सम आराम विहारी

From जैनकोष

(राग परज)
सम आराम विहारी, साधुजन सम आराम विहारी ।।टेक ।।
एक कल्पतरु पुष्पन सेती, जजत भक्ति विस्तारी ।
एक कंठविच सर्प नाखिया, क्रोध दर्पजुत भारी ।
राखत एक वृत्ति दोउनमैं, सबहीके उपगारी ।।१ ।।
सारंगी हरिबाल चुखावै, पुनि मराल मंजारी ।
व्याघ्रबाल करि सहित नन्दिनी, व्याल नकुल की नारी ।
तिनकै चरनकमल आश्रयतैं, अरिता सकल निवारी ।।२ ।।
अक्षय अतुल प्रमोद विधायक, ताकौ धाम अपारी ।
कामधरा विव गढ़ी सो चिरतें, आतमनिधि अविकारी ।
खनत ताहि लैकर करमें जे, तीक्षण बुद्धि कुदारी ।।३ ।।
निज शुद्धोपयोगरस चाखत, पर ममता न लगारी ।
निज सरधान ज्ञान चरनात्मक, निश्चय शिवमगचारी ।
`भागचन्द' ऐसे श्रीपति प्रति, फिर फिर ढोक हमारी ।।४ ।।