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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 27

From जैनकोष



417. अत्राह, उक्‍तेषु भरतादिषु क्षेत्रेषु मनुष्‍याणां किं तुल्‍योऽनुभवादिः[1], आहोस्विदस्ति कश्चित्‍प्रतिविशेष इत्‍यत्रोच्‍यते-
417. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्‍त भरतादि क्षेत्रों में मनुष्‍यों का अनुभव आदि क्‍या समान हैं या कुछ विशेषता है ? इस शंका का समाधान करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
भर‍तैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्‍यामुत्‍सर्पिण्‍यवसर्पिणीभ्‍याम् ।।27।।
भरत और ऐरावत क्षेत्रों में उत्‍सर्पिणी और अवसर्पिणी के छह समयों की अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता रहता है ।।27।।
418. वृद्धिश्‍च ह्रासश्‍च वृद्धिह्रासौ। काभ्‍याम् ? [2]षट्समयाभ्‍यामुत्‍सर्पिण्‍यवसर्पिणीभ्‍याम्। कयोः ? भ‍रतैरावतयोः। न तयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिह्रासौ स्‍तः; असंभवात्। तत्‍स्‍थानां मनुष्‍याणां वृद्धिह्रासौ भवतः। अथवाधिकरणनिर्देशः। भरते ऐरावते च मनुष्‍याणां वृद्धिह्रासाविति। किंकृतौ वृद्धिह्रासौ ? अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ। अनुभव उपभोगः; आयुर्जीवितपरिमाणम्[3], प्रमाणं शरीरोत्‍सेध इत्‍येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्‍याणां भवतः[4]। किंहेतुकौ पुनस्‍तौ ? कालहेतुकौ। स च कालो द्विविधः-उत्‍सर्पिणी अवसर्पिणी चेति। तद्भेदाः प्रत्‍येकं षट्। अन्‍वर्थसंज्ञे चैते। अनुभवादिभिरुत्‍सर्पणशीला उत्‍सर्पिणी। तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी। तत्रावसर्पिणी षड्विधा-सुषमसुषमा सुषमा सुषमदुष्‍षमा दुष्‍षमसुषमा दुष्‍षमा अतिदुष्‍षमा चेति। उत्‍सर्पिण्‍यपि अतिदुष्‍षमाद्या सुषमसुषमान्‍ता षड्विधैव भवति। अवसर्पिण्‍याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोट्यः। उत्‍सर्पिण्‍या अपि तावत्‍य एव। सोभयी कल्‍प इत्‍याख्‍याते। तत्र सुषमसुषमा चतस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः। तदादौ मनुष्‍या उत्‍तरकुरुमनुष्‍यतुल्‍याः। ततः क्रमेण हानौ सत्‍यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः। तदादौ मनुष्‍या हरिवर्षमनुष्‍यसमाः। ततः क्रमेण हानौ सत्‍यां सुषमदुष्‍षमा भवति द्वे सागरोपमकोटीकोट्यौ। तदादौ मनुष्‍या हैमवतकमनुष्‍यसमाः। ततः क्रमेण हानौ सत्‍यां दुष्‍षमसुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्‍वारिंद्वर्षसहस्रोना। तदादौ मनुष्‍या विदेहजनतुल्‍या भ‍वन्ति। ततः क्रमेण हानौ सत्‍यां दुष्‍षमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि। ततः क्रमेण हानौ सत्‍यामतिदुष्‍षमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि। एवमुत्‍सर्पिण्‍यपि विपरीतक्रमा वेदितव्‍या।
418. वृद्धि और ह्रास इन दोनों पदों में कर्मधारय समास है। शंका-किनकी अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान-उत्‍सर्पिणी और अवसर्पिणी सम्‍बन्‍धी छह समयों की अपेक्षा। शंका-किनका छह समयों की अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान-भरत और ऐरावत क्षेत्र का। इसका यह मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्‍योंकि ऐसा होना असम्‍भव है। किन्‍तु उन क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्‍यों का वृद्धि और ह्रास होता है। अथवा, ‘भरतैरावतयोः’ षष्‍ठी विभक्ति न होकर अधिकरण में य‍ह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत और ऐरावत क्षेत्र में मनुष्‍यों की वृद्धि और ह्रास होता है। शंका-यह वृद्धि और ह्रास किंनिमित्‍तक होता है ? समाधान-अनुभव, आयु और प्रमाण आदि निमित्‍तक होता है। अनुभव उपभोग को कहते हैं, जीवित रहने के परिमाण को आयु कहते हैं और शरीर की ऊँचाई को प्रमाण कहते हैं। इस प्रकार इत्‍यादि कारणों से मनुष्‍यों का वृद्धि और ह्रास होता है। शंका-यह वृद्धि और ह्रास किस निमित्‍त से होते हैं ? समाधान-ये काल के निमित्‍त से होते हैं। वह काल दो प्रकार का है- उत्‍सर्पिणी और अवसर्पिणी। इनमें से प्रत्‍येक के छह भेद हैं। ये दोनों काल सार्थक नाम वाले हैं। जिसमें मनुष्‍यों के अनुभव आदि की वृद्धि होती है वह उत्‍सर्पिणी काल है और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी है। अवसर्पिणी के छह भेद हैं-सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुष्‍षमा, दुष्‍षमसुषमा, दुष्‍षमा और अतिदुष्‍षमा। इसी प्रकार उत्‍सर्पिणी भी अतिदुष्‍षमा से लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकार का है। अवसर्पिणी काल का परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है और उत्‍सर्पिणी का भी इतना ही है। ये दोनों मिल कर एक कल्‍पकाल कहे जाते हैं। इनमें से सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण है। इसके प्रारम्‍भ में मनुष्‍य उत्‍तरकुरु के मनुष्‍यों के समान होते हैं। फिर क्रम से हानि होने पर तीन कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण सुषमा काल प्राप्‍त होता है। इसके प्रारम्‍भ में मनुष्‍य हरिवर्ष के मनुष्‍यों के समान होते हैं। तदनन्‍तर क्रम से हानि होने पर दो कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण सुषमदुष्‍ष्‍मा काल प्राप्‍त होता है। इसके प्रारम्‍भ में मनुष्‍य हैमवत के मनुष्‍यों के समान होते हैं। तदनन्‍तर क्रम से हानि होकर ब्‍यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण दुष्‍षमसुषमा काल प्राप्‍त होता है। इसके प्रारम्‍भ में मनुष्‍य विदेह क्षेत्र के मनुष्‍यों के समान होते हैं। तदनन्‍तर क्रम से हानि होकर इक्‍कीस हजार वर्ष का दुष्‍षमा काल प्राप्‍त होता है। तदनन्‍तर क्रम से हानि होकर इक्‍कीस हजार वर्ष का अतिदुष्‍षमा काल प्राप्‍त होता है। इसी प्रकार उत्‍सर्पिणी भी विपरीत क्रम से जाननी चाहिए।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ -तुल्‍योऽनुभवः आहो-ता., ना.।
  2. ↑ -याभ्‍याम्। कयोः मु.।
  3. ↑ -परिमाणम्, शरी – मु.।
  4. ↑ भवतः तयोः । किंहेतु- ता., ना.।
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