हे जिन तेरो सुजस उजागर

From जैनकोष

हे जिन तेरो सुजस उजागर, गावत हैं मुनिजन ज्ञानी ।।टेक. ।।
दुर्जय मोह महाभट जाने, निजवश कीने जगप्रानी ।
सो तुम ध्यानकृपान पानिगहि, ततछिन ताकी थिति भानी ।।१ ।।
सुप्त अनादि अविद्या निद्रा, जिन जन निजसुधि विसरानी ।
ह्वै सचेत तिन निजनिधि पाई, श्रवन सुनी जब तुम वानी ।।२ ।।
मंगलमय तू जगमें उत्तम, तुही शरन शिवमगदानी ।
तुवपद-सेवा परम औषधि, जन्मजरामृतगदहानी ।।३ ।।
तुमरे पंच कल्यानकमाहीं, त्रिभुवन मोददशा ठानी ।
विष्णु विदम्बर, जिष्णु, दिगम्बर, बुध, शिव कह ध्यावत ध्यानी ।।४ ।।
सर्व दर्वगुनपरजयपरनति, तुम सुबोध में नहिं छानी ।
तातैं `दौल' दास उर आशा, प्रगट करो निजरससानी ।।५ ।।