को कैसा क्रम से और विधिपूर्वक सन्मार्ग में लगाया है? यहाँ बता रहे हैं कि जिन कामों में बिना प्रयोजन ही पाप होता हो उन पाप के कामों को छोड़ देना अनर्थदंडव्रत है।जैसे- व्यर्थ ही पाप भरा उपदेश देना, हिंसा की चीजों का वितरण करना।खोटी रागभरी कथाओं का सुनना।चलते हुए फल फूल पत्तियों को यों ही तोड़ते जाना।दूसरे का बुरा विचारना आदि ये सब अनर्थदंड हैं।अनर्थदंड के विकल्पों में जो मनुष्य रहेगा उसको आत्मध्यान की पात्रता न जगेगी, इसलिए अनर्थदंडों का परित्याग करना ही चाहिये।ऐसा उपदेश देकर जिन शास्त्रों ने कुमार्ग से बचाया, सन्मार्ग में लगाया और आत्मध्यान का पात्र बनाये रखा, तो इस प्रकार का जो उपकारक शास्त्र है उसका अभ्यास करना, हम आप सब लोगों के लिए एक आवश्यक चीज है, इसी कारण समाधिभक्ति पुरूष जब समाधि में लीन नहीं है तो उस वक्त के लिए वह क्या चाह रहा है? उन 7 प्रकार की भावनाओं में यह प्रथम शास्त्राभ्यास की भावना चल रही है।

शास्त्र से उपकारक सामायिक शिक्षाव्रत का उपदेश- शिक्षाव्रत में प्रथम शिक्षाव्रत सामायिक बताया है।समतापरिणाम करने को सामायिक कहते हैं।ऐसी समता, ऐसी सामायिक साधुजनों के निरंतर रहती है, क्योंकि वे सर्व आरंभ परिग्रहों से निवृत्त हैं और उनकी धुन में एक ही बात है।इस आत्मस्वरूप को लक्ष्य में लिए रहो और अपने में अपने आपको रखकर सर्वसंकटों से दूर हो।जो जैसी बात है, उसे वैसी जानते रहो।चाहना कुछ नहीं- न सुख, न शांति, न मोक्ष, न कुछ; किंतु एक शुद्धता ऐसी प्रकट हुई है कि गलत बात को नहीं समझना चाहते गलत बात में विश्वास नहीं करना चाहते और गलत यत्न नहीं करना चाहते।जैसा जो कुछ है, उसको वैसा ही निरखते रहना- ऐसी वृत्ति सम्यग्दृष्टि ज्ञानी पुरूष को होती है।तो साधु-संतों के तो समता अथवा सामायिक निरंतर रहती है।श्रावकजनों के समता, सामायिक निरंतर रह सकने का अवकाश नहीं है, क्योंकि उसके साथ आरंभ और परिग्रह लगा हुआ है।तब सुबह, दोपहर, शाम दो घड़ी अथवा चार घड़ी सर्व ओर के आरंभ परिग्रह से हटकर केवल एक समतापरिणाम के लिए उपयोग लगाना, भावना भाना, इष्ट वंदन करना, प्रभुस्तवन करना, आलोचना करना, आत्मस्वरूप निरखना, आत्मध्यान करना- इन्हें प्रयत्न करना बताया गया है।तो इनमें इस श्रावक का अभ्यास बनेगा और 6-6 घंटे बाद इसको अपने आपकी सुध लेने का अवकाश मिलेगा।तो ऐसी सुगम चिकित्सा से जहाँ श्रावकों के भले के लिये उपदेश किया है, ऐसे शास्त्रों का अभ्यास करना हितकारी है।

शास्त्र में उपकारक प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत का उपदेश- सामायिक करना मुख्य काम है।समतापरिणाम से रहना, इसमें ही जीवन की सफलता है।तो इस समता को बढ़ाने के लिए प्रोषधोपवास का दूसरा शिक्षाव्रत कहा है।अष्टमी, चतुर्दशी आदिक के बिना उपवास आदिक करके व्यापार परिग्रह आदिक से हटकर मंदिर में, धर्म-सत्संग में रहकर धर्म में समय व्यतीत करना, सो प्रोषधोपवास है।सामायिक में तो दिन में दो-तीन बार घंटा-घंटा भर ही समय लगता था।अब प्रोषधोपवास में उतने नियत समय में सामायिक तो करता ही है, लेकिन शेष समय में समतापरिणाम बनाये रखने का अभ्यास कर रहा है।व्रतपालन का उद्देश्य जिसे विदित नहीं है, वह व्रतपालन का उद्देश्य नहीं पा सकता।व्रतपालन का उद्देश्य है कि हमारा सारा दिन समतापरिणाम में गुजरे।तो ऐसा उद्देश्य समझने वाला इस ओर यत्न करेगा, अपने आपमें उस प्रकार से समताभाव रखने का यत्न करेगा, जैसा कि मुनिजन किया करते हैं।इसीलिए इसका नाम शिक्षाव्रत है।जिन व्रतों के पालने से मनुष्यों को शिक्षा मिले, उसे शिक्षाव्रत कहते हैं।

शास्त्र में उपकारक भोगोपभोगपरिमाणव्रत का उपदेश- तीसरा शिक्षाव्रत कहा है भोगोपभोगपरिमाणव्रत।जो वस्तु एक बार भोगने में आयी, उसे भोग कहते हैं, जैसे भोजन, तैल और स्नान किया हुआ जल आदि।ये एक बार काम में आने के बाद फिर दुबारा काम में नहीं लिए जाते।तो ये हैं भोग और जो चीजें बार बार भोगने में आयें, वे हैं उपभोग, जैसे कपड़े, बिस्तर, पलंग आदि।तो भोग और उपभोग के साधन बहुत अधिक न हों, कम से कम हों, उनका परिमाण कर लो और शेष भोगोपभोग के साधनों का महत्त्व छोड़ दो तो उसे भोगोपभोगपरिमाण कहते हैं।जिन श्रावकों की दृष्टि मुनियों की ओर रहती है और वे चिंतन करते हैं कि मुनिजन तो हमारे पूज्य, हमसे बड़े होते हैं, वे निर्ग्रंथ होते हैं, मात्र पिछी, कमंडल या एक-दो पुस्तकें उपकरण के रूप में अपने पास रखते हैं।इनके अतिरिक्त वे अन्य समस्त चीजों से अपना संबंध नहीं रखते।और वे बड़े प्रसन्न और तृप्त रहा करते हैं।ऐसा ही हमको भी होना पड़ेगा, यदि संसार के संकटों से छूटना है तो- ऐसा ध्यान रहता है।तो उसका इस बात में उत्साह रहता है कि भोगोपभोग की चीजें जितनी कम से कम रखूँ, उतना ही अपने को लाभ है।बहुत रखा तो क्या? मरण तो होगा ही।और बहुत भोगोपभोग के साधनों का आश्रय बनाया तो उसमें विकल्प और बढ़ाया।तो भोग और उपभोग का परिमाण करना, एक ज्ञानमय आत्मस्वरूप में लीनता हो, इसकी पात्रता बनाये रखने के लिए बताया है।

शास्त्र में स्वपरोपकारक अतिथिसंविभागव्रत का उपदेश- अंतिम शिक्षाव्रत है अतिथिसंविभागव्रत।जिस श्रावक को अतिथि में, मुनि में भक्ति नहीं है, वह श्रावक अपने आपके कल्याणपथ में बढ़ नहीं सकता; लेकिन साथ ही यह भी है कि जिसमें साधुपने की योग्यता नहीं है, केवल एक अपने भोगोपभोग का साधन बनाने के लिए एक भेषमात्र रखा है, उनका संपर्क रखने और भक्ति रखने से यह सत्पथ में तो क्या, इसकी दृष्टि भी शुद्ध न हो सकेगी।पर जो मुनि हैं, आरंभपरिग्रह से विरक्त हैं, विषयों की आशा से रहित हैं, ज्ञानध्यान तपश्चरण में लीन रहा करते हैं, निर्ग्रंथ हैं, पिछी-कमंडल और एक-दो पुस्तकों के अतिरिक्त उनके पास और कुछ भी चीज नहीं है, जो केवल आत्मा की धुन में ही रहा करते- ऐसे मुनियों की भक्ति चित्त में हो तो वे श्रावक अपने आपके इस समाधिभाव के लिए उत्साहित रहा करते हैं।ऐसे अतिथियों को आहारदान, औषधिदान, शास्त्रदान, अभयदान आदि देते हुए उनकी सेवा करना, यह अतिथिसंविभागव्रत में बताया गया है।

मोक्षमार्ग में रूचि होने पर ही मोक्षमार्गियों में रूचि का भाव- जिसको जिस पथ में रूचि होती है, उस पथ में जो अग्रसर हैं, उनमें उनकी रूचि होती है।यह एक प्राकृतिक बात है।तो ऐसे अतिथिजनों का कुछ संविभाग न करे तो इसकी प्रेरणा नहीं मिलती।और जो अतिथि संविभाग का नियम लेकर याने व्रत प्रतिमा धारण करके अतिथि संविभाग को जीवन भर नहीं चाहता, जैसे कि किसी दानशाला में भोजन करने लगे।एक आश्रम का रूप बना दिया लोगों को धोखा देने के लिए कि हम लोग त्यागी हैं, हमको लोग खिलायेंगे तो उन्हें पुण्यबंध होगा।सो आश्रम की दानशाला में ही नौकरों से बनवाकर खायें तो अब बतावो कि ऐसे व्रती लोग अतिथि को कब खिला सकते हैं? उनका भाव ही खिलाने का नहीं हो सकता है।जो मौज से दानशाला में खाने में लगे हुए हैं, उनको अतिथि संविभाग का परिणाम ही नहीं हो सकता।अव्रती श्रावकों के लिए आश्रम का रूप था, सो उसकी अब क्या विडंबना हो गई?

अतिथिसंविभाग और अहिंसाणुव्रत की श्रावकव्रतों में प्रधानता- अतिथिसंविभाग और अहिंसाणुव्रत- ये दो व्रत बड़े प्रधान हैं।बारह व्रतों में प्रथम व्रत और बारहवां व्रत- ये दो ऐसे प्रधान है कि जिनके बिना धर्म की प्रवृत्ति नहीं बन सकती है।अहिंसाव्रत न हो तो धर्म ही क्या रहा? और अतिथिसंविभाग न हो तो तीर्थप्रवृत्ति कैसे चल सकेगी? तो अतिथिसंविभाग स्व और पर के उपकार के लिए है।यों जैनशासन में उपदेश किया गया है तो इन 12 व्रतों के धारण करने से श्रावक अपना जीवन सफल करता है और मरण करके स्वर्ग में उत्पन्न होगा।वहाँ से चलकर मनुष्य जन्म पाकर साक्षात् मोक्ष का मार्ग प्राप्त करके निर्वाण को भी प्राप्त कर सकेगा।ऐसे सर्वसंकटों से छुटकारा पाने का उपाय जहां वर्णित किया गया है- ऐसे शास्त्रों के स्वाध्याय में प्रमाद करना और अपने ऐसे अमूल्य जीवन को यों व्यर्थ ही खो देना, यह एक बड़े खेद की बात होगी।भगवान महावीर की स्तुति में कहते हैं कि हे प्रभो ! यदि आपकी दिव्यध्वनि न खिरती और उस परंपरा से शास्त्र न होते तो आज पदार्थों का स्वरूप लोगों को सही-सही कैसे विदित होता? और वे अपने आपके स्वरूप में लीन होने का उपाय कैसे बना सकते थे? इस कारण आपकी वह वाणी परम उपकारी है।

शास्त्र में उपकारक साक्षान्मोक्षमार्ग का उपदेश- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र- यह रत्नत्रय धर्म ही जीव का उद्धार कर सकने वाला है।मुनिजन साक्षात् रत्नत्रय की मूर्ति हैं, पापों का, सर्वदोषों का जिन्होंने त्याग किया है।अहिंसा की तो वे यों साक्षात् मूर्ति हैं कि चित्त में किसी भी जीव का अनिष्ट नहीं सोचते।किसी भी जीव से अपने लिए कुछ नहीं चाहते।आरंभ से तो पूर्ण विरक्त हो ही गए हैं, किसी भी समय कुछ भी आरंभ का चिंतन वे नहीं करते।इसी प्रकार वे सत्य, अचोर्य व ब्रह्मचर्य की परममूर्ति हैं।ब्रह्मचर्य की परम सिद्धि उनके नग्नत्व से स्पष्ट प्रकट है और वे कभी स्त्री सहवास में नहीं रहते, ग्रामसहवास भी जिन्हें पसंद नहीं है- ऐसे ब्रह्मचर्य की साक्षात् मूर्ति और निर्ग्रंथता की परमपवित्र मूर्ति, जिनकी नग्नमुद्रा को निरख करके सबको विश्वास होता है कि इनके द्वारा किसी को कोई कष्ट नहीं होने का, कोई धोखा नहीं होने का।उनके पास कुछ भी परिग्रह नहीं है, उनकी नग्न मुद्रा है।उस नग्न मुद्रा को ही देखकर लोग यह विश्वास करते हैं कि इनके द्वारा किसी को कोई बाधा नहीं पहुंच सकती।साथ ही यह भी देखिये कि आत्मा का ध्यान करने में सर्वाधिक बाधक है परिग्रह।जब केवल आत्मा में ही रमने का संकल्प किया है तो अब आत्मा के सिवाय अन्य से प्रयोजन क्या रहा? आत्मा और प्रभु जिनके लिए दो ही देवता दृष्टि में रहते हैं, ऐसे साक्षात् मार्ग पर चलने की बात जैनशासन में कही गई है।वे शास्त्र हम आपके कितने उपकारी हैं, कितने मूल से हम लोगों के उद्धार की बात कही है? सम्यक्त्व प्राप्त करो।अपने निर्विकार ज्ञानमात्र आत्मस्वरूप का विश्वास करो, इसका ही उपयोग लगाए रहो, इसमें ही रमण किया करो।ऐसे रत्नत्रय का उपदेश जहां हमें विधिपूर्वक प्राप्त होता है, उस शास्त्र के अभ्यास की मेरी निरंतर भावना रहे।

समाधिभक्त की जिनपतिनुति की भावना- समाधिभक्त पुरूष जब समाधि में तल्लीन नहीं हो रहा है, लेकिन समाधि में ही रहने की जिसकी उत्सुकता रहती है, वह चिंतन कर रहा है कि जब तक मेरा मोक्ष न प्रकट हो, तब तक ये 7 भावनायें भव-भव में चलती रहें।उनमें से द्वितीय भावना है जिनेंद्रदेव का स्तवन।उपयोग में हम किसको बसायें कि उपयोग मेरा शांत, निर्मल, पवित्र, कृतार्थ हो जाए? हम उपयोग में कुछ न कुछ बसाते रहते हैं, इतना ही तो किया करते हैं।बाह्यपदार्थों में तो कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्येक पदार्थ परिपूर्ण स्वतंत्र है।अपने आपमें अपना परिणमन करें और रहें, इतनी ही बात पदार्थ में पायी जाती है।मैं अपने प्रदेश से बाहर किसी की भी अन्य पदार्थ में कुछ कर डालूँ, यह बात नहीं बन सकती।यद्यपि प्रसंग नाना हैं।जैसे कि इसी समय देखिए कि हम शास्त्र पढ़ रहे हैं, आप सुन रहे हैं और इस व्यवहार में ऐसा लग रहा है कि हम कुछ विशेष श्रम कर रहे हैं, आपको कुछ दे रहे हैं और आप लोग कुछ सुन रहे हैं, ग्रहण कर रहे हैं तो ऐसा देने लेने जैसा व्यवहार लोगों को जँच रहा होगा, लेकिन स्वरूपदृष्टि करके निरखें तो यहां लेने देने का कोई व्यवहार नहीं बनता।

ज्ञानी के ज्ञान में सर्वत्र तत्त्वप्रकाश- बोलने की यह सब निमित्तनैमित्तिक भाव से वचनों की चेष्टा हो रही है।मैं आत्मा जो अमूर्त भावमात्र हूं, अंत: कोई भाव ही बना रहा हूं और इस स्थिति में चूँकि वे भाव कुछ राग को लिए हुए हैं तो प्रदेशों में खलबली मच गई।अब जिस प्रकार का हमारा ज्ञान हुआ, भाव हुआ, इच्छा हुई, उस प्रकार से हमारे प्रदेशों में हलन-चलन हुआ और जिस विधि में हलन-चलन हुआ, उसके ही अनुसार एकक्षेत्रावगाह में रहने वाले इस शरीर की वायु चली और उसका निमित्त पाकर ये ओंठ दबे, जिव्हा, कंठ आदिक चले और जिस तरह ये चले और उनमें से जिस ढंग का जो शब्द बनाना चाहिये, वैसा ही शब्द निकलता है।जैसे हारमोनियम में जिस पर्दे को दबाया, वैसी आवाज निकलती है, इसी प्रकार यहां जिस प्रकार का प्रयत्न हुआ, उस प्रकार की ही ध्वनि निकलती है।जैसे ओंठ से ओंठ मिलाकर जो उच्चारण किया तो शब्द निकला प।उस प के साथ कुछ महाप्राण और श्वास का विशेष संबंध कर दिया तो निकला क।अब उस ही प के साथ महाप्राण के संबंध बिना और कुछ कोमल प्रेरणा से निकला ब।उसी के साथ कुछ प्रेरणा करने से निकलता है य और नासिका की मुख्यता करके निकला म।तो जैसा दबाव दिया, जैसे साधन का संयोग किया, वियोग किया, उसके जरा-जरा से तीव्र चढ़ाव उतार आदिक के कारण यह सब शब्द रचना बन जाती है।इनको यह मैं ज्ञानमात्र अमूर्त भावमात्र आत्मा रचता हूं क्या? वह तो केवल भावभर बनाता है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाता।

