• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

सांपरायिक आस्रव

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

राजवार्तिक अध्याय 6/4/4-7/508

कर्मभिः समंतादात्मनः पराभवोऽभिभवः संपरायः इत्युच्यते ॥4॥ तत्प्रयोजनं कर्म सांपरायिकमित्युच्यते यथा ऐंद्रमहिकमिति ॥5॥ ...मिथ्यादृष्ट्यादीनां सूक्ष्मसाम्परायान्तानां कषायोदयपिच्छिलपरिणामानां योगवशादानीतं कर्म भावेनोपश्लिष्य माणं आर्द्रचर्माश्रित रेणुवत् स्थितिमापद्यमानं साम्परायिकमित्युच्यते।

= कर्मों के द्वारा चारों ओर से स्वरूप का अभिभव होना साम्पराय है ॥4॥...इस साम्पराय के लिए जो आस्रव होता है वह सांपरायिक आस्रव है ॥5॥...मिथ्यादृष्टि से लेकर सूक्ष्म साम्पराय दशवें गुणस्थान तक कषाय का चेप रहने से योग के द्वारा आये हुए कर्म गीले चमड़े पर धूल की तरह चिपक जाते हैं। अर्थात् उनमें स्थिति बंध हो जाता है। वही साम्पारयिकास्रव है।


अधिक जानकारी के लिये देखें आस्रव - 1.5।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

आस्रव के दो भेदों में प्रथम भेद । यह कषायपूर्वक होता है । मिथ्यादृष्टि से सूक्ष्मतसांपराय गुणस्थान तक के जीवों के सकषाय होने से यह आस्रव होता है । इसके पांच इंद्रियाँ, चार कषाय, पाँच अव्रत, और पच्चीस क्रियाएँ ये 39 द्वार हैं― पच्चीस क्रियाओं के नाम निम्न प्रकार है―

1. सम्यक्त्व 2. मिथ्यात्व 3. प्रयोग 4. समादान 5. कायिकी 6. क्रियाधिकरणी 7. पारितापिकी 8. प्राणातिपातिकी 9. दर्शन 10. स्पर्शन 11. प्रत्यायिकी 12. समंतानुपातिनी 13. अनाभोग 14. स्वहस्त 15. निसर्ग 16. विदारण 18. आज्ञाव्यापादिकी 19. अनाकांक्षी 20. प्रारंभ 21 पारिग्रहिकी 22. माया 24. मिथ्यादर्शन और 25 अप्रत्याख्यान । हरिवंशपुराण - 58.58-82


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=सांपरायिक_आस्रव&oldid=132027"
Categories:
  • स
  • पुराण-कोष
  • चरणानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 21 February 2024, at 17:32.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki