हे जिन तेरे मैं शरणै आया

From जैनकोष

हे जिन तेरे मैं शरणै आया ।
तुम हो परमदयाल जगतगुरु, मैं भव भव दु:ख पाया ।।हे जिन. ।।
मोह महा दुठ घेर रह्यौ मोहि, भवकानन भटकाया ।
नित निज ज्ञानचरननिधि विसर्यो, तन धनकर अपनाया।।१ ।।हे जिन. ।।
निजानंदअनुभवपियूष तज, विषय हलाहल खाया ।
मेरी भूल मूल दुखदाई, निमित मोहविधि थाया।।२ ।।हे जिन. ।।
सो दुठ होत शिथिल तुमरे ढिग, और न हेतु लखाया ।
शिवस्वरूप शिवमगदर्शक तुम, सुयश मुनीगन गाया।।३ ।।हे जिन. ।।
तुम हो सहज निमित जगहितके, मो उर निश्चय भाया ।
भिन्न होहुँ विधितैं सो कीजे, `दौल' तुम्हैं सिर नाया।।४ ।।हे. जिन. ।।