परसंपर्क में मोह का व्यर्थ भ्रम- यह सब भ्रम है कि मैं अमुक को यों पालता हूं, यों पोषता हूं, अमुक से स्नेह करता हूं, वह मुझसे बहुत स्नेह रखता है, इससे मुझे सुख मिलता है, मुझसे इसे सुख मिलता है, इस प्रकार की जो परबुद्धिकृत बातें हैं, वे सब भ्रम की बातें हैं।हम भावों के सिवाय और कुछ नहीं किया करते।तो जब हम भावमात्र के ही करने वाले हैं तो अब यहां यह छांट कर लें कि हम अपने उपयोग में कैसे भाव रचा करें कि हमको शांति प्राप्त हो और संसार के संकटों से हमें छुटकारा मिल जाए? वह भाव क्या हो सकता है? ऐसा पवित्र भाव जिनेंद्र भगवान का स्तवन हो सकता है।पर की ओर दृष्टि रखकर पवित्र से पवित्र भाव बनाने की अगर कोई स्थिति है तो वह जिनेंद्र भगवान का स्तवन है।वहां आत्मा का चिंतन हो कि ऐसा रागद्वेषरहित सर्वज्ञता से परिपूर्ण स्वच्छ विकारों का जहां नाम नहीं, सहज आत्मा के सत्त्व के कारण जो कुछ भाव है, वही भाव जिसके प्रकट हुआ है- ऐसा ज्ञानमात्र आनंदधाम जो एक अंतस्तत्त्व है, शुद्ध तत्त्व है, वह है प्रभु।वह आत्मा की एक परम विकसित अवस्था है, वहां ही आत्मा का परमकल्याण है, अन्यत्र आत्मा का कल्याण नहीं है, ऐसा ही हो जाने की मुझमें शक्ति है, पर उमंग नहीं करते, उत्साह नहीं करते, दृढ़ संकल्प नहीं करते, अपने में प्रेरणा नहीं लाते, भावना नहीं लाते, तो संसार में पडे़ हुए हैं।

सुगम स्वाधीन समाधिभाव के प्रेमी की जिनपतिनुति की भावना- भैया ! संसार में रहकर जन्ममरण करके, विकल्पों में बसकर हम अपने आपमें कुछ लाभ न पा सकेंगे।लेकिन इस मोही जीव को जो बात स्वाधीन है वह तो लग रही है कठिन और जो बात पराधीन है वह लग रही है इसे सरल।जब भाव के भाव में ही सारा निर्णय है तो कैसा मोहनी धूल पड़ी है, कैसा मोहनी कर्म का उदय है कि जो बात सुगम स्वाधीन है ज्ञानमय यह आत्मा इसका ही यह ज्ञान ,यह ज्ञान यहीं का यहीं ज्ञानमय आत्मा में लीन हो जाय इसमें कोई कठिनाई की बात नहीं है।लेकिन भावों में जब ऐसी मलिनता है कि यह काम न किया जा सकेगा तो बाहरी बातें इसे बड़ी सुगम लग रही हैं।ये सब अडचनें दूर करने का सीधा सुगम कोई यत्न है तो जिनेंद्र भगवान का स्तवन है।तो यहां समाधिभाव की उपासना करने वाला पूजक द्वितीय भावना में चाह रहा है कि हे प्रभो ! जब तक मुझे अपवर्ग प्राप्त न हो तब तक भव-भव में यह जिनेंद्र भगवान का स्तवन प्राप्त होता रहे।

समाधिभक्त की समाधिमूर्ति के स्तवन में भावना- संसार शरीर, भोगों को असार जानकर इनमें जिनकी पूर्णतया उपेक्षा हुई है और अपने सहज सत्य ज्ञानमात्र स्वरूप को जानकर उसकी ही निरंतर प्रतीति रहा करती है।ऐसे पुरूष को समाधिभाव में ही रूचि होती है।समाधिभाव के अतिरिक्त अन्य जितने भी विकल्प हैं उन विकल्पों को विपदा मानता है।यह समाधिभाव की रूचि रखने वाला संत जब समाधिभाव में नहीं रह पा रहा है, प्रतीति तो उसकी अवश्य है तो वह इन 7 भावनाओं में रह रहा है।दूसरी भावना चल रही है कि जिनेंद्र भगवान के गुणों का स्मरण और उनके प्रति नमन करना।परमार्थत: तो आत्मा का आत्मा ही रक्षक है, किंतु जब आत्मा के सिवाय अन्य जगह निरखने चलते हैं कि है कोई ऐसा पुरूष जिसकी शरण गहें जिससे अपने आपको शांति लाभ हो, संसार के संकट मिटें? तो वह शरण मिलेगा यह जिनेंद्र चरण, भगवत् स्वरूप।उपयोग में जब शुद्ध ज्ञानानंदमात्र प्रभु बसता है तो उस उपयोग में आकुलता और क्षोभ नहीं रहता।उसका कारण यह है कि उपयोग जिसकी शरण ले रहा है वह आत्मा स्वरूपत: सदृश है।दूसरी बात यह है कि वह अपने स्वरूप में स्वयं स्थिर है, पवित्र है, तो पवित्र स्वरूप की भावना करने से आत्मा में अपवित्रता नहीं आती।अपवित्रता आने से ही क्षोभ और आकुलता होती है।जिनेंद्र चरण का स्तवन हम आपके लिए जीवन में इतना उपयोगी है कि जिसके बिना हमारा ज्ञान और चारित्र भी विशुद्ध नहीं हो सकता।अविकारी ज्ञानस्वरूप प्रभु का यदि स्मरण रहेगा तो विकारों से निवृत्ति सुगमतया हो सकती है।जब हम मोही रागी स्नेही परिजनों का संग रखते हैं तो वहां विकारों का आना शुरू होता है।तो जिनेंद्र भगवान का स्तवन हे प्रभो ! मेरा भव भव में बर्तो जब तक कि अपवर्गों की प्राप्ति न हो।

समाधिभक्त की सत्संगभावना- तीसरी भावना है कि मेरी सर्वदा सज्जन पुरूषों के साथ संगति रहे, कुसंग से, मिथ्यादृष्टि मोहियों के संग से बहुत बल लगाने पर भी फिसलना हो सकता है और सन्मार्ग से च्युत होकर कुमार्ग में प्रवृत्ति हो सकती है।संसार है जन्ममरण का नाम।जन्म मरण साक्षात् दु:ख है।जैसे किसी बांस के बीच किसी पोर में कोई कीड़ा बैठा हो और उस बाँस के दोनों ओर (ओर छोर में) आग लगी हो इसी तरह हम आप भी इस संसार के बीच पडे़ हुए हैं और इस जीवन के दोनों ओर (ओर छोर में) जन्म मरण की आग लगी हुई है।जन्म भी दु:ख की चीज है और मरण भी दु:ख की चीज है।बालक उत्पन्न होता है, गर्भ से निकलता है।परिवार के लोग तो खुशियाँ मनाते हैं पर उस बच्चे की उस समय क्या हालत होती है, उसका अनुभव कोई दूसरा नहीं कर सकता।वह महा दु:ख है। ‘‘निकसत जे दु:ख पाये घोर।जिनको रहत न आये ओर।।’’ कितना कठिन दु:ख जन्म के समय होता है।वैसे भी अंदाज कर लीजिए कि कोई जीव एक शरीर छोड़कर आया, अब शरीर तो उसके पास स्थूल नहीं है।केवल तैजस कार्माण शरीर ही है।अब वह नये शरीर को ग्रहण करेगा और शरीर में एक क्षेत्रावगाह होकर बनेगा।इस तरह की बात होने में इस जीव पर कितना दबाव पड़ता है? जन्म के समय भी इस जीव को घोर दु:ख है और मरण के समय भी इस जीव को घोर दु:ख है।इसका तो सभी को पता है।लोग दूसरों का मरण होते देखते हैं।कितने प्रकार के रोग हो गए? श्वास बुरी तरह चल रही उल्टी सीधी, बोला नहीं जाता, बैठा नहीं जाता और मरण समय में दिखता है कि जैसे स्वर्णकार तार को खींचता है लंबा करने के लिए इस तरह से आत्मा वहाँ से खिंचता सा है, निकलने के लिए जाता है तो उसे कितनी वेदना होती है? तो जीव को कितनी जन्म मरण की वेदना लगी हुई है ओर छोर में और यह बीच का जीवन है उस कीड़े के जीवन की भांति जो कि जलते हुए बांस के बीच के किसी पोल में बैठा हुआ हो और बांस के ओर छोर में आग लगी हुई हो।हम आपको सुख शांति है कहाँ? ऐसे जन्म मरण से भरे संसार में परंपरा बढ़ाने के लिए हैं रागद्वेष मोह भाव।उन रागद्वेष मोह भावों का बल मिले, प्रेरणा मिले ऐसा संग है मोहियों का, अज्ञानियों का, व्यसनियों का।उस संग में रहकर इस जीव को तत्काल तो कुछ मौज सा मिलता है क्योंकि स्वच्छंदता की प्रकृति पड़ी हुई है, लेकिन इसका फल इतना कटुक है कि संसार में जन्म मरण के चक्र लगाते रहना पड़ता है।तो खोटा संग इस आत्मा के अहित के लिए है और सत्संग आत्मा के हित के लिए है।

