• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

वैजयंत

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. विजयार्ध की दक्षिण व उत्तर श्रेणी के दो नगर।–देखें विद्याधर ।
  2. एक चंद्र परिवार में अट्ठासी ग्रह होते हैं । उनमें से एक ग्रह का नाम वैजयंत है ।–देखें ग्रह ।
  3. एक यक्ष–देखें यक्ष ।
  4. स्वर्ग के पंच अनुत्तर विमानों में से एक।–देखें स्वर्ग -1.3 ।
  5. जंबूद्वीप की वेदिका का दक्षिण द्वार–देखें लोक - 3.1।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) जंबूद्वीप का एक द्वार । यह आठ योजन ऊँचा, चार योजन चौड़ा, नाना रत्नों की किरणों से अनुरंजित और वज्रमय दैदीप्यमान किवाड़ों से युक्त है । हरिवंशपुराण - 5.390-391

(2) विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी का छठा नगर । हरिवंशपुराण - 22.86

(3) विजयार्ध पर्वत की दक्षिणश्रेणी का दसवाँ नगर । महापुराण 19.50 53, हरिवंशपुराण - 22.94

(4) दक्षिण-समुद्र का तटवर्ती एक महाद्वार । भरतेश ने इस द्वार के निकट अपनी सेना ठहराई थी । इस क्षेत्र का स्वामी वरतनु देव था । महापुराण 29.103, हरिवंशपुराण - 11.13

(5) चक्रवर्ती भरतेश के एक महल का नाम । महापुराण 37.147

(6) पाँच अनुत्तर विमानों में एक विमान । महापुराण 51.15 पद्मपुराण - 105.170-171, हरिवंशपुराण - 6.65

(7) समुद्र का एक गोपुर लक्ष्मण ने यहाँ वरतनु देव को पराजित करके उससे कटक, केयूर, चुड़ामणिहार और कटिसूत्र भेट में प्रांत किये थे । महापुराण 68.651-652

(8) भरतक्षेत्र का एक नगर । रामपुरी से चलकर राम इसी नगर के समीप ठहरे थे । पद्मपुराण - 36.9-11

(9) जंबूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षेत्र में गंधमालिनी देश के वीतशोक नगर का राजा । इसकी रानी सर्वश्री तथा संजयंत और जयंत पुत्र थे । भोगों से विरक्त होने पर इसने संजयंत के पुत्र वैजयंत को राज्य देकर पिता के साथ स्वयंभू मुनि से संयम धारण कर लिया था । यह कषायों का क्षय करके अंत में केवली हुआ । महापुराण 59.109-113, हरिवंशपुराण - 27.5-8

(10) जंबूद्वीप-विदेहक्षेत्र के गंधमालिनी देश में वीतशोकपुर के स्वामी का प्रपौत्र और संजयंत का पुत्र । महापुराण 59.109-112

(11) जंबूद्वीप के पूर्वविदेहक्षेत्र में स्थित पुष्पकलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और रानी श्रीकांता का पुत्र । महापुराण 11.8-10

(12) समवसरण-भूमि के तीसरे कोट के दक्षिण द्वार का प्रथम नाम । हरिवंशपुराण - 57.58


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वैजयंत&oldid=129108"
Categories:
  • व
  • पुराण-कोष
  • करणानुयोग
  • प्रथमानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:25.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki