• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 40.4 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



विउलमदी पुण णाणं अज्जवणाणं च दुविह मण्णाणं ।

एदे संजमलद्धी उवओगे अप्पमत्तस्स ॥45॥

अर्थ: 

मन:-पर्यय ज्ञान, ऋजुमति और विपुल-मति के भेद से दो प्रकार का है; तथा संयम-लब्धि युक्त अप्रमत्त जीव के विशुद्ध परिणाम में होता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[मण्णाणं] यह आत्मा मन: पर्ययज्ञानावरण का क्षयोपशम होने पर परकीय मनोगत मूर्त वस्तु को जिस प्रत्यक्ष से जानता है, वह मन: पर्ययज्ञान है । वह कितने प्रकार का है ? [विउलमदी पुण णाणं अज्जवणाणं च दुविह मण्णाणं] ऋजुमति और विपुलमति के भेद से मन: पर्यय ज्ञान दो प्रकार का है; वहाँ विपुलमति ज्ञान परकीय मन-वचन-काय सम्बन्धी वक्रावक्र (वक्र और सीधे) पदार्थ को जानता है और ऋजुमति प्राञ्जल (सीधे) को ही जानता है। विपुलमति निर्विकार आत्मोपलब्धि भावना से सहित चरम शरीरी मुनियों के होता है । [एदे संजमलद्धी] दोनों मन: पर्ययज्ञान संयम-लब्धि-रूप उपेक्षा संयम के होने पर होते हैं; वे दोनों संयम लब्धि हैं जिनके, वे संयम लब्धिवान हैं उन्हें मन: पर्ययज्ञान होते हैं । वे दोनों किस समय उत्पन्न होते हैं ? [उवओगे] उपयोग में, विशुद्ध परिणाम में उत्पन्न होते हैं । वे किसे होते हैं ? [अप्पमत्तस्स] वीतरागी आत्म-तत्त्व की सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठान रूप भावना से सहित तथा 'विकथा, कषाय...' इत्यादि गाथा में कहे गए पंद्रह प्रमादों से रहित अप्रमत्त मुनि के होते हैं । यहाँ उत्पत्ति के समय ही अप्रमत्त का नियम है, बाद में प्रमत्त के भी रहता है -- ऐसा भावार्थ है ॥४५॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_40.4_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=115346"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:16.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki