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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1003

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दुर्दमेंद्रियमातंगांशीलशाले नियंत्रय।

धीर विज्ञानपाशेन विकुर्वंतो यदृच्छया।।1003।।

दुदर्म इंद्रिगजों को विज्ञानपाश द्वारा शीलशाल में नियंत्रित करने का आदेश―हे कल्याणार्थी भव्य पुरुष, यदि अपने आपका सत्य विश्राम चाहिये हो तो यह कर्तव्य होगा कि दुर्गम इंद्रियरूपी हस्तियों का निर्णय करें। इंद्रिय का नियंत्रण किए बिना आत्मा की रक्षा न होगी। प्रकट क्लेश दिखता है इंद्रिय विषयों के भोग के प्रसंग में। किसी भी इंद्रिय के विषय का भोगोपभोग हो उस समय स्थिति क्या बनती है जीव की? उपयोग अपने से चलित है। बाहरी पदार्थों पर दृष्टि है और उस विषय के कारण विषय के भी आधीन हुए और विषय के आश्रयभूत बाह्य पदार्थ के भी आधीन हुए। मिला क्या? इसका पता पड़ता हे विषय के भोगोपभोग के पश्चात्। जैसे कोई रात भर खूब सिनेमा, थियेटर रूप की चीज कुछ भी देखे, रात भर जागता रहा, अब जब खतम हो गया, उसके बाद जो और तकलीफ होती है, प्रमाद आया, आँखे खराब हुई, जो कुछ भी बात होती है वह जानता है कि मिला तो कुछ नहीं और पीड़ा हो गई, इसी तरह सभी इंद्रियों के विषयों की बात है। विषयों के भोगने के समय भले ही वह चीज सस्ती मालूम होती है क्योंकि पुण्य का उदय हैं, समागम मिला है वह उसे सस्ता मालूम होता है, लेकिन कितना महंगा पड़ता है यह विषयसंबंध? देखिये विषयसंबंध से जन्म-मरण की परंपरा रहे, उस काल में भी आकुलता रहे, आगे पीछे बड़ा भय रहे, शंका में रहें, कितने अनर्थ की बात है। जो पुरुष इन विषय साधनों से दूर है और आत्मज्ञान में तृप्त रहा करता है, रक्षित तो वह पुरुष है। हे भव्य, यदि अपने आपकी रक्षा चाहिये तो स्वतंत्रता से विकार करने वाला जो यह इंद्रियरूपी हस्ती है उसको शीलरूप शाल के वृक्ष से विज्ञानरूपी रस्सों से बाँध। नियंत्रण करने के यहाँ दो आधार बताये गए हैं शील और विज्ञान। जैसे हाथी को नियंत्रित करना है तो उसके दो आधार हैं पेड़ और सांकल। ऐसे ही इन दुर्धर इंद्रियों को वश में करने के उपाय दो तत्त्व है― शील और ब्रह्मचर्य। मात्र ब्रह्मचर्य है वह भी एक धुन है फिर भी अलग-अलग ब्रह्मचर्य और तत्त्वज्ञान हो, इन दोनों में भी लाभ है, और जहाँब्रह्मचर्य और तत्त्वज्ञान का सुयोग है, मिलाप है उस जीव की तो रक्षा है ही। तत्त्वज्ञानी पुरुष को बाह्य पदार्थ या जीवों के संकोच दृष्टि नहीं होती। लोग मुझे क्या कहेंगे, इस प्रकार की चित्त में वासना नहीं रहती, किंतु में ठीक रहूँ, मेरी रक्षा रहे, में शुद्ध, मौज में रहूँ, बस यही धुन रहती है। यद्यपि कुछ दृष्टियों तक लोकलाज, लोकसंकोच भली बात है, उससे अनेक पाप दूर हो जाते हैं, लेकिन लोकलाज और लोकसंकोच के ही कारण जो पाप से दूर रहने की वृत्ति है वह एक अपने को कसने जैसी बात है, वहाँ प्रसन्नता से, निर्मलता से एक परमविश्राम में विहार वाली बात नहीं होती। यह परम विश्राम की बात मिलती है तत्त्वज्ञान से। इन इंद्रियों को शील के वृक्ष और विज्ञान की साँकल से बाँध दे तब मेरी रक्षा है।


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