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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 50

From जैनकोष



सकलं विकलं चरणं, तत्सकलं सर्वसंगविरतानाम् ।

अनगाराणां विकलं, सागाराणां ससंगानाम् ।। 50 ।।

चारित्र के दो भेदों में प्रथम चारित्र सकलचारित्र के अधिकारी―चारित्र दो प्रकार का होता है―(1) सकल चारित्र और (2) विकल चारित्र । सकल मायने संपूर्ण और विकल मायने कुछ कम । सकल चारित्र तो होता है सर्व परिग्रहों से रहित साधुजनों के और विकल चारित्र होता है परिग्रह सहित श्रावकजनों के । श्रावकों के पास परिग्रह न हो तो श्रावकों की चर्या नहीं चल सकती और साधुओं के पास परिग्रह हो तो साधुओं की चर्या नहीं चल सकती । इस कारण श्रावकों को तो बताया है सत्संग और साधुओं को बताया है निसंग । श्रावकों को दूसरा नाम दिया है सागार याने अगार सहित, घर सहित । और साधुवों का नाम है अनगार अर्थात् अगार रहित, घर रहित । संपूर्ण चारित्र क्या कि उपयोग आत्म स्वरूप में भले प्रकार लीन बन सकें, सो यह उनके ही संभव है जिनके तिलतुष मात्र भी कुछ परिग्रह नहीं, क्योंकि एक पूर्ण रीति से आत्मा-आत्मा में समाये, ज्ञान में ज्ञान समाये यह तब ही संभव है जबकि किसी प्रकार का अंतरंग में संकल्प न जगे, विकल्प न बने । विकल्प न बने उसका मुख्य साधन तो है तत्त्वज्ञान, आत्मपरिचय, आत्मा की धुन और बाह्य वातावरण चाहिए उसे ऐसा कि किसी भी पदार्थ का विकल्प न आना । सर्वपरिग्रहों से रहित साधु हो तो केवल एक ही धुन होती है और यही धुन रहना चाहिए कि मेरे को सहज भगवान के दर्शन, अनुभव बना रहे । आत्म का जो सहज ज्ञानस्वरूप है उसे में ही उपयोग बना रहे अधिकाधिक । केवल यह ही काम है साधुजनों का । समाज व्यवस्था या अन्य-अन्य प्रकार के कर्त्तव्य ये साधुजनों के कर्त्तव्य नहीं किंतु मेरे आत्मा का मुझ में अनुभव बना करे, रहा करे, बस यह ही एक उनका काम है क्योंकि साधुपना हुआ करता है मोक्षमार्ग के लिए, मैं निकट काल में मुक्ति प्राप्त करूं, ऐसी जिसकी दृढ़ भावना बनी है वह निशंक होकर आत्मा-आत्मा की ही दृष्टि में रहेगा ऐसे साधुजनों के सकल चारित्र होता है ।

ससंग गृहस्थों के विकल चारित्र नामक द्वितीय चारित्र की संभवता―गृहस्थ जनों के चूँकि भोजन का साधन तो धनार्जन है । पैसा पास होगा तो भोजन का साधन बना लेंगे । साधुवों ने तो आहार आदिक की आशा का ही त्याग कर दिया । जब कभी चर्या को निकले तो भक्तिपूर्वक जिसने बुलाया वहाँ आहार कर लिया । अब उनको धनार्जन की जरूरत नहीं रही और इसी कारण वे सर्वथा नि:संग रह पाते हैं मुख्य समस्या तो भोजन की है । सो गृहस्थजनों का काम धनार्जन के बिना न चलेगा । उन्होंने घर बसाया ही है इसलिए कि हम पूर्ण शील ब्रह्मचर्य धारण नहीं कर सकते तब अन्य पापों में तो न लगना―वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, अटपट विचार इनमें तो न लगना । इनसे तो बचना, इस भाव से उन्होंने विवाह किया कि मेरे अन्य पाप तो बच जायें । गृहस्थ की जो प्रवृत्ति है उसमें पाप से बचने के लिए प्रवृत्ति है । पाप में लगने के लिए नहीं । तो जब एक घर बसाया तो मकान भी चाहिए, कमायी भी चाहिए, इसके लिए गृहस्थजनों का परिग्रह रखना आवश्यक हो जाता है । मगर ज्ञानी गृहस्थ की भीतरी मंशा यह है कि मैं कब परिग्रह से विरक्त हो जाऊं और एक केवल निज आत्मतत्त्व के ध्यान में रहूं । अगर यह भाव नहीं है गृहस्थ का तो श्रावक नहीं, सद्गृहस्थ नहीं । जो परिग्रह रखा है वह पकड़ने के लिए नहीं रखा है । केवल गुजारे के लिए रखा है? और लक्ष्य है गृहस्थ का कि अविकार निसंग ज्ञानस्वभाव निज अंतस्तत्त्व में मेरा उपयोग लीन होवे । यदि श्रावकजनों का ऐसा नियंत्रण न हो, 6 आवश्यक कर्तव्यों का कार्य न हो तो ये गृहस्थ तो अत्यंत उद्दंड और स्वच्छंद हो जायेंगे, फिर ये धर्म के पात्र ही नहीं रह सकते । तो गृहस्थजन ससंग रहते है और इसी कारण उनके संपूर्ण चारित्र नहीं बन सकता, फिर भी जितना चारित्र बन सकता है, उसमें भी जो उत्कष्ट श्रावक हैं उनके और अधिक बन सकता है । जितना संभव है उतना चारित्र पालते हैं इस कारण गृहस्थों के चारित्र का नाम है विकल चारित्र ।

