सुधि लीज्यौ जी म्हारी, मोहि भवदुखदुखिया जानके

From जैनकोष

सुधि लीज्यौ जी म्हारी, मोहि भवदुख दुखिया जानके ।।टेक. ।।
तीनलोकस्वामी नामी तुम, त्रिभुवन के दु:खहारी ।
गनधरादि तुम शरन लई लख, लीनी सरन तिहारी।।१ ।।सुधि. ।।
जो विधि अरि करी हमरी गति, सो तुम जानत सारी ।
याद किये दुख होत हिये ज्यौं, लागत कोट कटारी।।२ ।।सुधि. ।।
लब्धि-अपर्यापत निगोद में, एक उसासमंझारी ।
जनममरन नवदुगुन विथाकी, कथा न जात उचारी।।३ ।।सुधि. ।।
भू जल ज्वलन पवन प्रतेक तरु, विकलत्रय तनधारी ।
पंचेंद्री पशु नारक नर सुर, विपति भरी भयकारी।।४ ।।सुधि. ।।
मोह महारिपु नेक न सुखमय, हो न दई सुधि थारी ।
सो दुठ मंद भयौ भागनतैं, पाये तुम जगतारी।।५ ।।सुधि. ।।
यद्यपि विरागि तदपि तुम शिवमग, सहज प्रगट करतारी ।
ज्यौं रविकिरन सहजमगदर्शक, यह निमित्त अनिवारी।।६ ।।सुधि. ।।
नाग छाग गज बाघ भील दुठ, तारे अधम उधारी ।
सीस नवाय पुकारत अबके, `दौल' अधमकी बारी।।७ ।।सुधि. ।।