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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 102 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



एवं पवयणसारं पंचत्थियसंगहं वियाणित्ता । (102)

जो मुयदि रागदोसे सो गाहदि दुक्खपरिमोक्खं ॥110॥

अर्थ: 

इस प्रकार प्रवचन के सारभूत 'पंचास्तिकाय संग्रह' को विशेष-रूप से जानकर जो राग-द्वेष को छोडता है, वह दु:खों से परिमुक्त होता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[एवं] पूर्वोक्त प्रकार से, [वियाणित्ता] पहले विशेष-रूप से जानकर । किसे जानकर ? [पंचत्थियसंगहं] पंचास्तिकाय-संग्रह नामक ग्रंथ को जानकर । किस विशेषतावाले ग्रन्थ को जानकर? [पवयणसारं] प्रवचन के सार-भूत, पंचास्तिकाय, षड्द्रव्य का संक्षेप से प्रतिपादक होने के कारण, अथवा मुख्य-रूप से परम-समाधिरतों को मोक्ष-मार्ग-रूप से सार-भूत शुद्ध जीवास्तिकाय का प्रतिपादक होने से, द्वादशांग-रूप से विस्तृत होने पर भी प्रवचन के सारभूत इस ग्रन्थ को जानकर । इसे जानकर क्या करता है ? [जो मुयदि] कर्ता-रूप जो छोडता है । कर्मता को प्राप्त किन्हें छोडता है ? [रायदोसे] अनंत ज्ञानादि गुण सहित वीतराग परमात्मा से विलक्षण, हर्ष-विषाद लक्षण-वाले और आगामी रागादि दोषों को उत्पन्न करने-वाले कर्मास्रव के जनक राग-द्वेष दोनों को छोडता है; सो वह पूर्वोक्त ध्याता [गाहदि] प्राप्त होता है । वह किसे प्राप्त करता है ? [दुक्खपरिमोक्खं] निर्विकार आत्मोपलब्धि-रूप भावना से उत्पन्न परम आह्लाद एक लक्षण सुखामृत से विपरीत, नानाप्रकार के शारीरिक-मानसिक रूप चतुर्गति-दु:ख के परिमोक्ष को, विनाश को प्राप्त होता है, ऐसा अभिप्राय है ॥११०॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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