सद्गृहस्थ की न्यायमार्गानुसारिता―सद्गृहस्थ परिग्रहसहित तो है पर न्यायमार्ग का उल्लंघन नहीं करता । गृहस्थ की यह तारीफ है । बड़ी से बड़ी कुर्बानियां कर देगा, न्याय मार्ग का उल्लंघन न करेगा । जो महापुरुषों की प्रशंसा की जाती, श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा, और-और भी सेठ और राजाओं के कथानक हैं । किस बातपर उनकी प्रशंसा हैं कि उन्होंने न्याय नीति का उल्लंघन नहीं किया । जो न्याय नीति का उल्लंघन कर दे उसमें और पशु में अंतर क्या रहा? न्याय मार्ग को गृहस्थ कभी नहीं छोड़ता । ऐसे गृहस्थ के विकल चारित्र होता है । श्रावक पाप से भयभीत रहता है । मेरे से पाप मत बनो । लेकिन जहाँ अज्ञान का फैलाव होता वहाँ पाप का डर नहीं रहता । पाप का डर न रहा तो लोगों ने अपने नाम भी पाप धरा लिया । पाप का अर्थ है पाप करने वाला । यहाँ तो लोग पापा नाम धराकर खुश होते । सद्गृहस्थ पाप से भयभीत रहते है, देव द्रव्य, धार्मिक द्रव्य को तो छूने में भी पाप मानते । पहले जमाने के लोगों में यह बात थी कि अगर धर्म का पैसा गिनना पड़े तो उसे गिनकर रख दिया, बाद में हथ जोड़ते थे । इतना पाप का भय था । ब्लेक वगैरह के शब्द ही पहले कहां थे, सब न्याय मार्ग के अनुसार चलते थे, शांत वृत्ति से रहते थे । आज कुछ समय है, कुछ मन की स्वच्छंदता है जिसके काले न्यायमार्ग बहुत कम रह गया है, पर जो सद्गृहस्थ है वे न्याय मार्ग का उल्लंघन नहीं करते । उन्ही के एक देश चारित्र होता है । गृहस्थ भी मोक्ष मार्ग में है, मुनि भी मोक्ष मार्ग में है, मुनि जरा आगे बढ़ा हुआ है, गृहस्थ कुछ पीछे-पीछे चल रहा है, पर कोई मुनि होकर आत्मदृष्टि न कर सके और गृहस्थजनों जैसा आराम चाहे तो वह मुनि मोक्ष मार्ग में नहीं है और गृहस्थ धन धान्य कुटुंब परिजन आदि के बीच रहकर भी उनसे हटना चाहता है और अपने एकाकी आत्मस्वरूप में रमना चाहता है तो वह गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है । धर्म एक बहुत जिम्मेदारी के निभाव की चीज है । गृहस्थ धर्म में रहकर कितने अंश धर्मपालन किया जा सकता है वह भी एक आदर्श बात है । वह गृहस्थ का चारित्र इस ग्रंथ में मुख्यतया बताया जायगा, उसी के संबंध में एक संक्षेप से उसका चारित्र अगले छंद में कह रहे हैं ।


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  • रत्नकरंड श्रावकाचार
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