क्षणमात्र भी सत्संग से उद्धार की संभावना- एक क्षण को भी सत्संग मिले तो जिसमें पात्रता है वह उसी क्षण में सुधर जाता है।पद्म पुराण की कथा में आया है कि उदयसुंदर का बहनोई बज्रबाहु अपनी स्त्री में आसक्त था, अपनी बहिन को उदयसुंदर लेने आया तो वह स्त्री सहित खुद चला, पर रास्ते में वन में एक शांत समाधिप्रेमी मुनि की शांत मुद्रा के दर्शन किए तो तत्काल उसे अपनी गल्ती नजर आयी, ओह ! यह मैं मोही निरंतर व्याकुल चित्त रहता हूं और यह भी जीव हैं, यह महापुरूष हैं, कितना शांत हैं, कितना तृप्त हैं।ज्ञानप्रकाश बढ़ता गया।एक क्षण का सत्संग हुआ उसका तो उद्धार हो गया।मोह छूटा और स्वयं निर्ग्रंथ साधु होकर उस ही शांत रस का स्वाद लेने लगा।एक क्षण का भी सत्संग हो वह भी लाभ के लिए होता है।जब एक मुनिराज चातुर्मास में थे, उस नगर के सेठ ने भी कुपूत के डर से रत्न हीरा जवाहरात सब कुछ एक हंडे में भरकर जंगल में एक पेड़ के नीचे जहां मुनिराज का चातुर्मास हो रहा था गाड़कर रहने लगा यह सोचकर कि चातुर्मास भर आरंभपरिग्रह के कार्यों से दूर रह कर धर्मध्यान में समय व्यतीत करेंगे।मुनिराज तो चार्तुमास समाप्त होने पर विहार कर गए, उधर उस कुपूत लड़के ने क्या किया था कि मौका पाकर उस हंडे को निकाल ले गया।सेठ को धोखा हुआ कि मैंने तो मुनिराज की चार माह तक सेवा की और देखो मुनिराज ने हमारा हंडा गायब कर दिया।तो सेठ पहुंचा मुनिराज के पास और वहां ऐसी-ऐसी कथायें सुनाने लगा व्यंग के साथ कि जिनसे यह साफ जाहिर होता था कि हमने तो आपकी चार माह तक सेवा की और आपने हमारा सारा वैभव चुरा लिया।और मुनिराज ने इस तरह की कथा कही कि जिसका यह निष्कर्ष था कि अपराध करने वाला तो कोई दूसरा ही है और इसका व्यर्थ ही मुझ पर भ्रम हो रहा है।उन कथाओं को वह कुपूत बालक भी सुन रहा था (क्षणमात्र में सत्संग के प्रभाव की यह बात कही जा रही है) तो उस दृश्य को देखकर उस कुपूत लड़के का चित्त विरक्त हुआ और बोला- ‘‘हे पिताजी ! आपने व्यर्थ ही मुनिराज के प्रति भ्रम किया।वह हंडा तो मैं मौका पाकर निकाल ले गया था।वह हंडा तो आपके घर पर रखा है।आप जाइये ! जिस वैभव के पीछे आपने मुनिराज को कलंकी बनाया, उस वैभव को आप ही अपनाइए।मैं तो ऐसे वैभव को ठुकराकर निर्ग्रंथ मुद्रा धारण कर तपश्चरण करूँगा।यह कहकर वह कुपूत बालक सुपूत बनकर निर्ग्रंथ साधु हो गया।तो क्षणभर का सत्संग भी हम आपके हृदय को पलट देता है।

सत्संग के यत्न का अनुरोध- भैया ! बात कितनी सी है? एक भाव भर की बात है।जब खोटे भावों का सिलसिला बना डालते हैं, तब इन जीवों को ये खोटे भाव ही रूचते हैं।जब कभी सत्संग आदिक प्रभाव से अच्छे भावों का सिलसिला लग सके तो फिर वे अच्छे भावों में अपनी प्रगति करते हैं।इसके लिए हमें चाहिये सत्संग।सो यहाँ समाधि का इच्छुक भव्य यह भावना कर रहा है कि मेरा सदा आर्यों के साथ सत्संग रहे।कहीं एक साथ पैदा हुए दो तोते के बच्चे खेल रहे थे।उनमें से एक तोते को कोई पंडित विद्वान पकड़कर ले गया और अपने यहाँ पिंजरे में पाला और उसे बोली सिखाई।दूसरे तोते को चांडाल कसाई ले गया।उसने अपने यहां अपनी बोली सिखाई।कुछ समय बाद चांडाल के यहां का तोता गंदी बातें बोलने लगा और पंडित विद्वान के यहां का पला हुआ तोता धर्म की बातें बोलने लगा।यह किस बात का प्रभाव है? सत्संग का।यद्यपि पुरानी मोह, राग, द्वेष की आदत के कारण सत्संग में अधिक रहने से ऊब आ जाती है, किंतु थोड़ी सी प्रतीति हो, थोड़ा भी नियम हो सत्संग का तो वह कभी रूचि और सत्संग में बढ़ा सकता है।और कोई पुरूष सत्संग करे ही नहीं, घोरे ही न जाय तो उसके सुधरने की फिर क्या आशा है? सदा आर्य पुरूषों के साथ हमारा सत्संग रहे।आर्य किसे कहते हैं? जो संसार, शरीर, भोगों से विरक्त है, जिसमें आत्मा के हित की हार्दिक अभिलाषा हुई है, जो लौकिक परिग्रह को महत्त्व नहीं देता है, न्याय-नीति का जो आदर रखता है- ऐसा पुरूष कहलाता है आर्य।जिसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की प्राप्ति हुई है, जो अपनी पात्रता के अनुसार सम्यक्चारित्र में बढ़ रहे हैं- ऐसे पुरूषों का सत्संग हे प्रभो ! मुझे भव-भव में रहे, जब तक कि अपवर्ग की प्राप्ति न हो।

समाधिभक्त पुरूष चौथी भावना भा रहा है कि सत्चारित्र पुरूषों के गुण समूह की मेरे कथा ही बर्तो।देखिये- प्रत्येक बोल के अंदर दो ध्वनियाँ दिखाई देंगी, कोई भी बोल रहा हो, गुणप्रेम अथवा दोषप्रेम की ध्वनि मिलेगी।सूक्ष्मरूप से, स्थूलरूप से बात बात में ये दो धारायें झलकती हैं और फिर जब उसमें बढ़ते हैं तो स्पष्ट कथा के रूप में यह बात झलकने लगती है।

गुणानुवाद से गुणस्तवन करने वाले का स्वयं का लाभ- अब यह देखिए कि गुणियों के गुण हम अपने मुख से उच्चारण करें, उनके गुणों की कथा किया करें, इससे लाभ किसने उठाया? जिस गुणी की हम कथा करते हैं, गुणों का वर्णन करते हैं, उस गुणी को हमने लाभ नहीं पहुंचाया।संभव है कि उसे भी लाभ पहुंच सके, यह तो उसकी पात्रता पर निर्भर है।कभी कभी ऐसा होता है कि किसी के गुणों की कहानी कहने लगो तो वह अपनी उस बात में और विशेष सावधान होता है, थोड़ा यह निरखकर कि ये लोग ऐसा कहते हैं।हमारी कमी है, यह योग्य नहीं है अथवा जब गुण की बात सुनता है तो स्वभावत: उत्साह जगता है गुणी होने के लिए।जैसे कोई बच्चा ऊधम भी करता हो और उसे राजा बाबू कहकर समझा दो तो वह ऊधम को छोड़कर जैसा कि बड़े पुरूषों को शांत रहना चाहिए, उस तरह से वह रहने लगता है।तो ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि अपने गुण श्रवण करके कोई गुणों में बढें और दोषों से हटे, यह तो उसकी पात्रता पर निर्भर है, लेकिन जो दूसरों के गुणों की कहानी करता है, उसने तो तत्काल अपना लाभ ले लिया।गुण में प्रेम हुए बिना गुणों की कथा नहीं की जा सकती और कथा उसके गुण में प्रेम ही बढ़ता है।दूसरे के गुण की बात में प्रेम बढ़ता है, यह इसका भाव नहीं है; किंतु गुणस्वरूप में प्रेम बढ़ता है, गुणविकास में प्रेम बढ़ता है, अपने गुण में, स्वभाव में प्रीति बढ़ती है।तो गुणियों के गुण की कहानी करके यह बोलने वाला अपने आपमें गुणों को प्रकट कर लेता है।गुणी के गुण बखानने से बखानने वाले को लाभ ही लाभ है।दूसरे व्यवहारिक दृष्टि से देखो तो किसी के गुण वर्णन करने में इसकी शांति में भंग नहीं होता।किसी का डर भी नहीं लगता।आगे पीछे की चिंता और शोक भी नहीं रहता।किसी की प्रशंसा करने चलें तो बड़े निर्भय होकर प्रशंसा करते हैं, पर किसी की निंदा करने चलें तो भ्रम, चिंता, शोक, क्षोभ, झूठ, दोषप्रेम आदि सभी बातें आ जाती हैं।तो गुणकथा का वातावरण एक शांति का वातावरण होता है।

