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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधिभक्ति - श्लोक 3

From जैनकोष



जैनमार्गरूचिरन्यमार्गनिर्वेगता जिनगुणस्तुतौ मति:।

निष्कलंकविमलोक्तिभावना: संभवंतु मम जन्म जन्मि।।3।।

भव-भव में मंगलमय भावना का भाव- हे देव ! मेरी भव-भव में जैनमार्ग में रूचि, अन्य मार्ग से विरक्ति जिन-गुण स्तुति में बुद्धि और निष्कलंक विमल वाणी में भावना होओ।यहाँ कहा गया है कि जन्म-जन्म में ये चार बातें प्राप्त हों, किंतु पूर्व छंद की भांति यहां मोक्ष प्राप्त होने तक की सीमा की बात नहीं कही कि जब तक मेरी मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक भव भव में ये चीजें प्राप्त हों।न भी कहा हो तो भी भाव यही है।भक्ति की तीव्रता में जान समझ कर भी सीमावाली बात नहीं कही जाती।जैसे किसी मित्र से कोई स्नेह भरी बात करे, मैं तुमको इस जीवन में कभी नहीं भूल सकता, कहते ही हैं ऐसा, पर उसके भीतर भाव यह है कि जब तक हमारी तुम्हारी मित्रता है तब तक मैं तुम्हें जीवन में भूल नहीं सकता, लेकिन मित्र से क्या इस तरह से कहा जाता है कि जब तक हम आपका मन मिल रहा है तब तक मैं आपको नहीं भूल सकता? ऐसा कोई कहता तो नहीं, पर भाव यही है।इसी प्रकार प्रभुभक्ति के समय यह कहा तो थोड़ा भक्ति में भंग समझिये कि हे प्रभो ! जब तक मुझे मोक्ष न मिले तब तक मैं आपकी पूजा करूँगा।तो भक्ति की जब तीव्रता होती है तो उस समय यही कहा जायेगा कि मैं जन्म जन्म में आपका दास रहूं।कहते भी हैं, ऐसा कोई नहीं कहता कि हे प्रभो ! जब तक मैं तुम्हारे सरीखा न बन जाऊँ तब तक मैं आपका दास रहूं।भक्ति में ऐसा कहने की प्रवृत्ति होती है।

समाधिभाव की धुन के समय की पूर्वकथित सप्तभावनाविधि- यहां आप शंका कर सकेंगे कि इस छंद से पहिले छंद में जो पहिले निकल गया है उसमें यों कैद की बात कहना कि जब तक मेरा अपवर्ग न हो तब तक ये 7 बातें मुझे भव-भव में मिलें, यह कैसे युक्त होगा।समाधान- दूसरा जो छंद था वह समाधि भक्ति के उच्च वर्णन के बाद आया।पहिले छंद में कहा गया था कि अपने आत्मा के अभिमुख सम्वेदनरूप हे भगवान् श्रुतज्ञान रूपी नेत्र से देखता हुआ मैं तुमको केवलज्ञान नेत्र से देखता हूं।जहाँ अरिहंत के रूप में न सुमरा, सिद्ध के रूप में न सुमरा और एक स्वात्माभिमुख सम्वेदन के रूप में भगवान को निरखा और वहाँ इतने वेग के भाव से अपने आपमें चले कि श्रुतज्ञान नेत्र से देखता हुआ अब मात्र ज्ञाननेत्र से देखता हूं, इस छंद के बाद सविकल्प अवस्था के लिए प्रभु से अभ्यर्थना कर लेना तो चाहा, लेकिन समाधि के शुद्ध स्वरूप की निगरानी के आशय में रहकर जब सविकल्प अवस्था के लिए कुछ अभ्यर्थना की तो वहाँ समाधि संबंधित विवेक रहा और तब यह सीमा की गई कि जब तक मेरा अपवर्ग न हो तब तक 7 बातें मुझे भव-भव में प्राप्त होती रहो।

जैनमार्गरूचि का उद्देश्य- अब उसके बाद जिनेंद्र भगवान वीतराग सर्वज्ञदेव के स्वरूप में भक्ति तीव्र उमड़ी, उस समय तीसरे छंद में कह रहे हैं कि मुझे जन्म-जन्म में ये 4 बातें प्राप्त हों।जैनमार्ग में रूचि प्राप्त हो, जैनमार्ग की रूचि कहो या रागद्वेष के जीतने के उपाय की रूचि हो, यह कहो, एक ही बात है।जैसे पूछा जाय किसी अंधे व्यक्ति से कि हे सूरदास, तुम्हें क्या चाहिए? तो वह यही कहेगा कि मुझे दो नेत्र चाहिएँ।ऐसे ही किसी भव्य आत्मा से पूछो जिसका होनहार भला है, हे आत्मन् ! तुम्हें क्या चाहिये? तो वह यही कहेगा कि मुझे तो संसार के समस्त संकट छूट जायें ऐसा उपाय चाहिए और कुछ न चाहिए।तो सर्वसंकटों से छूटने के उपाय का ही नाम जैनमार्ग है।

जैनमार्ग की निष्पक्षता की झांकी- यहां यह गर्ज नहीं पड़ी है भगवान को कि हे भक्त ! तुम मेरा स्तवन करो, तुम मेरी उपासना करो, तुम मेरी ही शरण में आवो।जो रागद्वेषरहित है, सर्वज्ञ है, अनंत आनंद में लीन है ऐसे प्रभु की वाणी भी नहीं होती।वहाँ तो सशरीर परमात्मा की अवस्था में भव्य जीवों के भाग्य से दिव्यध्वनि प्रकट होती है।जिस ध्वनि में यही उपदेश है कि हे आत्मन्! तुम अपने आपके स्वरूप को पहिचानो और अपने आपमें लीन हो जावो।जैसे कोई पुरूष नदी के एक घाट से पैदल चलकर दूसरे किनारे पर पहुंच गया तो वह वहाँ खड़ा हुआ दूसरे घाट वाले को कहता है कि देखो- इस ओर से आवो, यहीं से चलकर हम भी किनारे आ गए हैं ऐसे ही प्रभु का संकेत है कि हे भव्य जीवों ! तुम इस मार्ग से चलो तो मुक्ति प्राप्त करोगे।देखो- उसी मार्ग से चलकर मैं भी इस संसार महानदी के तट पर आ गया हूं।तो जो मार्ग मुझे संसार के संकटों से सदा के लिए छूटा देगा उससे बढ़कर उसके लिए कुछ जरूरी है क्या? जैनमार्ग में रूचि हो, जो मार्ग सही विधि-विधान पूर्वक बताया गया है।

