म्हांकै घट जिनधुनि अब प्रगटी

From जैनकोष

(राग सोरठ)
म्हांकै घट जिनधुनि अब प्रगटी ।।टेक ।।
जागृत दशा भई अब मेरी, सुप्त दशा विघटी ।
जगरचना दीसत अब मोकों, जैसी रँहटघटी ।।१ ।।
विभ्रम तिमिर-हरन निज दृगकी, जैसी अँजनवटी ।
तातैं स्वानुभूति प्रापतितैं, परपरनति सब हटी ।।२ ।।
ताके बिन जो अवगम चाहै, सो तो शठ कपटी ।
तातैं `भागचन्द' निशिवासर, इक ताहीको रटी ।।३ ।।