सांची तो गंगा यह वीतरागवानी

From जैनकोष

(राग चर्चरी)
सांची तो गंगा यह वीतरागवानी ।
अविच्छन्न धारा निज धर्मकी कहानी ।।टेक ।।
जामें अति ही विमल अगाध ज्ञानपानी ।
जहाँ नहीं संशयादि पंककी निशानी ।।१ ।।
सप्तभंग जहँ तरंग उछलत सुखदानी ।
संतचित मरालवृंद रमैं नित्य ज्ञानी ।।२ ।।
जाके अवगाहनतैं शुद्ध होय प्रानी ।
`भागचन्द'निहचै घटमाहिं या प्रमानी ।।३ ।।