जीव पर वास्तविक संकट और उससे छुटकारे का यत्न- अच्छा, बोलो-तुम्हें संकटों से छूटना है? हाँ, तो पहिले यह निर्णय करो कि संकट है क्या, जिससे कि छूटना है।लोग कहते कि मेरा घर गिर गया, मुझे छत सुधरवाना है, दुकान में ग्राहक कम आते हैं, मुझ पर बड़े-बड़े संकट लगे हैं।घर में स्त्री ढंग से नहीं बोलती, पुत्र आज्ञा नहीं मानते।इन सब संकटों से छूटना है।अरे जीव ! ये तो तेरे पर संकट हैं ही नहीं, तू तो समझ रहा है संकट।तुझ पर संकट यह है कि इन बाह्य वस्तुओं में तू अपना लगाव रख रहा है, संकट यह है तुझ पर।छत गिर गयी तो क्या हुआ? दुनिया के मकान गिरते हैं, पुत्र कुपूत निकल गया तो क्या हुआ? दुनिया में भरे हुए हैं ऐसे खोंटे लोग।संकट तो तुझ पर यह है कि यहां पर तेरा कुछ है नहीं, स्वरूप चतुष्टय न्यारा-न्यारा है और उस पर के प्रति तेरा लगाव लग रहा है।यही मेरा सब कुछ है, यह है संकट। और तुझे इन भीतर समस्त संकटों से छूटना है तो यह जानना होगा कि मैं केवल अमूर्त ज्ञानानंद स्वरूप मात्र हूं, मेरा मेरे से बाहर किसी भी पर के प्रति रंच भी संबंध नहीं है।

संकटमुक्ति के उपाय में एकत्वविभक्त अंतस्तत्त्व की श्रद्धा की प्रथम आवश्यकता- संकटों से छूटने के उपाय में सर्वप्रथम यह बताया है कि हम अपने आत्मा को एकत्व विभक्त समझ लें।एकत्व का अर्थ है मैं अपने आपके स्वरूप में जिस स्वभावमय हूं, मात्र मैं अकेले अपने सहज सत्त्वमात्र उस स्वरूप में निरखना यही है अपने को एकत्व में देखना।और अपने को विभक्त रूप देखना, इसका अर्थ यह है कि मेरे स्वरूप से बाहर जो जो कुछ भी है, उससे मैं निराला हूं।धन धाम, परिजन मित्रजन ये तो प्रकट जुदे हैं, उनसे तो मैं निराला हूं ही।यह देह जो मेरे साथ लग रहा है इससे भी मैं जुदा हूं और उसके ही प्रदेश में रग-रग में भरा पड़ा हुआ जो कर्मबंध कार्माण शरीर है उससे भी मैं निराला हूं और तो क्या; उन कर्मोदय के निमित्त से जो भी विकार उत्पन्न होते हैं- क्रोध, मान, माया, लोभादिक उनसे भी मैं निराला हूं।जैसे कि दर्पण में आने वाला प्रतिबिंब दर्पण से निराला है, वह प्रतिबिंब दर्पण का स्वत्व नहीं है, औपाधिक विकार है ऐसे ही यह मैं समस्त परतत्त्वों से निराला हूं, इस प्रकार निरखने को कहते हैं विभक्त्व दर्शन।

आत्मोद्धार का उपाय एकत्वविभक्तदर्शन- अपने आपको एकत्व विभक्त के रूप में निरखो, आत्मा के उद्धार के उपाय में सर्वप्रथम यही उपदेश है रागद्वेष जीतने वाले प्रभु का।कोई इस उपाय को तो करे नहीं और लगा रहे श्रम में, धर्म के नाम पर पूजा, पाठ, स्तवन, जाप आदि करने के बड़े-बड़े श्रम करे, लेकिन उस भक्त की दयनीय दशा तो देखो कि वह और सब कामों में दिल भर कर जायेगा, मगर तत्त्व की जहाँ बात हो वहाँ से पीठ फेरकर जल्दी ही भागेगा, वहाँ समय न मिलेगा।तो यह धर्म की रूढ़ि में लगने वाले की कितनी दयनीय दशा है? आत्मा का उद्धार करने वाला ज्ञानप्रकाश ही है, प्रभुस्तवन आदि में भी ज्ञानप्रकाश पाते जाओ तो वह भी ठीक है।ज्ञानप्रकाशातिरिक्त अन्य किसी भी पदार्थ में सामर्थ्य नहीं है कि आत्मा को संकटों से छुटाकर परमतृप्ति में ले जाय।तो समस्त संकटों से छूटने का उपाय जहाँ ऐसा मौलिक बताया है जिसका मूल पुष्ट करके चलाने का भाव है उस जैनमार्ग में हे प्रभो ! मेरी दिन प्रतिदिन रूचि बढ़ो।

मार्ग का स्वरूप- मार्ग कहते हैं यत्न को।जिस यत्न के द्वारा उपेय ढूँढ़ा जाय।रास्ते का नाम मार्ग नहीं, सड़क का नाम मार्ग नहीं किंतु जिस यत्न के द्वारा अभीष्ट साधन ढूँढा जाय उसको मार्ग कहते हैं।लोग जहाँ जाना चाहते हैं वह है उनका अभीष्ट स्थान और उसकी प्राप्ति जिस यत्न के द्वारा होगी उसे कहते हैं मार्ग।सो सड़क का नाम मार्ग रख दिया गया।मार्ग का शुद्ध अर्थ यह है कि जिस यत्न के द्वारा परम अभीष्ट तत्त्व की प्राप्ति हो उस यत्न को मार्ग कहते हैं।इस जैनमार्ग की, आत्मज्ञान की महिमा को इंद्र भी हजारों लाभ बनाकर वर्णन करे तो करने में समर्थ नहीं है, लेकिन यह जीव अपनी शुद्ध दृष्टि रखकर केवल एक आत्महित की वान्छा लेकर अपने आपमें निरखे, निरखना चाहे, यत्न करे तो उसका साक्षात् अनुभव कर सकता है।

परदृष्टि में अंत: अंधकार- हे आत्मन् ! तुम्हें क्या चाहिए।सर्व संकटों से छुटकारा, तो प्रयोग करके देखो अपने आपमें अपने स्वरूपमात्र को तो निरखो, बाह्यपदार्थ चाहे कितने ही स्नेही हों, बड़े ही कलावान पुरूष हों, बड़े आज्ञाकारी हों, वे समस्त परिजन भिन्न ही हैं, उनकी कला का फल उन्हें मिलेगा, उनकी चतुराई का, उनके सदाचार का फल उन्हें मिलेगा।यह जीव यदि पर में दृष्टि लगायेगा, आकर्षण बनायेगा, लगाव रखेगा तो यही तो है तिल की ओर पहाड़ जैसी बात।जैसे आँखों के आगे तिल बराबर कागज लगा दिया जाय तो सब कुछ ढक गया, सारा अँधेरा हो गया, इसी प्रकार पर में यदि लगाव है, पर की ओर उपयोग है तो भीतर में अंधेरा ही रहेगा।जैसे बहुत छोटी टार्च का थोड़ासा ही मुख बदल दिया जाय, पूरब की ओर से पश्चिम की ओर को मुख कर दिया जाय तो पूरब की ओर सारा अँधेरा ही हो जायेगा।वहाँ यह सिफारिश न चलेगी कि हमने तो थोड़ा सा ही इसका मुख मोड़ा है।इसी तरह यह उपयोग यदि जरा भी पर की ओर लग गया तो फिर उसमें आपके भीतर सारा अँधेरा ही रहेगा।हाँ जिस आत्मा ने बराबर अपने आत्मा की ओर उपयोग को अभिमुख करके अपने आपके स्वरूप की जानकारी का अभ्यास बना लिया है ऐसा पुरूष कभी कर्मोदयवश बाह्य की ओर उपयोग लगाता है तो भी उसकी प्रतीति उसकी रक्षा करती है।लेकिन प्रतीति बनाने के लिए उस अनुभव की बहुत बार आवश्यकता है।

सर्वस्थितियों में जैनमार्गानुवासितता की अभ्यर्थना- अहा ! जहां समस्त संकट एक साथ एकदम पूर्ण रूप से छुटकारा पाने के लिए मौलिक उपाय से जीवों को मार्ग में लगायेंगे उस मार्ग का हम कितना अभिनंदन करें, कितना आभार प्रकट करें, उसके लिए कोई शब्द नहीं है।हे प्रभो ! मेरी जन्म-जन्म में इस जैनमार्ग की रूचि बनी रहे।भक्त कहता है कि मैं जैनमार्ग से रहित होकर चक्रवर्ती भी न होऊँ।उससे मुझे क्या लाभ? अँधेरा ही रहेगा, क्षोभ ही बढ़ेगा, आकुलता ही रहेगी और जैनमार्ग की सेवा मिलते हुए में यदि मुझे किसी का दास भी रहना पड़े तो वह मुझे स्वीकार है।देखिये- लौकिक पुरूष तो यह भावना करते हैं कि चाहे कैसा ही बीते पर मैं मालिक बनकर रहूंगा तो मुझे सुख प्राप्त होगा, पर यह ज्ञानी संतपुरूष ऐसी भावना भाता है कि जैनमार्ग की रूचि से रहित होकर मैं मालिकों का मालिक चक्रवर्ती भी नहीं होना चाहता हूं और जैनमार्ग में अनुवासित होकर यदि मैं छोटे से छोटे पुरूष का भी दास रहूं, तो भी मुझे स्वीकार है।क्या स्वीकार किया गया? जैनमार्ग की रूचि।

ज्ञानप्रकाश से ही संकटों के क्षय का स्मरण- अपने जीवन की वर्तमान घटनाओं में, अतीत घटनाओं में या कल्पना करके भविष्य की घटनाओं में इस तरह का चिंतन तो करें कि जब कभी पर की ओर तेज दृष्टि होने के कारण चित्त में क्षोभ रहता है उस समय समझाने वाले लोग कितना ही समझायें पर उसकी समझ में कुछ नहीं आता।जैसे किसी को इष्ट-वियोग हो गया तो अनेक लोग बहुत-बहुत समझाते हैं पर उसकी समझ में कुछ नहीं आता।उसके चित्त में वही-वही बसता है।अनेक लोग उसका दिल बहलाने के लिए जगह-जगह घुमाने के लिए इधर उधर ले जाते, सनीमा, थियेटर वगैरह भी दिखाने ले जाते, यों अनेक कोशिशें करते हैं कि इसका विषाद समाप्त हो जाय, पर वे सब लोग अपने सारे प्रयत्न व्यर्थ पाते हैं और जब कभी स्वयं ही उसके भीतर में ज्ञानप्रकाश जगता है और अपने आपके एकत्व का उसे क्रोध होता है, सबसे निराला केवल ज्ञानमात्र यह मैं आत्मा हूं, मेरा सब कुछ यही है, इस प्रकार का जब बोध होता है तब उसके वियोग की दृष्टि स्वयमेव ही दूर हो जाती है।लोग तो यह समझते हैं कि मैंने बहुत समझाया तब इसको ज्ञान जगा, पर ऐसी बात नहीं है।जब ज्ञान उन संकटों के बहुत कुछ सह लेने के बाद अपने आप ही उसके अंदर से प्रकट होता है तो उस एकत्व के ज्ञान के प्रकाश में वे सारे संकट स्वयं ही दूर हो जाते हैं।किसने संकट दूर कराया? इस जैनमार्ग ने।जैनमार्ग कहो अथवा आत्मा के श्रद्धान, ज्ञान और आचरण का मार्ग कहो, एक ही बात है।हे नाथ ! रत्नत्रय धर्म में मेरे रूचि जागृत रहो।

