सिद्धांतकोष से
सामान्य परिचय
| तीर्थंकर क्रमांक |
8 |
| चिह्न |
अर्धचन्द्र |
| पिता |
महासेन |
| माता |
लक्ष्मणा |
| वंश |
इक्ष्वाकु |
| उत्सेध (ऊँचाई) |
150 धनुष |
| वर्ण |
धवल |
| आयु |
10 लाख पूर्व |
पूर्व भव सम्बंधित तथ्य
| पूर्व मनुष्य भव |
पद्मनाभ |
| पूर्व मनुष्य भव में क्या थे |
मण्डलेश्वर |
| पूर्व मनुष्य भव के पिता |
अरिन्दम |
| पूर्व मनुष्य भव का देश, नगर |
धात.वि.रत्नसंचय |
| पूर्व भव की देव पर्याय |
वैजयन्त |
गर्भ-जन्म कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| गर्भ-तिथि |
चैत्र कृष्ण 5 |
| गर्भ-नक्षत्र |
... |
| गर्भ-काल |
पिछली रात्रि |
| जन्म तिथि |
पौष कृष्ण 11 |
| जन्म नगरी |
चन्द्रपुर |
| जन्म नक्षत्र |
अनुराधा |
| योग |
शक्र |
दीक्षा कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| वैराग्य कारण |
तड़िद् |
| दीक्षा तिथि |
पौष कृष्ण 11 |
| दीक्षा नक्षत्र |
अनुराधा |
| दीक्षा काल |
अपराह्न |
| दीक्षोपवास |
तृतीय उप. |
| दीक्षा वन |
सर्वार्थ |
| दीक्षा वृक्ष |
नाग |
| सह दीक्षित |
1000 |
ज्ञान कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| केवलज्ञान तिथि |
फाल्गुन कृष्ण 7 |
| केवलज्ञान नक्षत्र |
अनुराधा |
| केवलोत्पत्ति काल |
अपराह्न |
| केवल स्थान |
चन्द्रपुरी |
| केवल वन |
सर्वार्थ |
| केवल वृक्ष |
नाग |
निर्वाण कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| योग निवृत्ति काल |
1 मास पूर्व |
| निर्वाण तिथि |
भाद्र.शुक्ल 7 |
| निर्वाण नक्षत्र |
ज्येष्ठा |
| निर्वाण काल |
पूर्वाह्न |
| निर्वाण क्षेत्र |
सम्मेद |
समवशरण सम्बंधित तथ्य
| समवसरण का विस्तार |
8 1/2 |
| सह मुक्त |
1000 |
| पूर्वधारी |
4000 |
| शिक्षक |
210400 |
| अवधिज्ञानी |
2000 |
| केवली |
18000 |
| विक्रियाधारी |
600 |
| मन:पर्ययज्ञानी |
8000 |
| वादी |
7000 |
| सर्व ऋषि संख्या |
250000 |
| गणधर संख्या |
93 |
| मुख्य गणधर |
वैदर्भ |
| आर्यिका संख्या |
380000 |
| मुख्य आर्यिका |
वरुना |
| श्रावक संख्या |
300000 |
| मुख्य श्रोता |
मघवा |
| श्राविका संख्या |
500000 |
| यक्ष |
अजित |
| यक्षिणी |
मनोवेगा |
आयु विभाग
| आयु |
10 लाख पूर्व |
| कुमारकाल |
2.5 लाख पूर्व |
| विशेषता |
मण्डलीक |
| राज्यकाल |
61/2.5 लाख पूर्व+24 पूर्वांग |
| छद्मस्थ काल |
3 मास |
| केवलिकाल |
1 लाख पू..–(24 पूर्वांग 3 मास) |
तीर्थ संबंधी तथ्य
| जन्मान्तरालकाल |
900 करोड़ सागर +10 लाख पू. |
| केवलोत्पत्ति अन्तराल |
90 करोड़ सागर +4 पूर्वांग 3 3/4 वर्ष |
| निर्वाण अन्तराल |
90 करोड़ सागर |
| तीर्थकाल |
90 करोड़ सागर +4 पूर्वांग |
| तीर्थ व्युच्छित्ति |
❌ |
| शासन काल में हुए अन्य शलाका पुरुष |
| चक्रवर्ती |
❌ |
| बलदेव |
❌ |
| नारायण |
❌ |
| प्रतिनारायण |
❌ |
| रुद्र |
❌ |
( महापुराण/ श्लोक नं.)
पूर्वभव नं.7 में पुष्करद्वीप पूर्वमेरु के पश्चिम में सुगंधि देश के श्रीवर्मा नाम के राजा थे।73-76। पूर्वभव नं.6 में श्रीप्रभ विमान में श्रीधर नामक देव हुए।82। पूर्वभव नं.5 में धातकीखंड द्वीप पूर्वमेरु के भरत क्षेत्र में अलकादेशस्थ अयोध्या के अजितसेन नामक राजा हुए।96-97। पूर्वभव नं.4 में अच्युतेंद्र हुए।122-126। पूर्वभव नं.3 में पूर्वधातकीखंड में मंगलावती देश के रत्नसंचय नगर के पद्मनाभ नामक राजा हुए।143। पूर्वभव नं.2 में वैजयंत विमान में अहमिंद्र हुए।158-162। और वर्तमान भव में आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभुनाथ हुए–देखें
तीर्थंकर - 5।
चंद्रप्रभ नामक श्वेतांबर आचार्य हुये हैं जो जयसिंह सूरि के शिष्य थे। आपने प्रमेयरत्नकोष तथा दर्शनशुद्धि नामक न्याय विषयक ये दो ग्रंथ लिखे हैं। समय ई.1102–(न्यायावतार/प.4/सतीशचंद्र विद्याभूषण)।
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पुराणकोष से
मथुरा नगरी का राजा । इसकी दो रानियाँ थी― धरा और कनकप्रभा । धरा से इसके आठ पुत्र हुए थे― श्रीमुख, सम्मुख, सुमुख, इंद्रमुख, प्रभामुख, उग्रमुख, अर्कमुख और अपरमुख । दूसरी रानी कनकप्रभा से अचल नाम का एक पुत्र हुआ था । महापुराण 91.19-21
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