ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 13
From जैनकोष
390. पुनरपि [1]तद्विशेषणार्थमाह-
390. फिरभी इन पर्वतों की और विशेषता का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ।।13।।
इनके पार्श्व मणियों से चित्र-विचित्र हैं तथा वे ऊपर, मध्य और मूल में समान विस्तार वाले हैं ।।13।।
391. नानावर्णप्रभादिगुणोपेतैर्मणिभिर्विचित्राणि पार्श्वाणि येषां ते मणिविचित्रपार्श्वाः। अनिष्ट[2]संस्थानस्य निवृत्त्यर्थमुपर्यादिवचनं क्रियते। ‘च’ शब्दो मध्यसमुच्चयार्थः। य एषां मूले विस्तारः स उपरि मध्ये च तुल्यः।
391. इन पर्वतों के पार्श्व भाग नाना रंग और नाना प्रकार की प्रभा आदि गुणों से युक्त मणियों से विचित्र हैं, इसलिए सूत्र में इन्हें मणियों से विचित्र पार्श्व वाले कहा है। अनिष्ट आकार के निराकरण करने के लिए सूत्र में ‘उपरि’ आदि पद रखे हैं। ‘च’ शब्द मध्यभाग का समुच्चय करने के लिए है। तात्पर्य यह है कि इनका मूल में जो विस्तार है वही ऊपर और मध्यमें है।