अन्यमार्गनिर्वेगता की भावना- हे प्रभो ! सर्वसंकटों से छुटकारा दिलाने वाले इस जैनमार्ग में मेरी भव-भव में रूचि बनी रहे।जहां संकटों से छूटने के उपायों में रूचि की बात कही जा रही है वहां यह भी आ गया कि इसके अतिरिक्त जो अन्य मार्ग हैं, संसार में रागद्वेष मोह में अज्ञान में फँसाने वाले, पर की ओर झुकाने वाले अन्य मार्गों से मेरी विरक्ति रहे।धर्म संबंधित अन्य मार्ग और लौकिक तो सारे ही अन्य मार्ग हैं, उन सबसे मेरी विरक्ति रहो।जिस देव को निरखकर निवृत्ति की शिक्षा न मिले और उल्टी प्रवृत्ति, पराधीनता, कल्पनाओं की वृद्धि, परदृष्टि को ही बढ़ावा मिले उसकी भक्ति में हम अपना क्या लाभ पा लेंगे? हानि ही है।जिन शास्त्रों के पढ़ने से सर्वप्रकार से निवृत्त होकर ज्ञानमात्र निजस्वरूप में रमने की प्रेरणा न मिले और बिना इस यत्न के अथवा आत्मानुभव के खिलाफ बाह्यपदार्थों में दृष्टि रूचि करने की प्रेरणा मिले, ऐसे शास्त्रों के अध्ययन से क्या लाभ लूट लिया जायेगा।जिस गुरु के दर्शन से समस्त परतत्त्वों से विरक्त होकर अपने आपके उस ज्ञानमात्र एकत्वस्वरूप की रूचि न जगे और उल्टी उलझनें बढें, जिनके बाहरी प्रसंग निरखकर, परिग्रह देखकर, व्यवहार निरखकर, स्नेह देखकर जहां भक्त में उलझनें बढ़े, ऐसे गुरु के प्रसंग से क्या लाभ लूट लिया जायेगा? हे प्रभो ! जैनमार्ग से अतिरिक्त अन्यमार्ग से विरक्ति हो और रागद्वेषादि विकारों को, संकटों को नष्ट करने का मार्ग मुझे प्राप्त हो।

जैनमार्गानुयायिता का प्रभाव- भतृहरि और शुभचंद्राचार्य राजपुत्र ये दोनों सगे भाई थे, परस्पर में बड़ी प्रीति थी।कारण पाकर दोनों भाईयों को राजपाट धन वैभव से उपेक्षा हुई।भतृहरि ने तो कोई संन्यास मार्ग ग्रहण किया और शुभचंद्र ने जैनमार्ग ग्रहण किया।बहुत काल तक तपश्चरण के बाद भतृहरि को कोई रस सिद्ध काल हो गया, जिसको लोहे पर डाला जाय तो लोहा स्वर्ण बन जाय।भतृहरि बहुत प्रसन्न हुए।और उन्होंने सोचा कि जरा अपने भाई को तो देख लें कि वह किस स्थिति में है।सो अपने शिष्यों को अपने भाई को देखने भेजा।शिष्य लौटकर आये और उन्होंने बताया कि आपका भाई तो बड़ी दयनीय स्थिति में है।अकेले जंगल में रहता है, उसके साथ खाने पीने का भी कोई साधन नहीं, साथ में कोई सेवक भी नहीं, यहाँ तक कि उसके शरीर पर वस्त्र भी नहीं है।तो भतृहरि अपने भाई की हालत सुनकर उस रस को अपने शिष्य के हाथ शुभचंद्र के पास भेजा और कहला दिया कि अब तुम मत कष्ट सहो।मुझे यह रस सिद्ध हो गया है।आप इसे लें और मनमाना स्वर्ण बनाकर सुखमय अपना जीवन व्यतीत करें।शिष्य ने यों ही कह दिया शुभचंद्र से तो शुभचंद्र ने उस रस को लेकर जमीन पर बिखेर दिया।तो शिष्य भतृहरि के पास जाकर कहता है कि महाराज आपका भाई दु:ख की हालत में तो है ही, साथ ही उसका दिमाग भी ठीक नहीं है।उसने तो सारा रस जमीन पर ही बिखेर दिया।तो भतृहरि वहां स्वयं गए और बड़ी प्रीति पूर्वक अपने भाई को रस सौंपा और उस रस की प्रशंसा की तो शुभचंद्र जी कहते हैं कि भाई ! राजपाट के समय में कौनसी कमी थी? जिसे छोड़कर यहां आयें हैं।भतृहरि ने जब उस रस की पुन: बड़ी प्रशंसा की तो शुभचंद्र ने अपने पैरों के नीचे से धूल उठाकर एक शिला पर डाल दिया तो वह शिला स्वर्णमय हो गयी।यह बात केवल भतृहरि को संबोधने के लिए शुभचंद्र ने किया और कोई उसका प्रयोजन न था।शुभचंद्राचार्य तो स्वानुभूति सुधारस से तृप्त थे।तो जहां ऐसा शुद्ध सम्यक्त्व शुद्धज्ञान और एकत्वविभक्त सहज शुद्ध ज्ञानानंद स्वरूपमात्र आत्मतत्त्व में रमण का उपाय बताया गया हो ऐसे मार्ग को छोड़कर अन्यमार्ग में, अन्य उपाय में, अन्य विकल्प में मेरा जन्म-जन्म में वैराग्यभाव रहे।

जिनगुणरूचि में स्वभावदृष्टि का सहयोग- वस्तु का यथार्थ स्वरूप जान लेने के कारण जिसको अब किसी प्रकार की शंका नहीं रही, भय नहीं रहा समस्त परद्रव्यों से उपेक्षाभाव जग गया और निज सहज ज्ञानानंद स्वभाव मात्र ही लखने के लिए जिसकी धुन बन गयी, ऐसा पुरूष जब इस निर्विकल्प भाव में कर्मविपाशकवश नहीं रह सका तब वह अपनी भावनायें बना रहा है।मेरी जन्म-जन्म में जिनगुण स्तुति में बुद्धि रहे।भैया ! सब कुछ बात बुद्धि से चलती है।जिसकी जहां बुद्धि लग जाय उस पर वैसा ही प्रभाव बनता है।जीव कौन बुरा है।जैसे यहां लोग एक दूसरे से घृणा किया करते हैं, घृणा के योग्य कौनसा जीव है? जीव, जीव सब एक समान हैं।स्वरूप सबका पवित्र है।चैतन्यमात्र है।यहाँ घृणा के योग्य कोई नहीं है।किंतु बात इतनी ही अंतर में आयी कि किसी जीव की बुद्धि विषय अन्याय स्वार्थ की ओर लग गयी, किसी जीव की बुद्धि सम्वेग, वैराग्य, ज्ञान, ध्यान, आत्मा, प्रभु इनकी ओर लग गयी, तो बुद्धि के लगने से ही इतना बड़ा अंतर आ जाता है कि कोई जीव घृणा के योग्य बन गया, कोई पूज्य बन गया।जीव के स्वरूप को देखो तो मूलत: सब समान हैं।