गुणी के सम्यक्त्व गुण का अनुवाद- सच्चरित्र पुरूषों के गुणों पर दृष्टि जाए तो वहाँ यही तो दृष्टि बनेगी कि धन्य है इनका सम्यक्त्व, धन्य है इनकी श्रद्धा, कैसी अडोल श्रद्धा है।जो वस्तु का स्वरूप है, उसके विपरीत इनकी भावना नहीं है।देव, शास्त्र, गुरु के प्रति कितना प्रबल श्रद्धान है कि स्वप्न में भी रागी देव को ये नहीं मान रहे, परिग्रही गुरु को ये पात्र नहीं मानते।और जिनमें रागद्वेष भरी शिक्षा लिखी है- ऐसे शास्त्रों को नहीं मानते।कितना इनका स्पष्ट ज्ञान है, कितना इनका स्पष्ट श्रद्धान है? संदेहरहित एक निर्णय के साथ जो रागद्वेषरहित विशुद्ध विकाररहित केवलज्ञानी परम आत्मा है, वही देव है, दूसरा जगत में और कोई देव नहीं है।जैसा होने में परम शांति हो, वही तो आदर्श है तथा वही हमारा देव है।और ऐसी वीतरागता पाने के लिए अपने आपके शुद्ध स्वरूप में समाने के लिए जिन महापुरूषों ने कमर कस ली है और इसी कारण अब उनके संग कुछ नहीं रहा, शरीर भी अगर छोड़ा जाता तो शरीर का भी परित्याग कर देते, लेकिन शरीर कहाँ छोड़ दें? सो जिन्होंने सब कुछ छोड़ दिया, ऐसे गुरूराज जिनकी मुद्रा शांत गंभीर है, जो आत्मसाधना में रत हैं, ऐसे गुरु पिछी-कमंडल और एक दो पुस्तकों के अतिरिक्त तृणमात्र भी परिग्रह साथ में नहीं रखते- ऐसे निष्परिग्रही ही हमारे गुरु हैं, ऐसी जिनकी प्रबल श्रद्धा है, धन्य है इनका सम्यक्त्व।ऐसे उनके सम्यक्त्व की प्रशंसा करना गुणविकास का कारण है।

ज्ञान और चारित्र का गुणानुवाद- सम्यक्त्व का सार लिए हुए जिनका ज्ञान है, उनके ज्ञान की प्रशंसा करना भी गुणविकास का कारण है।इनका कैसा स्पष्ट ज्ञान है, कैसा निष्पक्ष ज्ञान है।एक हित की वांछा में ही इनके ज्ञान की प्रवृत्ति है।निर्दोष ऋषि परंपरा के अनुसार व अनुभवपूर्वक इनका ज्ञान है।धन्य है इनका ज्ञान।जो सम्यक्चारित्र में रत हैं, अहिंसाधर्म का पालन करते हैं, मन से, वचन से, काय से, कृतकारित अनुमोदना से सर्व प्रकार की हिंसा का जिनका त्याग है, उनका अहिंसाव्रत धन्य है, इनकी वाणी दूसरों के लिए हितकर है।सत्य वही कहलाता है, जो हितकारी हो, परिमित हो, प्रिय हो।जिनके वचन बहुत प्यारे लगें, बड़े राग भरे, स्नेह भरे वचन हों, पर परिमित न हों, साथ ही हितकारी न हों, दूसरे को सम्यक्त्व में, सम्यग्ज्ञान में लगाने वाले न हों तो उन वचनों को सत्य नहीं कहा गया है।हित मित प्रिय वचन बोलने की जिनकी प्रकृति है, धन्य है उनका चारित्र।ये जीवों पर अपार करूणा रखते हैं।चोरी का तो कोई विकल्प ही नहीं हो सकता है।किसी भी प्रकार किसी भी रूप में कुशील का तो जहां प्रश्न ही नहीं है।परिग्रह से वे इतने विरक्त हैं कि इससे अधिक और क्या कहा जाए कि जिनके पढ़ने वाली पुस्तक को भी यदि कोई पुरूष मांगे कि महाराज ! यह पुस्तक तो बड़ी अच्छी लग रही है तो वे कह देते हैं कि हां भाई ! ले जावो।इतना तक भी विकल्प जिनको नहीं उठता कि यह पुस्तक तो हमारे पढ़ने में आ रही है, इसे कैसे दे दूं? तो इससे बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है? शरीर के आराम का जिनको कोई ध्यान ही नहीं, कंकड़-पत्थर में सोने की जिनकी दृष्टि है, हां सुगमता से तख्त वगैरह मिल गए तो उस पर बैठ गए, पर संग में तख्त आसन वगैरह लेकर चलना, डोली वगैरह साथ में रखना इस प्रकार के परिग्रह जोड़ने की ओर उनकी दृष्टि नहीं रहती।वे तो सुगमता से तख्त वगैरह मिल गए तो बैठ गए या जमीन पर ही बैठ गए, इस तरह की जिनकी सात्विक प्रकृति है, जो परमविरक्त हैं, ऐसा जिनका परिग्रह, त्याग, महाव्रत है, धन्य है उनका चारित्र।तो जहां सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र से संबंधित गुणों की कहानी हो रही हो तो ऐसे गुणों को बोलने वाले पुरूष का गुणों में प्रेम है, वह तो अपना लाभ तत्काल ले ही लेता है।हे प्रभो ! मेरी भव-भव में यह वृत्ति हो कि गुणों में प्रीति हो और गुणियों के गुणों को मैं बोलता रहूं, जब तक मेरा अपवर्ग न हो।और मुझे बोलना ही पड़ रहा हो तो गुणियों के गुणों का बखान करता रहूं, यही चाहता हूं।

दोषवाद में मौन की भावना- समाधिभक्त पुरूष 5 वीं भावना में भा रहा है कि दूसरे के दोष कहने में मेरा मौनभाव रहे।जैसे कि व्यवहार में लोग परस्पर दूसरे के दोष कहा करते हैं कि इसमें अमुक दोष है, इसमें अमुक दोष है।तो किसी के दोषों पर दृष्टि देने से दोषों में रूचि होती है।तो क्यों जी ! यदि कुदेव का स्वरूप कह रहे हों और वहां कोई यह कहे कि जो रागी है, द्वेषी है, वह कुदेव है तो क्या यह उसका दोषवाद है? यह दोषवाद नहीं है, यह वर्णवाद है।जैसा स्वरूप है, वैसा कहा जा रहा है।हम आपके व्यवहार में रहने वाले लोक में जो परस्पर एक दूसरे के दोष के कहने की बात है, वह है दोषवाद।कुदेव का स्वरूप शास्त्रों में हर जगह लिखा तो गया, तब क्या वे आचार्य भी स्वयं दोषप्रेमी थे? अरे, दोष तो वह कहा जाता है कि जहां गुण ही गुण तो हैं सब प्रकार से और उस अवस्था में दोष न रहना चाहिए, न रह रहा है, पर कोई उससे दोष बन गया तो उसे दोष कहते हैं।इसी प्रकार कुशास्त्र का कोई स्वरूप कहे कि जिसमें रागादिक भरी बातें हों, वे कुशास्त्र हैं तो यह दोषवाद नहीं है, यह तो स्वरूपवाद है।इसी प्रकार कुगुरू हुए परिग्रह रखने वाले, विषयों के लंपटी।सपत्नी किसी भी प्रकार से रहते हों कोई कुगुरू और कोई उनका वर्णन करे कि जिसके साथ स्त्री भी हो, जिसके साथ परिग्रह भी लगा हो, बड़े आराम के साधन भी हों, जो अपनी महत्ता जाहिर करने जैसा ढंग बनाये हो, वह कुगुरू है।तो क्या ऐसा वर्णन कर देना दोषवाद है? यह तो स्वरूपवाद है।दोष वह है कि जो जिस अवस्था में है, उस अवस्था में उसे जैसा चलना चाहिए वह चल रहा है और उस तरह चलते-चलते कदाचित् उसमें दोष आये तो वह दोष है।

