न मानत यह जिय निपट अनारी

From जैनकोष

न मानत यह जिय निपट अनारी, सिख देत सुगुरु हितकारी ।।टेक ।।
कुमतिकुनारि संग रति मानत, सुमतिसुनारि बिसारी ।।
नर परजाय सुरेश चहैं सो, चख विषविषय विगारी ।
त्याग अनाकुल ज्ञान चाह, पर-आकुलता विसतारी ।।१ ।।
अपनी भूल आप समतानिधि, भवदुख भरत भिखारी ।
परद्रव्यन की परनति को शठ, वृथा वनत करतारी ।।२ ।।
जिस कषाय-दव जरत तहाँ, अभिलाष छटा घृत डारी ।
दुखसौं डरै करै दुखकारनतैं नित प्रीति करारी ।।३ ।।
अतिदुर्लभ जिनवैन श्रवनकरि, संशयमोह निवारी ।
`दौल' स्वपर-हित-अहित जानके, होवहु शिवमग चारी ।।४ ।।