उचित आश्रय में बुद्धि के लगने की अभ्यर्थना- अहो,जिनकी बुद्धि विषयों की ओर लग गयी, बुद्धि ही तो लगी, न लगती बुद्धि उन विषयों की ओर तो इसका कुछ बिगाड़ तो न था, बल्कि आनंद में ही रहता।तो कोई मूल्यवान् भी प्रसंग नहीं है कि क्या करें, यह तो करना ही पड़ेगा।दूसरा कोई गुजारा ही नहीं।सारा काम बिगड़ता है।यदि राग न करें, मोह न करें, विषयों में न लगें तो यह कैसे बनेगा? वह तो काम वास्तविक पड़ा ही हुआ है।यह तो हमें करना ही पड़ेगा, ऐसा कुछ मूल्य तो नहीं है।ऐसी कुछ भी बात नहीं है।लेकिन व्यर्थ ही बुद्धि लग गयी और जिससे अनर्थ ही हुआ सो हे नाथ ! एक बुद्धि लगने भर की ही तो बात है।मेरी बुद्धि जिनगुण की स्तुति में ही लगे तो मैं बड़े से बड़े संकटों से तुरंत ही बच जाऊँगा।रागद्वेष मोह पर विजय पाने वाले, अपने आपको केवल ज्ञानस्वरूप अनुभवने वाले, ज्ञानविकास के कारण समस्त लोकालोक को प्रत्यक्ष जानने वाले जो उत्कृष्ट आत्मा हैं उन आत्माओं में मेरी बुद्धि लगे, ऐसा समाधिभक्त पुरूष अपने हित की भावना कर रहा है।

बुद्धिधारास्रोत के स्थल पर बुद्धि के संभाल की आवश्यकता- जैसे कोई निर्णय होने के लिए कागज में कुछ लिखकर गोलियां बना दी जातीं हैं।नाम की अथवा व्यक्ति के नाम की और बच्चों से उठवाई जाती हैं।उस बच्चे से जिस नाम की गोली उठ गई उसको वह चीज मिल जाती है।तो उस प्रसंग में कोई यह हिसाब तो नहीं है कि इस बच्चे को अमुक चीज मिलेगी।जिस बच्चे ने जो गोली उठा ली सो चीज मिल गई।यों ही समझिये कि इस बुद्धि के लगाने का भी कुछ हिसाब किताब नहीं है। (किसी स्थिति की बात कह रहे हैं) जैसे जो पुरूष ज्ञानवान् है, वह सब कुछ समझता है, लेकिन कर्मविपाक भी उदय में आ रहा है, ऐसे पुरूष की बुद्धि कोई कारण पाकर कभी किसी जगह लग जाय, कभी किसी जगह लग जाय तो एक अचानक लगने भर की बात है।तो ऐसी बुद्धि लगने की बात मेरी हे प्रभो ! आपके गुणस्मरण में हो।कहीं विषय आदिक में बुद्धि न लगो।यहाँ थोड़ा संबंध है बुद्धि लगने के विषय में कि योग्यता भी अपनी जैसी है और भाग्य जैसा है उस अनुकूल बुद्धि चलती है।इतना होने पर भी योग्यता ठीक आ गई और इस स्थिति पर कोई पुरूष है कि विषय परिग्रह प्रतिष्ठा की ओर बुद्धि लगाये तो वहाँ भी लग सके और प्रभुभक्ति ज्ञानार्जन ध्यान की ओर बुद्धि लगाये तो वहां भी लग सके।वह तो एक ऐसी संकीर्ण जगह पर ठहरी हुई बुद्धि है कि किस ओर लग जाय? ऐसी स्थिति में हे प्रभो ! मेरी बुद्धि गुण के स्तवन में ही लगे।

प्रभुगुणस्तवनमति में चिंता भय शोक आदि संकटों का अनवकाश- प्रभुगुणस्तवन में बुद्धि लग रही हो तो फिर उसे कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं, कोई शोक नहीं, वह स्वाधीन है, किसी के परतंत्र न रहा, किसी की आशा प्रतीक्षा में उपयोग नहीं ढुल रहा।कितनी आनंदमय स्थिति है, किंतु इसके लिए हमें उस स्थिति में अपनी बुद्धि की संभाल करना है जहाँ से दो धारायें कुछ भी बह सकती थीं।चाहे विषयों की ओर बुद्धि लग जाती या प्रभुगुण स्तवन में बुद्धि लग जाती।संभाल की बात असली तो वहां की है कि जिस स्थिति में किसी भी ओर बुद्धि ढल सकती है।वहां यदि प्रभुगुणस्तवन की ओर बुद्धि ढले, फिर तो बुद्धि लगी सो लगी ही रहेगी।पात्रता ही उसमें उत्तम है।बुद्धि तो लगनी चाह रही है, कहीं लगो, लगे बिना नहीं रह सकती बुद्धि।कोई भी पदार्थ हो, परिणमें बिना तो नहीं रह सकता।वह तो परिणमेगा ही।तो बुद्धि भी है, ज्ञान भी है, वह परिणमें बिना तो नहीं रहेगा।उसका तो परिणमन होगा ही और परिणमन क्या है? किसी में उपयोग लगना।उस बुद्धि को तो लगने भर से मतलब है।अब यहां इतना विवेक करना है कि हम ऐसी जगह बुद्धि लगा दें कि जहां सब आनंद ही आनंद है।शुद्ध ज्ञानमय अपने स्वरूप के समान परमात्मा में जिसमें स्वरूप व्यक्त हुआ है (वह मुझमें व्यक्त नहीं है, इतना ही तो अंतर है) उस परमात्मप्रभु के गुणस्तवन में बुद्धि लगी हो तो बुद्धि खाली नहीं लग रही है, समय भी अच्छा कट रहा है, और गुणविकास का भी उत्साह जग रहा है, शुद्ध आनंद भी प्रकट हो रहा है।किसी अन्य की पराधीनता नहीं रही है।कोई चिंता शोक भी नहीं रहता है।मैं केवल इतना ही ज्ञानानंदमात्र हूं, मुझे चिंता क्या? जिसका जो कुछ होता हो वह उसके उपादान से है।फिकर क्या? वस्तुस्वरूप को यथार्थ जान लेने पर नि:शंक होकर प्रभुगुणस्मरण में उपयोग लगता है।तो हे प्रभो ! मेरा प्रभुगुणस्मरण में उपयोग बना रहो, जन्म-जन्म में।भाव इसका यही है के जब तक मुझे निर्विकल्प स्थिति न प्राप्त हो तब तक मेरा प्रभुगुणस्मरण (स्तवन) बराबर रहो।

