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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 938

From जैनकोष



प्राग्मया यत्कृतं कर्म तन्मयैवोपभुज्यते।

मन्ये निमित्तमात्रोऽन्य: सुखदु:खोद्यतो जन:।।938।।

अन्य प्राणी को सुख दु:ख में निमित्तमात्र और अपने कर्त कर्म को हेय जानकर क्रोध न करने का ज्ञानी का यत्न― फिर भी विचार करते हैं जो मुझे ये दु:ख हो रहे हैं, विपत्ति क्लेश उपसर्ग आ रहे हैं तो मैंने पूर्व जन्म में कोई पाप कर्म किये होंगे उनका फल मुझे ही तो भोगना होगा। जैसे भी कर्म यह जीव पूर्वकाल में करता है उसका फल उसे भोगना पड़ता है यदि कोर्इ कष्ट आये तो इतना तो निश्चित है ही कि कर्मों की निर्जरा हो रही है, उन कर्मों की जिन पापकर्मों के उदय में यह विपदा आ रही है, तो इसमें मेरा बोझ ही तो हल्का हो रहा है और इसको उदाहरण से समझना हो तो एक बहुत प्रसिद्ध सिद्धांत है कि नारकी जीव मरकर उस भव के बाद नरक में नहीं जाता। क्यों नहीं जाता? वहाँ इतने क्लेश भोग रहे थे कि उसमें पापकर्म निरखते जा रहे थे। संक्लेश भी कर रहा है नारकी, किंतु कर्म अधिक निरख रहे हैं। इसके परिणाम में फिर नरक जैसी गति तुरंत नहीं मिलती। फिर नरक जाने के लिए मनुष्य या तिर्यंच बनना होगा और पापकर्म करने होंगे तब नरक गति में जन्म होगा। तो ऐसे ही समझ लीजिए कि हमें इस जीवन में कोर्इ कष्ट आते हैं, उपसर्ग होते हैं, विपदायें आती हैं तो यह भी भले के लिए हो रही है। हम वहाँ समता परिणाम बनाये कि जिससे आगामी काल के लिए विपदा न आये और वर्तमान में भी सब तीव्र पाप अथवा कठिन कष्ट थोड़े रूप में रहकर खिर जायें। विचार करते हैं संतजन कि मैंने पूर्व जन्म में भले अथवा बुरे जिस प्रकार के कर्म किये हैं उनका फल भोगना ही तो पड़ेगा। जो कोई भी हमें सुख दु:ख देने के लिए तत्पर हैं वे केवल बाह्य निमित्त मात्र हैं। बात तो सब मेरे करने के अनुसार हुई है अतएव मैं इन दूसरे जीवों पर क्यों क्रोध करूँ। जो बुरी स्थिति भी आये तो उसमें किसी दूसरे ने क्या किया? मैंने जैसे कर्म बाँधा वैसा उदय में आ रहा है। और, यह बात सही है कि जीवों को जितने भी सुख दु:ख होते हैं वे उनके कर्मानुसार होते हैं। समयसार जैसे अध्यात्मग्रंथ में भी स्वयं मूल रचयिता कुंदकुंदाचार्य और उनके टीकाकार अमृतचंद्रजी सूरि और जयसेनाचार्य ने भी यह बात स्पष्ट कर दिया कि कोई दूसरा पुरुष मुझे सुख अथवा दु:ख नहीं देता, किंतु जैसा जो कुछ कर्म है उसके अनुसार सुख अथवा दु:ख होता है। यहाँ ज्ञानी संत पुरुष ऐसा विचार रहे हैं कि पूर्व जन्म में जैसे भी कर्म किये हैं उनका यह उदय आ रहा है। उसमें मैं दूसरे पुरुष पर क्यों क्रोध करूँ। किसी दूसरे ने क्या किया मेरा। और, यह बात बिल्कुल सत्य है कि मेरा उदय खोटा न हो तो मुझे ऐसा क्लेश न होगा। खोटा उदय आये तो दु:ख में कोई निमित्त बन जाय। कोई भी दूसरा जीव मेरा बैरी नहीं है। दूसरा तो अपनी शांति के लिए अपने सुख के लिए अपनी चेष्टायें करता है, कोई मेरा कुछ नहीं करता, ऐसा चिंतन करके ज्ञानीपुरुष किसी दूसरे पर क्रोध नहीं करता।


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