ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 11
From जैनकोष
386. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह-
386. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं, परन्तु कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ।।11।।
उन क्षेत्रों को विभाजित करनेवाले और पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी - ये छह वर्षधर पर्वत हैं ।।11।।
387. तानि क्षेत्राणि विभजन्त इत्येवंशीलास्तद्विभाजिनः। पूर्वापरायता इति पूर्वापरकोटिभ्यां लवणजलधिस्पर्शिन इत्यर्थः। हिमवदादयोऽनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्तसंज्ञा वर्षविभागहेतुत्वाद्वर्षधरपर्वता इत्युच्यन्ते। तत्र क्व हिमवान् ? भरतस्य हैमवतस्य च सीमनि[1] व्यवस्थितः। क्षुद्रहिमवान् योजनशतोच्छ्रायः। हैमवतस्य हरिवर्षस्य[2] च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजनशतोच्छ्रायः[3]। विदेहस्य दक्षिणतो हरिवर्षस्योत्तरतो निषधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छ्रायः। उत्तरे त्रयोऽपि पर्वताः स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याताः। उच्छ्रायश्च तेषां चत्वारि द्वे एकं च योजनशतं वेदितव्यम्[4]। सर्वेषां पर्वतानामुच्छ्रायस्य चतुर्भागोऽवगाहः।
387. इन पर्वतों का स्वभाव उन क्षेत्रों का विभाग करना है, इसलिए इन्हें उनका विभाग करने वाला कहा है। ये पूर्व से पश्चिम तक लम्बे हैं। इसका यह भाव है कि इन्होंने अपने पूर्व और पश्चिम सिरे से लवण समुद्र को स्पर्श किया है। ये हिमवान् आदि संज्ञाएँ अनादि काल से चली आ रही हैं और बिना निमित्त की हैं। इन पर्वतों के कारण क्षेत्रों का विभाग होता है इसलिए इन्हें वर्षधर पर्वत कहते हैं। हिमवान् पर्वत कहाँ है अब इसे बतलाते हैं-भरत और हैमवत क्षेत्र की सीमा पर हिमवान् पर्वत स्थित है। इसे क्षुद्र हिमवान् भी कहते हैं। यह सौ योजन ऊँचा है। हैमवत और हरिवर्ष का विभाग करने वाला महाहिमवान् है। यह दो सौ योजन ऊँचा है। विदेहके दक्षिण में और हरिवर्ष के उत्तर में निषध पर्वत है। यह चार सौ योजन ऊँचा है। इसी प्रकार आगे के तीन पर्वत भी अपने-अपने क्षेत्रों का विभाग करनेवाले जानने चाहिए। उनकी ऊँचाई क्रमशः चार सौ, दो सौ और सौ योजन जाननी चाहिए। इन सब पर्वतों की जड़ अपनी ऊँचाई का एक-चौथाई भाग है।