दोष के प्रति ज्ञानी श्रावक की नीति- किसी के दोष को उस ही के सामने पहिले कह समझायें यदि वह न माने और समझो कि कोई महादोष करता ही रहता है, इसमें तो धर्म का हास्य होता है तो स्पष्ट पहिले यह घोषणा कर दें कि यह मेरा साधु नहीं, यह मेरा गुरु नहीं, फिर चाहे कितना ही कुछ कहे, वह दोषवाद नहीं है और दुनिया में कोई यह भी जाहिर करता रहे कि यह मेरा गुरु है और कदाचित् दोष भी बखानता रहे, तो यह अंग के विरूद्ध बात है।हे प्रभो ! मेरा पर के दोष कहने में मौन भाव रहे, क्योंकि इस प्रकृति में दोष के प्रति उसकी रूचि रहेगी।ज्ञानी पुरूष तो गुणियों में प्रेम रखते हैं और दोष वाले से उपेक्षा रखते हैं और किसी समय मित्रजन एक अपने पथ की समस्या सुलझाने के लिए स्वरूप कहते हैं दोष का, लेकिन आम तौर से ऐसी आदत न बने कि वे दोष को बोलते ही रहें।दोषों पर दृष्टि रहने की प्रकृति में ही दोषवाद का व्यवहार बनता है।हे प्रभो ! मेरा पर के दोषों के कहने में मौन रहे, भव-भव में हमें इस तत्त्व की प्राप्ति हो जब तक कि मेरा अपवर्ग न हो।

सकलयोगनिवृत्त्यभिलाषी संत की दोषवाद मौनभावना की युक्तता- मन, वचन, काय की स्थिति क्रिया से रहित, क्रोध मान माया लोभ कषाय की तरंग से शून्य केवल ज्ञानमात्र की चाह करने वाला समाधिभक्त पुरूष सर्व योगों की, मन वचन काय की प्रवृत्ति की निवृत्ति चाहता है।उसमें यह दोषवाद में मौन की भावना की बात चल रही है।मैं दूसरों के दोषों के कहने में मौन रहूं।वचन की प्रवृत्ति कम से कम रखना हमारी शांति में साधक है।अधिक बोलने की आदत में अनेक बार ऐसी बात कह जाता है कि जो किसी न किसी कारण से पछतावे का कारण बनती है, ओछी बात कह जाय, अपने फँसने की बात कह जाय, दूसरे को दुखाने की बात कह जाय अथवा व्यर्थ अधिक बोलने के कारण लोग यह समझेंगे कि यह व्यर्थ ही अटपट असार बोलता रहता है, अथवा अधिक बोलने से खुद में भी रिक्तता का अनुभव होता है, अपने आपमें कुछ भला हो, शुभ शुद्ध भावना कर सकने वाला हो, यहां उसकी बात खत्म हो जाती है।इस कारण अधिक बोलने वाला आखिर दु:खी रहता है।अत: बोलना ही कम से कम चाहिए।और जब बोलने चलें तो हित मित प्रिय वचन बोलें।उसमें गुण की कथा किया करें, परदोषों के कहने में तो मौनभाव ही रखें।

दोषवादव्यवहार में कलहमूलता- लोक में कहावत है कि रोगों की जड़ खाँसी, लड़ाई की जड़ हाँसी।पहिले तो मौज के भाव में हँसी की प्रवृत्ति होती है, पर वह हास्य लड़ाई का ही कारण बन जाता है।बच्चे लोग खेल रहे हो तो उनका खेल तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक कुछ लड़ाई न हो जाय और रो-रोकर अपने-अपने घर न जायें, क्योंकि उन्हें तो खेलने में रूचि है, वे खेल छोड़े कैसे? इसी तरह जब हँसी का प्रसंग होता है तो उस हँसी के सिलसिले में अनुचित व्यवहार बढ़ता है और बढ़ बढ़कर वह व्यवहार तब मिटता है जब झगड़े का रूप हो जाता है, अनबन हो जाती।तो यह हास्य जो व्यवहार है वह अशांति का कारण है और फिर उसमें भी दोष कहने का जो व्यवहार है वह तो प्रत्यक्ष अशांति का कारण है।अत: हे प्रभो ! चाहता तो हूं मैं यही कि मन, वचन, काय की क्रिया से रहित, विषय कषाय के भाव से रहित केवल जाननमात्र अपनी स्थिति को अनुभवूँ।पर ऐसा जब तक अनुभव नहीं जगता तब तक मुझे ये सात बातें मिलती रहें।उनमें से यह दोषवाद मौन की भावना कही है।

हितमितप्रियवचनव्यवहारभावना- अब छठी भावना में बतलाते हैं कि मेरे सबके प्रति हित, मित, प्रिय वचन बनों।मनुष्यों का यह लौकिक जीवन कैसा व्यतीत होता है और होगा, यह वचन बोलने पर आधारित है।जो मनुष्य अप्रिय अहित दु:खदायी वचन बोलता रहता है, चुगली करना, यहाँ वहाँ भिड़ाना, अप्रिय बोलना, उस पुरूष को इस लोक में भी सुख शांति नहीं प्राप्त होती।कारण यह है कि सभी जीव एक समान है।यह बोलने वाला सोचता है कि मैं बड़ा चतुर हूं और बड़ी प्रतिष्ठा वाला हूं; जिस तरह मैं दूसरे को नचाऊँ, दूसरे से बोलूँ, दूसरे से व्यवहार करूँ सो कर सकता हूं, पर दूसरे लोग भी तो इसकी ही तरह अथवा इससे भी बढ़कर समर्थ हैं सो उसका जवाब मिलेगा तो इसे दु:ख ही तो उठाना पड़ेगा।इसका ख्याल भी नहीं लाता यह।अथवा इस असार संसार में मेरे करने लायक कर्तव्य है ही क्या? किसके लिए मैं व्यर्थ अनापसनाप अप्रिय और अहित वचन बोलूँ? सब जीवों के प्रति हित मित और प्रिय वचन हों।किसी जीव ने मुझसे विरोध भी रख रखा हो, उसके प्रति भी बोलने का काम आये तो वहां भी प्रिय और हित वचन बोलना चाहिए।बुद्धिमानी, विवेक इसी में है।

प्रियहितवचनव्यवहार में स्वरक्षोपायत्व- सब अपनी रक्षा की बात है कि सबके प्रति प्रिय हित वचन बोला जावे।कोई दूसरे पर एहसान डालने वाली बात नहीं है।मेरा आत्मा सुरक्षित रहे, शांत रहे, इसके ही उपाय में यह बात कही जा रही है।मैं दूसरों से प्रिय बोलूँ तो लोग मेरा सम्मान करेंगे।मैं दूसरों का उपकार करूँ तो लोग मेरी इज्जत रखेंगे, इस प्रकार के भाव में यह समझिये कि काम तो बड़े श्रम का किया, मगर व्यर्थ गया।एक इतना सा अपने आपके लिए प्रयोजन का आशय रख लेने से उपकार का काम, श्रम का काम, ये सब व्यर्थ चले जायेंगे।सब कुछ यह मैं अपनी रक्षा के लिए कर रहा हूं, ऐसी जिसकी दृष्टि होगी उसके बोलने में, उपकार में भी विशेषता आयेगी और अपने आपमें भी एक तृप्ति उत्पन्न होगी।जो पुरूष ऐसा विचार करते हैं कि मैं इसके भले के लिए यह उपकार कर रहा हूं तो उस काल में भी उसे क्षोभ है और वह विपरीत चले और विपरीत लगेगा ही अनेक बार क्योंकि कषायें सबकी अपनी अपनी जुदी-जुदी साथ हैं, और सभी इस अपनी कषाय के अनुसार अपनी चेष्टा करेंगे, तो उस समय यह बड़ा दु:खी होगा।मैं तो इसके लिए खूब मरा पचा, इसका खूब उपकार किया और यह मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार करता है, इस प्रकार का खोटा उद्देश्य बना लेने के कारण उसे दु:ख उत्पन्न होगा।ये मेरे काम आयेंगे, ये मेरी इज्जत करेंगे, ऐसा खोटा उद्देश्य लेकर कोई सेवा और उपकार का काम करे तो वहाँ आत्मा की रक्षा नहीं है।

