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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 49

From जैनकोष



हिंसानृतचौर्येभ्यो मैथुनसेवापरिग्रहाभ्यां च ।

पापप्रणालिकाभ्यो विरति: संज्ञस्य चारित्रम् ।। 49 ।।

पापों से विरक्ति में ही आत्मा को महत्त्व का लाभ―पापभव आने की नालियां ये 5 हैं―(1) हिंसा, (2) झूठ, (3) चोरी, (4) कुशील और (5) परिग्रह । इनसे विरक्त होना सो सम्यग्ज्ञानी का चारित्र है । कोई यदि यह ही ठान ले कि मैं बिना प्रयोजन कोई अटपट काम न करूं तो भी इसके बहुत से पापों से निवृत्ति हो जायगी । लोग तो बिना ही प्रयोजन कितने ही पाप करते रहते हैं । प्रयोजन क्या? आपको आजीविका के परिणाम रहें यह ही एक लौकिक प्रयोजन है । पर बहुत देर तक गप्पें कर रहे, दूसरों की निंदा में उमंग आ रही है, दूसरों के दोष बताने में यह बड़े योद्धा की तरह बढ़ रहा है, दूसरे का बुरा विचार करने के लिए कमर कसे है, दुनिया में मेरी बड़ाई हो, सबसे मैं प्रधान माना जाऊं, इसके विकल्प में चित्त चल रहा है और दूसरे लोगों को तुच्छ माना जा रहा है । ये सब बिना प्रयोजन अटपट काम है । कोई पुरुष स्वच्छंद रहकर, आराम मौज में बसकर कोई संघर्ष न सहे, कोई संकट न सहे, किसी दूसरे के उपकार में न आये, खुदगर्जी अधिक रखे और वह लोक में बड़ा कहला सके, यह बड़ी कठिन बात है । अगर लौकिक बड़प्पन ही चाहे कोई तो वह परोपकार किए बिना, संघर्ष सहे बिना, न्यायनीति पर रहे बिना लोक में भी बड़ा नहीं बन सकता । लोक में जो बड़ा बनता है ना उड़द का उसकी ही बात देख तो, कितने-कितने संघर्ष सहने के बाद वह बड़ा कहलाता है । खेत में खड़ा है, पेड़ सूख गया, पहले तो उन्हें सुखाया, फिर उन पर बैल चलाया, फिर उनको चक्की में दला, याने कितने संघर्ष आये उड़द पर तब वह बड़ा कहला सका । शाम को पानी में भिगो दिया, रात भर फूले, सुबह उनको हाथ से मरोड़ा गया याने हाथ से उनकी खाल छुड़ा दी गई, फिर उन्हें सिलबट्टे में पीसा और पीसकर उनमें नमक, मिर्च, मसाला भुनकर फिर उनकी शकल बिगाड़ा, फिर उनको खौलते हुए तेल में डाला, जब वह फूल गया तो इतने पर भी उसका पीछा न छोड़ा, उसके पेट में एक लकड़ी चुभोया यह देखने के लिए कि कहीं कच्चा तो नहीं रह गया, फिर उसको कड़ाही में नमकीन पानी में डाल दिया । देखिये कितने-कितने संघर्ष आये उस उड़द पर तब उसका बड़ा नाम पड़ा । और यहाँ देखो लोग मुफ्त में मौज में ही बड़ा कहलवाना चाहते । जरा सा भी कष्ट नहीं सह सकते फिर भी बड़ा कहला सकें यह कैसे हो सकता? लोक में भी बड़ा बन सकते मगर उसकी भी धुन क्यों हो? वह तो होगा स्वयं अपने आपकी स्वरूपदृष्टि करके अंत: तो अपनी उपासना करिये और चूंकि जो ज्ञानी पुरुष हैं, भीतर में अपनी उपासना कर रहे हैं उनसे मन, वचन, काय की चेष्टा तो होगी ही ऐसी कि जिससे दूसरों का भला हो, किसी का अपकार न हो ।

स्वानुभूतिकला की प्राप्ति में आत्मकर्तव्य पालन की सुगमता―देखिये और बात तो सब जगह मिल जायगी दया, परोपकार, उपकार, जय-जय बोलना, जलूस निकालना आदि बातें तो सर्वत्र मिल जायेगी मगर सहजआत्मस्वरूप का अनुभव बनाये इस बात की शिक्षा देने वाला जैन शासन है, इसको पाकर यदि इस काम की उमंग न बना सके तो जिसे कि कहते धिक्कार है इस जीवन को, ऐसे ही समझ लीजिए आप लोग कि धिक्कार है मेरे जीवन को । यदि अपने आपके स्वरूप में बसे हुए भगवान सहज आत्मस्वरूप का परिचय न पा सके, इसकी धुन न बना सके, अपने आपका अनुभव न कर सके तो लोक में जो कुछ भी हो रहा है उससे क्या फायदा? यदि एक यही काम कर लिया तो उससे सब पाप कर्म दूर हो जायेंगे । देखिये एक तो होता है सिखाये-सिखाये व्रत पालन और एक होता है भीतर के सहज आत्मस्वरूप के अनुभव की कला जगने का व्रत पालन । यदि अपने आपके स्वरूप के अनुभव की कला किसी में जग जाय तो फिर उसे अधिक उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती । स्वयं ही यह भगवान आत्मा सब निर्णय बना लेगा । तो अपने आपका एक निर्णय कीजिए, धुन बना लीजिए कि हम को तो इन रागद्वेष मोहादिक विकारों से हटना है, और इनसे हटने के लिए तन लगे, मन लगे, धन लगे, वचन लगे, सर्वस्व अर्पित करने को तैयार रहें । यदि इन रागद्वेष मोहादिक विकारों से हट गए तो समझो कि हमने सर्वस्व पाया ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
  • प्रवचन
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