निष्कलंकविमलोक्तिभावना- चौथी भावना में समाधिभक्त संत कह रहा है कि निष्कलंक, निर्मल वाणी में मेरी भावना रहो।निष्कलंक विमल वाणी में प्रतीति कब हो सकती है? जब पहिले अपने आपके एकत्व विभक्त स्वरूप का निर्णय बन जाय।जब तक पर्याय बुद्धि रहती है तब तक तो कुछ न कुछ पक्षपात रहेगा।जाति, कुल, मजहब, गोष्ठी आदि का अथवा जिस प्रकार का हम धर्माचरण बचपन से करते आये, उसके ये सारे पक्षपात रह सकते हैं, किंतु जब अपने आपमें ऐसा ज्ञानप्रकाश होता है कि यह मैं आकाशवत् अमूर्त रूप, रस, गंध, स्पर्श, रहित केवल ज्ञानज्योतिमात्र सद्भूत आत्मतत्त्व हूं, जिसका किसी अन्य से रंच मात्र भी संबंध नहीं है, जो इस लोक में अकेला ही था, अकेला ही है और अकेला ही रहेगा।जिसके परिणमन से जिस पर जिसकी बात बीतती है, जिसमें किसी दूसरे का कुछ भी हाथ लग नहीं सकता।इस ज्ञानमात्र अपने आपको क्या करना चाहिये? कि जिससे शांति मिले, संकटों से छुटकारा मिले, ऐसी बुद्धि जगे अपने आपमें तो सारे पक्षपात मिट जाते हैं और तब निर्दोष वाणी के प्रति प्रीति जगती है।

निर्दोष वाणी की रूचि का आभार प्रदर्शन- धन्य है वह पुरूष जिसकी निर्दोष वाणी में प्रीति बने।कोई कुल यदि निर्दोष वाणी की परंपरा वाला भी हो और वहां भी पर्याय बुद्धि से पक्षपात करके उस धर्म में, उस वाणी में यदि प्रीति करता है तो अभी उसकी निष्पक्ष भावना नहीं बनी।निर्दोष वाणी वाले धर्म में, मजहब में भी जब तक जातिकुल आदिक का पक्षपात छोड़कर अमूर्त ज्ञानानंदमात्र आत्मा के नाते से ही अपने कल्याण की बुद्धि नहीं जगती तब तक उसकी भी निर्दोष वाणी में प्रीति नहीं कही जा सकती।निर्दोष वाणी है कौन।जो किसी के स्नेह की बुद्धि न रखकर केवल पदार्थ में जो बात पायी जाती हो उस पदार्थगत स्वरूप के जानने की ही जिसकी भावना और चेष्टा हो, यत्न हो, निष्कलंक वाणी वहां हो सकती है।जो सत्य हो वही मेरा देव है, जो सत्य हो वही मेरा गुरु है और जो सत्यस्वरूप हो वही मेरा शास्त्र है।इस ढंग से जिसे देव, शास्त्र, गुरु का लगाव हो उसका पंथ तो ठीक रहेगा।और जो मेरे देव, शास्त्र, गुरु कहलाते, वे सत्य हैं, इस प्रकार की अपनी हठ बनाने के आशय में पंथ सही नहीं बन सकता।जो पर्यायबुद्धि से हटे, केवलज्ञान ज्योतिमात्र मैं हूं, अकेला हूं, इस मुझ ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व का उद्धार हो, शांति रहे, यथार्थ रहे, सत्य रहे, गलत न रहे, इस प्रकार की जब भीतर ज्योति जगती है तो वह भी स्वयं निष्कलंक बनने लगता है और उसे फिर निष्कलंक वाणी में भावना जगेगी।वस्तुस्वरूप के मार्ग को निरखकर जो देव, गुरु जचें उनमें भक्ति बने, यह बात बाद की है, किंतु मूल में तत्त्व यही है कि वस्तु का यथार्थस्वरूप जानना और उस यथार्थ जानने में ही अपनी रति रहना।