प्रियहितवचनव्यवहार का महत्त्व- यह प्रिय हित वचनालाप का व्यवहार, यह सब मैं अपने आपको सुरक्षित रखने के लिए कर रहा हूं।ये प्रिय हितवचन व्यवहार सब ढाल के काम कर रहे हैं।हित, मित, प्रिय वचन बोलना ये एक ढाल की तरह हैं कि दूसरे का मुझ पर वार न आ सके।दूसरे लोग मेरा क्यों बुरा करेंगे? जब मैं व्यवहार ही प्रतिकूल नहीं करता।यह अपनी रक्षा के लिए ही बात है।है यों समाधिभक्ति के प्रकरण में जो कुछ कहा जायेगा वह सब अपने आपके अविकार स्वभाव को प्रकट करने के ध्येय की पूर्ति के लिए कहा जायेगा।सर्वजीवों के प्रति हित, मित, प्रिय वचन हों, फिर आप किसी भी देश जावो, कहीं भी रहो, कहीं क्लेश नहीं पा सकते।नीति में कहा है विद्वान सर्वत्र पूज्यते।राजा तो अपने देश में ही पूजता हैं, पर विद्वान सर्व जगह पूजता है।उसका भाव क्या है कि विद्वान की वाणी प्रियहित हुआ करती है और बुद्धिपूर्ण भी होती है। साथ ही विद्वान भी है ना, तो बुद्धिपूर्ण और प्रिय हित वाणी होने के कारण वह सर्वत्र आदर का पात्र होता है और विद्वान कहते किसे हैं? जो प्रयोजनभूत ज्ञान पर अधिकार पाये हुए है उसे विद्वान कहते हैं।प्रयोजनभूत ज्ञान क्या है? मैं अपने आपके स्वरूप को समझ लूँ- यही मेरा प्रयोजक ज्ञान है।जिस ज्ञान के प्रताप से इसका मोहभाव, रागभाव, द्वेषभाव ये सब दूर हो जाते हैं।तो जो निर्मोह हो गया, संसार, शरीर, भोगों से विरक्ति पाये हुए है उसकी वाणी प्रिय और हितरूप होगी।

प्रियहितवचनव्यवहार से जीवन में आत्मोत्कर्ष की पात्रता- कोई मनुष्य यदि अपने जीवन में यह ही व्रत ले लें कि मैं अप्रिय और अहित वचन न बोलूँगा तो उसका जीवन शांति पूर्ण बनेगा और लोक में बड़ी सुख शांतिपूर्वक रहने का कारण बनेगा।पडौ़सियों से कलह होना, संगवालों से कलह होना इन सबका कारण है अप्रिय वचन बोलना।कितना एक सुगम साधन है कि जिसमें न कोई खर्च है? न श्रम है और सुख शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत हो जाय।नीति में कहा है कि बचने का दरिद्रता, वचन बोलने में दरिद्रता क्यों।बोलना ही तो है, अच्छा बोलें, हितकारी बोलें।केवल प्रिय बोलने से भी बात नहीं बनती।प्रिय के साथ हितकर भी हों।हे प्रभो ! ऐसे वचन मेरे भव-भव में रहो, जब तक कि मेरी मुक्ति न हो।

समाधिभक्त की आत्मतत्त्वभावना- अब अंतिम भावना में कहते हैं कि हे प्रभो ! मेरे आत्मतत्त्व की भावना रहो।पहिले जो 6 भावनायें बतायी गई हैं उन सबकी पूर्ति इस भावना में होती है अथवा उन सब भावनाओं का यह सब फल है।सब कुछ कर लें और आत्मतत्त्व की भावना की बात न बनायें तो फिर इस अमूल्य नर-जीवन को पाकर लाभ क्या उठाया? प्रथम तो यह देखिये कि इस मनुष्यसमुदाय में घुल मिलकर लोगों की निगाह में अपनी इज्जत बढ़ा लिया, उनसे बड़ा व्यवहार रखकर इस 10-20-50 वर्ष की जिंदगी में कौनसा लाभ लूट लिया जायेगा? दुनिया में देखो- सैकड़ों आये, चले गए।यहाँ कोई सदा रह सकेगा क्या? और कोई किसी की अब खबर भी नहीं रख रहा।कोई किसी की खबर भी ले ले तो उससे मेरा क्या? यह आकर्षण, यह लोगों के प्रति अपने उपयोग की घुड़दौड़ ये सब अनर्थ हैं, व्यर्थ हैं, असार हैं, अहित हैं, इनसे जीव को कुछ लाभ नहीं है, इतनी बात यदि दिल में बस गयी तो इन सब बातों में अंतर आ जाता है।तथा तब आत्मतत्त्व में भावना बन जाती है।

लोकेषणा के लगाव से व्यावृत्त होकर रत्नत्रय की उपासना में कल्याणलाभ- यह लगाव का जो विकल्प है जो कि प्राय: सभी लोगों में पाया जाता है कि ये लोग भी समझ जायें मुझे कि यह भी कुछ हैं, ये लोग भी मुझे अच्छा कहें, इस प्रकार का जो लोगों से लगाव है, यह लगाव एक ऐसी विपदा है कि जिससे फिर अनेक विपदायें इस पर आती ही रहेंगी, यह पर के लगाव की बात जिसके हृदय में घर न करे और सत्य जानें कि इतने बड़े लोक में ये सब असीमकाल परंपरा में मायास्वरूप से लगाव लगाकरकोई लाभ न मिलेगा।यहाँ के दिखने वाले समस्त पदार्थ मायास्वरूप हैं, यहाँ किसी भी पर से लगाव रखने में अपना कुछ लाभ नहीं है।मेरा लाभ तो मेरे सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र में है।इतना जिसका उद्देश्य बन गया, ज्ञानप्रकाश हो गया उसको आत्मतत्त्व की भावना करना बिलकुल सुगम है।जैसे मोही जीवों को धर्म की बात कुछ सुहाती नहीं है, उसे ढोंग और व्यर्थ का समझते हैं, यों ही निर्मोह ज्ञानी पुरूषों को इस लोक में बाहर की अंतस्तत्त्व से रंचमात्र भी सुहाती नहीं है।उसे ये सब व्यर्थ अनर्थ असार दिखते हैं।

असार निर्मूल विकल्प में स्वसार की महती क्षति- सारमात्र तो इतना ही है कि मैं अपने को समझूँ, अपने में तृप्त रहूं।यह लाखों की संपदा, ये बड़े-बड़े मकान, ये बड़े-बड़े संबंध, प्रतिष्ठायें, ये चेतन अचेतनपरिग्रह ये सारे के सारे इस आत्मा के लिए अकिन्चितकर हैं।बल्कि ये पदार्थ मेरे अपने आपको बरबादी करने के कारण बनते हैं।आश्रय तो होते ही हैं और इनके परिग्रह के लिए होड़ मचाना, धर्म के लिए समय न रहना, ये सब कितनी सी बात के लिए किए जा रहे हैं कि लोग यह समझते रहें कि यह कितना श्रेष्ठ पुरूष है? प्रयोजन कितना कि जिसमें कुछ जान नहीं, जिसका रूप रंग नहीं, जिसके कोई सिर पैर नहीं, केवल एक कल्पना, भ्रम, इतनी सी बात के लिए कितना अंधेरे में पड़ जाता है यह पुरूष कि धर्म से विमुख हो गया और संकटों के एकदम सम्मुख आ गया।

स्वरक्षाविचार की अत्यावश्यकता- भैया ! आत्मकल्याण के नाते कुछ तो सोचना चाहिए, अपने आपको अकिन्चन अनुभव करना चाहिए।मित्र कौन है? सहाय कौन है? यह अकिन्चन भाव है, न कि यह धन संपदा आत्मा की रक्षा कर सकता है, कौन है? अकिन्चनभाव, न कि यह परिग्रह का लगाव।मैं हूं अकिन्चन्।बाहर में मेरा कुछ भी नहीं है, केवलज्ञान मात्र, आनंदमात्र, भावमात्र अपने प्रदेश में रहने वाला अमूर्त, जिस किसी भव से आया, अकेला ही आया, सर्वसंग छूट गया, अकेला ही जाऊँगा, सर्वसंग छूट जायेंगे।अब इसमें इतना विकल्प रखना कि ये मेरे बच्चे हैं, इनके लिए मुझे सब कुछ करना है, तो ठीक है, करते जावो सब कुछ, पर इस धुन में न धर्म हो सकेगा, न ज्ञानार्जन हो सकेगा, न सत्संग का लाभ लिया जा सकेगा, न कोई आत्महित का प्रोग्राम किया जा सकेगा।इतने बड़े लाभों को तिलान्जलि दे देना एक इस भाव को लेकर कि मेरे ये बच्चे बड़े खुश रहें और धनी रहें, यह कितनी बड़ी गलती का भाव है?

