नैननि को वान परी, दरसन की

From जैनकोष

(राग ख्याल)

नैननि को वान परी, दरसन की ।।टेक ।।
जिन मुखचन्द चकोर चित मुझ, ऐसी प्रीति करी ।।नैन. ।।
और अदेवन के चितवनको अब चित चाह टरी ।
ज्यों सब धूलि दबै दिशि दिशिकी, लागत मेघझरी ।।१ ।।नैन. ।।
छबि समाय रही लोचनमें, विसरत नाहिं घरी ।
`भूधर' कह यह टेव रहो थिर, जनम जनम हमरी ।।२ ।।नैन. ।।