वस्तुस्वरूपनिर्णय से उत्पन्न ज्ञानप्रकाश से सकलसंकटों का अवश्यंभावी विनाश- जगत में जो भी पदार्थ है उसमें नवीनपर्याय बनती है, पुरानी पर्याय विलीन होती है और वह वही शाश्वत रहा करता है, यह बात वस्तु के स्वरूप में सत्त्व के नाते से सबमें पड़ी हुई है।इस बात का सबसे पहिले निर्णय ठीक कर लें।मजहब कुलपरंपरा, कुल देवता, इन बातों के निर्णय में या बुद्धि में अभी न फँसकर सीधे सही पदार्थ के स्वरूप पर अपनी दृष्टि लगायें ।है ना यह तथ्य की बात कि ऐसा हुए बिना कोई ‘‘है’’ नहीं रह सकता।जिसमें कुछ भी व्यक्तरूप न हो, मूर्त या अमूर्त के ढंग से किसी भी प्रकार से किसी पदार्थ का कोई व्यक्तरूप न हो तो क्या वह पदार्थ सत कहला सकता है? है नहीं कुछ ऐसा कि जिसका कुछ भी व्यक्तरूप न हो और वह ‘‘है’’ रहा करे। जब कोई व्यक्तरूप बना तो उत्पाद और व्यय ये दोनों उसमें आ ही गए।और ऐसे उत्पाद व्यय जिसमें होते रहते हैं वह मूलभूत तत्त्व शाश्वत रहता है।चाहे जीव का नाम लो, पुद्गल लो, आकाश लो, काल लो।कोई सा भी पदार्थ लो, प्रत्येक पदार्थ में परिणमन होता है और सदा अस्तित्व रहता है, ये दो बातें प्रत्येक पदार्थ में पायी जायेंगी और जब प्रत्येक पदार्थ यों उत्पाद व्यय ध्रौव्य स्वरूप हो गया तो इसका अर्थ यह है कि सभी अपने आपमें अपने ही गुणों में परिणमते रहते हैं और अस्तित्व वे अपना बनाये रहते हैं।जब सब पदार्थ इसी प्रकार के हैं तब कहां गुन्जाइश रही कि किसी पदार्थ का कुछ पदार्थ बन जाय, किसी का कोई स्वामी बन जाय? प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, ऐसे निर्णय प्रकाश के पश्चात् जीव में मोह नहीं रहता।तो इस ज्ञानप्रकाश के होने पर सारे संकट समाप्त हो गए।

क्लेशनिवारण के अर्थ दुनियावी यत्न विधान से क्लेशों की वृद्धि- लोग अपने दु:ख मेटने के लिए बड़ा परिश्रम करते हैं, पर वह परिश्रम करते हैं उल्टा, जैसे-जैसे उस परिश्रम में बढ़ते जाते हैं वैसे ही वैसे दु:ख भी बढ़ता जाता है।जैसे कोई गोरखधंधा होता है, तो उसको ज्यों ज्यों सुल्झाने की कोशिश की जाती है त्यों त्यों वह उलझता रहता है।उसी को तो कहते हैं गोरखधंधा।तो ऐसे ही यहाँ पर मनुष्य अपना दु:ख दूर करने के लिए जैसे-जैसे प्रयत्न कर रहे हैं वैसे ही वैसे उलझनें और बढ़ती जाती हैं और यों इस मनुष्य को आपत्तियां बढ़ती जाती है, कम नहीं हो पातीं।कारण यह है कि जब बालक थे तब उतनी उलझनें न थीं, भूख के समय में रो लिया, खा लिया, खेल लिया, न चिंता, न शोक, न कोई फिकर, न कोई ज्यादा जानकारी।कुछ और बड़े हुए, संभाल करने लगे तो संभाल क्या हुई? जैसे-जैसे धन की आय हुई, संतान बढ़े, लोगों के संबंध बढ़े और जब बड़े हो रहे हैं तो ये सब चीजें प्राय: बढ़ती ही हैं।बच्चे भी बढ़ते, लोगों का संबंध भी बढ़ता, कुछ इज्जत भी बढ़ती, तो इन सबके बढ़ने से उसकी उल्झनें और भी बढ़ती रहती हैं।यहाँ तक कि ये उल्झनें वृद्धावस्था में भी सताती रहती हैं।तो हुआ क्या? जैसे-जैसे शांति के लिए हमने यत्न किया वैसे ही वैसे उल्झन हमारी बढ़ती गई।

सकलपरिहार से उलझनों का परिहार- अहो, उलझनें तो सब बढ़ीं, किंतु इन संकटों से छूटने का कुछ उपाय नहीं है क्या? है उपाय।वह उपाय है वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञानप्रकाश।लोग तो यों हठ करते हैं कि हमने इस दुकान में बीसों वर्ष लग लगकर दुकान को इतनी बड़ी बना दिया और इतनी बड़ी आय कर लिया, अब मैं इसको छोड़ कैसे दूं? अमुक संस्था की बीसों वर्ष तक सेवा करके इतनी वृद्धि कर दी, अब मैं इसको छोड़ कैसे दूं? मैंने अपने परिजनों की बड़ा श्रम करके ऐसी व्यवस्था बनायी, बीसों वर्ष तक बड़े ढंग से काम किया, परिवार की बड़ी अच्छी स्थिति बना दी, अब इस परिवार को मैं कैसे छोड़ दूं? अरे जरा उन चक्रवर्तियों के दिल को तो देखो कि 32 हजार मुकुटबद्ध राजा जिनकी सेवा में खड़े रहते हैं छ: खंड पर जिनका पूर्ण अधिकार है, इतना बड़ा वैभव जिन्हें प्राप्त है, जो बड़े रंग ढंग में मौज में लग रहे हैं, अचानक ही आधमिनट में उन्हें क्या हो गया? कमल के फूल में भँवरा मरते देखा तो देर न लगी, एकदम ही उनका ढांचा बदल गया।विरक्ति आयी।उन्होंने तो यह न सोचा कि युद्ध करने में, दिग्विजय करने में हजारों वर्ष लगे, इतना बड़ा साम्राज्य प्राप्त किया और एक ही मिनट में सारा का सारा साम्राज्य एकदम कैसे छोड़ दिया जाय? अरे उनके ज्ञान में यह आया है कि कहां कुछ मेरा? मैं तो ज्ञानानंदस्वभाव मात्र आत्मतत्त्व हूं? मैं तो अब तक विपरीत काम कर रहा था, उल्झन में लगा हुआ था, व्यर्थ का दु:ख सह रहा था? मैं तो यह एकाकी परिपूर्ण निजस्वभाव मात्र हूं।कहाँ हूं कष्ट में? कहां है भव भ्रमण इसका? यों अपने आपके विशुद्ध ज्ञानप्रकाश की दृष्टि होती है कि समस्त संकट एक साथ समाप्त हो जाते हैं।