अपने को असहाय बनाने की प्रक्रिया व्यर्थ भ्रांत विकल्पों का लगाव- मरण के बाद तो इसका कुछ है ही नहीं।व्यर्थ का विकल्प मचाया जा रहा है कि मेरा कुल चलेगा।अरे मर गए, अब उस जीव का कुल क्या यहाँ रहा? पता नहीं लोक के किस कोने में पैदा होगा, पता नहीं कौनसा भव धारण करेगा तो इसके लिए यह कुल क्या रहा? लोग कहते रहेंगे कि ये अमुक के संतान हैं।अरे लोग भी न कहेंगे।उन्हें क्या गरज पड़ी है कि आप के गुण बखानते रहें।तो ऐसा कहने वाला कोई नहीं है।और कोई कहे भी तो क्या है? वह स्वयं मायामय दु:खी प्राणी है।उसके कहने से लाभ क्या? तो जब किसी भी जीव से हमारा रंच मात्र संबंध नहीं है तो आज के भव में उन बच्चों के लिए ही मुझे सब कुछ कर जाना है, ऐसा भाव रखकर जो धन जोड़ने की होड़ में लग रहे हैं, यह अपने जीवन को खोया जा रहा है।जैसे लोग सोचते हैं कि काम से फुरसत मिले तो मैं धर्म करूँ, ऐसे ही कभी यह भाव नहीं आता कि धर्म कार्य से फुरसत जितने समय को मिले उतने में मैं अपना काम निपटाऊँ।क्यों यह भाव नहीं आता? अपात्रता है।विषय कषायों की वासना है।आत्मस्वरूप के जानने की तीव्र उत्सुकता नहीं है।एक शब्द में कह लीजिए कि हमारे आत्महित की कोई भावना ही नहीं है।सहाय होगा तो आत्मतत्त्व की भावना का भाव और रंच मात्र कुछ भी सहाय नहीं है।

श्रावकों का धर्मलक्ष्य और कर्तव्यपालन- इस लौकिक लेखे-जोखे में लोगों का बड़ा ध्यान रहता है।जैसे मैंने इतना धन कमाया, इतना अभी और कमाना है, अभी ऐसे ढंग से काम करना है आदि।अरे यह सब क्या है? ये सब व्यर्थ की कल्पनायें और असार बातें हैं, वे जो होती हैं सो होने दो।कर्तव्य है, गृहस्थी में रहकर कि किसी उपाय से धनार्जन करना उस समय में अपना कर्तव्य निभायें और उसमें अपने आप सहज जो प्राप्त हो, जो बात हो उसमें अपनी व्यवस्था बनायें।अपनी ओर से कुछ व्यवस्था न सोचें कि मुझे अपनी इतनी व्यवस्था बनानी है, इतना कार्य करना है, वह आपके आधीन नहीं है।आपका अधिकार तो इस बात पर है कि कर्तव्य करने में जो लाभ होता है उसमें ही अपनी व्यवस्था बना लें।यदि कम आय होने से कम व्यवस्था बनती है वह आपका तपश्चरण है यह गृहस्थों का तपश्चरण है कि यदि कर्तव्यपालन करते हुए कम आय होती है तो उसके अनुसार उतने में ही व्यवस्था बनाना और दूसरे का आराम देखकर जी न ललचाना और यह सब समझना कि ये सब व्यर्थ की बातें हैं, जिनमें लोग लग रहे हैं, जुट रहे हैं, ऐसा भाव रखकर उस आय के अंदर ही अपनी व्यवस्था बनाकर, तृप्त रहकर ज्ञानार्जन के लिए, प्रभुभक्ति के लिए, सत्संग के लिए, आत्मभावना के लिए, ध्यान के लिए, अपना उपयोग जो लगाये, उस मनुष्य की जिंदगी सफल है।

दु:ख सहते हुए भी मोहियों की मोह में मौज मानने की प्रकृति- जैसे जिसको शराब पीने की आदत हो जाती है तो उससे वह निरंतर दु:खी रहता है।शराब के नशे से बेहोश होकर अट्टसट्ट बोले, मरे पिटे, दुर्गति हो, कहीं का कहीं पडा़ है, कुत्ते बिल्ली आदिक भी उस पर मूत रहे हैं, ऐसी तो खोटी अवस्थायें सहता है, पडौसीजन उस पर विश्वास न करें, कोई उसे रूपया पैसा उधार न दे, यों अनेक तरह के वह कष्ट भोगता रहता है, फिर भी वह व्यसनी मद्य की धुन में रहता है।ऐसी ही आदत मोही जीवों की है कि वे अनेक प्रकार के झंझटों से दु:खी होते जाते, नाना प्रकार की परेशानियाँ सहते।और अलौकिक दु:ख तो यह है कि निरंतर क्षोभ बना रहता है, क्षोभरहित सहजपरमात्मतत्त्व की सुध भी नहीं कर पाता है, सबसे बड़ा संकट तो यह सहता रहता है, इतने बड़े संकट सहते हुए भी चाह यही रहती है मोह करने की, राग बढ़ाने की, स्नेह करने की और उसमें ही समझते हैं कि मुझे सुख होगा।दु:ख के कारण जुटाते हैं, दु:ख भोगते हैं और सुख की आशा करते हैं।दूसरे की बात तो झट समझ में आ जाती है।जैसे दीपक जलता है तो पतंगे दूसरे पतगों को जलता हुआ देखते हैं, फिर भी उस दीपक पर ही गिर कर मरते हैं, इसी तरह जिस काम में जिन विषयों के प्रसंगो में दु:ख है, क्लेश है, बरबादी है बस उसी में ही पड़ते हैं, उसी में ही गिरते हैं, थोड़ा भी समय ऐसा स्पष्ट नहीं बनाते हैं कि जिस समय केवल मुझे आत्मध्यान, परमात्मस्वरूप का ध्यान, प्रभुभक्ति इनका ही प्रसंग रहे।निरंतर मोह भावना बनी रहती है।अहो मोही जीव का जीवन जन्म मरण की परंपरा बनाने के लिए है।

आत्मतत्त्व को जानते रहने में भावना के स्वरूप की व्यक्ति- जो अपने आपमें आत्मतत्त्व की भावना रखता है उसे तत्काल भी शांति है, भविष्य में भी शांति है।ज्ञान का काम जानना है और भावना क्या कहलाती है? बारबार जानना, जानते रहना, इसका नाम भावना है।तो जब ज्ञान का काम जानता है, यह जानना है तो जानने की ही बात कही जा रही है।जैसे आँखें खोली तो बेन्च दिखी, जान गए बेन्च को, इसमें कुछ कष्ट हुआ क्या? कुछ भी कष्ट नहीं हुआ।मन चलाया, जिस जगह पहुंचा लो जान लिया।उस जानने में कुछ भी तो कष्ट नहीं करना पडा़।जानने में कुछ कष्ट होता ही नहीं है।पर जानने के साथ जो राग द्वेष मोह लगा हुआ है उस भाव से कष्ट है।तो अब यहां यह विवेक करें कि मैं ऐसी बात को न जानूँ कि जिसके जानने में मोह राग द्वेष हम पर सवार हो जायें।ऐसा बस विवेक करना।मैं ऐसा ही तत्त्व जानूँ कि जिसके जानने में मोह रागद्वेष का अवकाश ही नहीं है।ऐसा तत्त्व मिला आपको अपने आपमें अपना आत्मस्वरूप सो उसकी भावना करनी चाहिये।

विविक्त आत्मतत्त्व में भावना बनाने से प्राप्त सुयोग की सफलता- यह मैं आत्मा सारी दुनिया से निराला हूं।इस देह से भी निराला हूं।देह में रहता हुआ जीव देह से भिन्न है और समय आने पर देह को छोड़कर चला जाता है, लोग इस देह को जला डालते हैं अथवा कहीं फेंक देते हैं।तो ऐसा यह देह ही मेरा सर्वस्व हो गया क्या? मैं तो इस देह से भी निराला प्राप्त समागमों से भी निराला केवल एक ज्ञानमूर्ति हूं।ऐसी दृष्टि बने तो श्रावककुल में पैदा होना सो सफल, जैनशासन में आना सो सफल है।अगर अपनी दृष्टि धन वैभव आदिक बाह्यपदार्थों में लग गयी तो उससे कुछ भी लाभ नहीं हैं।यह आत्मा तो खोखला ही रहा।एक जबरदस्ती की शान बनाना और भीतर में अपने आपको सम्यक्त्व से बहिर्भूत, ज्ञान से न्यारा, चारित्र से दूर अपने को रखना, विषयकषायों में लगाना, ये सब बातें हैं क्या? अपने आपको खोखला बनाने वाली ये बातें हैं इनसे इस जिंदगी की सफलता नहीं है।हे प्रभो ! जो सार तत्त्व है, वीतराग विज्ञान भाव है वह मेरे प्रकट हो।ऐसे इस ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व में मेरी भावना भव-भव में बर्तो, जब तक कि मेरे अपवर्ग की प्राप्ति न हो।


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