मति भोगन राचौ जी

From जैनकोष

(राग-सोरठ)
मति भोगन राचौ जी, भव भव मैं दुख देत घना ।।मति. ।।टेक ।।
इनके कारन गति गति मांहीं नाहक नाचौ जी ।
झूठे सुखके काज धरममैं पाड़ौ खाँचौजी ।।१ ।।मति. ।।
पूरवकर्म उदय सुख आयां, राजौ माचौ जी ।
पाप उदय पीड़ा भोगनमैं, क्यौं मन काचौ जी ।।२ ।।मति. ।।
सुख अनन्तके धारक तुम ही, पर क्यौं जांचौं जी ।
बुधजन गुरुका वचन हिया में, जानौ सांचौ जी ।।३ ।।मति. ।।