अपने में ज्ञानप्रकाश का स्रोत- संकट निवारक ज्ञानप्रकाश हमकहां से पायें? इस निष्कलंक विमल वाणी की भावना से पायेंगे।समाधिभाव में क्या किया जाता है? ज्ञानमात्र ज्ञानस्वरूप को ज्ञान में निरंतर बनाये रहना है, बस यही स्थिति है समाधि की। अब बतलावो कि यह स्थिति जो कि आनंदवाली स्थिति है, यह किसी दूसरे की दया पर मिल सकेगी क्या? किसी दूसरे की आशा से मिल सकेगी क्या? दया और आशा दूसरे की तो जाने दो।जो स्वयं प्रभु है, जो स्वयं ईश्वर है, सामर्थ्य रखता है, अनंत ज्ञान, अनंत आनंद का निरंतर अनुभव करता है, जिन प्रभु के गुण स्मरण के प्रसाद से हमारे सब अभीष्ट सिद्ध होते हैं, समाधिभाव की भी सिद्धि बनती है उन प्रभु तक की तो दया यह मेरे समाधिभाव पर निर्भर है तो संसार के मोही अज्ञानी प्राणियों की आशा दया की तो बात ही क्या? प्रभु का स्वयं उपदेश है कि तुम अपने आपको जानो और अपने आपमें मग्न हो।ऐसी बात यदि न बन सकती हो तो मेरे स्वरूप को देखो और देखकर निर्णय करके अपने आपमें समा जावो।उनका यह उपदेश नहीं है कि तुम सदा मेरी शरण में रहा करो, मेरा ही पूजन किया करो।प्रभु का उपदेश है कि अपने में अपना ज्ञानप्रकाश पाकर कृतार्थ होओ।

समाधिभाव लाभ के अर्थ अपने कर्तव्य पर विचार- भैया ! सकल संकटहारी परम समाधिभाव की प्राप्ति के लिए हमें कुछ करना है कि नहीं करना है? कुछ तो अपने आप पर दया करके अपने आपसे बात तो कर लो।परिग्रह में, परिजन की बढ़ोतरी में, वैभव की वृद्धि में अपना उपयोग लगाकर कौनसा लाभ लूट लिया जायेगा? इनसे तो वर्तमान में भी दु:ख होता है और भविष्य में भी दु:खी होना पड़ेगा।तो थोड़ा कुछ धीरता पूर्वक अपने आप पर दया करके स्वहित पर विचार तो करना चाहिये।ये सब बातें प्राप्त होंगी स्वाध्याय से, ज्ञानार्जन से, निर्दोष वाणी की भावना से।लेकिन इसकी ओर तो दृष्टि न हो और एकदम खिंचे चले जायें पर की ओर, परिग्रह की ओर।बड़ी शौक शान से लोग कहते हैं कि आज का जमाना तो पैसे का है।जितना पैसा जिसके पास बढ़ेगा उसको उतना ही सुख, शांति मिलेगी, इज्जत मिलेगी।....... अरे हमें न चाहिए वह सुख शांति वह इज्जत।मोही अज्ञानी प्राणियों ने यदि कुछ इज्जत कर दिया और उसमें कुछ कल्पित मौज मान लिया तो क्या कोई यह भली बात है? मुझे तो ये कुछ न चाहिये।मैं तो भिक्षा मांगकर भी उदर कर सकूँ तो वह भी बुरी बात नहीं, लेकिन जैनमार्ग से बहिर्गत रहकर अर्थात् आत्मज्ञान से पृथक रहकर मैं पर के बारे में कुछ भी विकल्प करके रहूं वह मेरी बुरी बात है।धर्म मार्ग में प्रगति करने के लिए दिल में बड़ा साहस बनाना पड़ेगा।क्या जीव गर्भ में मर नहीं जाते? उत्पन्न होते ही, निकलते ही मरते नहीं हैं क्या, छोटी उमर के जीव गुजरते नहीं हैं क्या? उन्हीं जीवों सरीखा ही तो मैं हूं।गर्भ में गुजर जाते, गर्भ से निकलते गुजर जाते या बचपन में गुजर जाते, तो मेरे लिए यहाँ का कुछ भी क्या था? सुयोग से यदि बच गए तो मेरा जीवन बस दुनियावी संग से हट कर अपने आपकी दया के लिए ही है, ऐसा जिसका साहस होता है, भली भांति धर्म का पालन वही कर सकता है।

चारों मार्गभावनाओं का समाधिभाव के पोषण में सहयोग- जिस-जिस भावना से समाधिभाव के जागृत होने से प्रेरणा मिलती है उन-उन कार्यों की भावना करना सो भी समाधिभक्ति है।इस छंद में जो चार प्रकार की भावनायें बतायी गई हैं वे समाधिभाव के पोषण का कार्य करती हैं।जैनमार्ग में रूचि होना अर्थात् राग, द्वेष, मोह को नष्ट करने के उपाय में रूचि होना यह समाधिभाव का ही पोषक है।समता कहते हैं रागद्वेष से रहित विशुद्ध चैतन्यपरिणमन को।इसकी सिद्धि सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के मार्ग से ही होती है।जो मार्गरागद्वेष को प्रकट करते हैं, समस्त परतत्त्वों से भिन्न ज्ञायकस्वभाव मात्र निज तत्त्व की दृष्टि से दूर रखते हैं, उन सब मार्गों से विरक्त रहना, उनसे अलग रहना, इस प्रकार की भावना भाने से कुमार्ग में गति नहीं बन सकती है और फिर समाधिभाव की शीघ्र प्राप्ति की जा सकती है।जिनेंद्रदेव अर्थात् वीतराग सर्वज्ञ परमात्मा मात्र शुद्ध ज्ञानानंद की मूर्ति है, जिसमें विकारभाव नहीं है, ऐसे अविकार प्रभुस्वरूप की भावना से समाधि को प्रेरणा मिलती है इसी प्रकार उन वचनों में रति होना, उन वचनों पर चलना, जो वचन निर्दोष हैं, निर्मल हैं, आत्मा के विशुद्ध कल्याण की बात कहने वाले हैं उन युक्तियों में, वचनों में भावना होना यह भी समाधिभाव के निकट ले जाने वाली भावना है।इस प्रकार यह समाधिभक्त संत इन चार भावनाओं की अभ्यर्थना कर रहा है कि यह मुझे जन्म-जन्म में प्राप्त हो।


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