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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 51

From जैनकोष



गृहिणां त्रेधा तिष्ठ त्यणुगुणशिक्षाव्रतात्मकं चरणम्।

पंचत्रिचतुर्भेदं, त्रयं यथासंख्यमाख्यातम्।। 51 ।।

गृहस्थों के अष्टमूलगुण का अनिवार्यतपना व बारह व्रतों का पालन―गृहस्थों का चारित्र अणुव्रत, गुणव्रत, शिक्षाव्रत इन तीन प्रकारों में चलता है । 5 अणुव्रत होते है, तीन गुणव्रत हैं, और चार शिक्षाव्रत है । अणुव्रत का अर्थ है छोटा व्रत । गृहस्थ पूरी हिंसा का त्याग नहीं कर सकता मगर बहुत कुछ हिंसा का त्याग किया है । पूर्ण सत्य तो नहीं बोल पाता मगर उसने बहुत असत्य का त्याग किया है । पूरे रूप से चोरी का त्याग तो नहीं बन पाता मगर लोक में जनता को कष्ट देने वाली ऐसी चोरी गृहस्थ नहीं करता । पूर्ण ब्रह्मचर्य का निभाव तो गृहस्थ के नहीं हो पाता फिर भी अपनी स्त्रीमात्र में संतोष करके शेष समस्त परस्त्री वेश्या आदिक सर्व का पूर्ण रूप से त्याग बना हुआ है । परिग्रह का त्याग तो नहीं कर पाता मगर परिग्रह के त्याग की भावनायें हैं, और परिग्रह का परिमाण कर लेते हैं, इससे अधिक परिग्रह नहीं रखना, इस प्रकार गृहस्थ बारह व्रतों का पालनहार होता है । चूँकि गृहस्थ गृहवास छोड़ने में असमर्थ है और धर्म की धुन में बना हुआ है, सम्यग्ज्ञान है इस कारण वह इस परिस्थिति में बारह व्रतों का पालन करता है । गृहस्थ के 8 तो मूल गुण कहलाते और 12 उत्तर गुण कहलाते, जिन मूल गुणों के पाले बिना मुनि-मुनि नहीं रह सकता, उत्तर गुण पालने में चाहे न आये, पर मूल गुण पूरे होने ही चाहिए । यदि 8 मूल गुण नहीं हैं तो वह श्रावक नहीं है, अन्य जनों की तरह वह भी साधारण लौकिक पुरुष है । उसके चाहे बारह व्रत न हो पायें किंतु 8 मूल गुण तो अवश्य ही होने चाहिए । श्रावक के ये 8 मूल गुण हैं मद्य मांस मधु का त्याग, 5 उदंबर फलों का त्याग, ये 8 मूल गुण किसके लिए है? कोई शूद्र हैं, अन्य जन हैं, जो धर्म मार्ग में जरा भी नहीं आये हैं उनके लिए है ये 8 मूलगुण, और जो उच्च कुल में उत्पन्न हुए है । जैन कुल में जन्म लिया है उनके 8 मूल गुण और तरह के हैं । ये बहुत छोटे दर्जे के लिए है, अथवा कहो घर में बच्चा हुआ है, अबोध है तो 8 वर्ष की उम्र तक माता पिता पर उसके धर्मपालन का भार रहता है, ऐसों के लिए कह दीजिए 8 मूल गुण, पर जो उच्च कुल में जन्में हैं उनके लिए 8 मूल गुण ये हैं―मद्य, मांस, मधु का त्याग, उदंबर का त्याग, जितने उदंबर हैं उन सबको एक में लिया है । चार ये हैं और चार हैं―देव दर्शन, रात्रि भोजन का त्याग, जल छानकर पीना और जीव दया करना । ये 8 मूल गुण है उनके लिए जो लोग अच्छे कुल में उत्पन्न हुए ।

श्रावक के आठ मूल गुणों में देवदर्शन, रात्रि भोजनत्याग व जलगालन का निर्देशन―देव दर्शन में जहाँ मंदिर हो वहाँ मंदिर में दर्शन करें । मंदिर अधिक दूर हो, या हो ही नहीं, या कहीं बाहर परदेश गए हुए हैं वहाँ मंदिर नहीं हो तो ध्यान कर लें स्तुति विनती वगैरह कर लें, जाप जप लें । इसमें ही देवदर्शन की बात निभ जायगी । जहाँ हो मंदिर निकट वहाँ मंदिर आकर धर्मसाधना करें । रात्रि भोजन त्याग में जल और औषधि के सिवाय बाकी कोई चीज रात्रि में न लेना । उसमें यह विकल्प नहीं है कि हमारा काम नहीं चलता तो रात्रि में दूध चाय रख लिया या अन्न की चीज रात्रि में न लें तो उसकी जगह किसमिस, काजू, बादाम, मिठाई आदि रख लें । अरे रात्रि को अगर कुछ लेना ही पड़े तो जल और औषधि रख लो । गुजारे के लिए यही काफी है । अब यदि किसी से न बन पाये तो यह उनके मन की बात है । जो जितना करता उतना ठीक है मगर हिसाब से तो इसमें कम नहीं बताया गया । क्योंकि एक होती है प्यास की वेदना, वह सही नहीं जा पाती तो उसके लिए जल बता दिया । एक होती है रोगों की पीड़ा नहीं सही जाती तो औषधि रख लो । अब और तीसरी चीज की जरूरत क्या रही सो तो बताओ? दिन भर खा खाकर गुजारा न चलेगा क्या? चलेगा, तभी तो कोई तीसरी चीज नहीं बतायी गई । यह बात कह रहे हैं उनकी जो व्रती श्रावक नहीं है, उनकी, जो 8 मूलगुण धारे उनकी । जल छानकर पीना । जल में ऐसे त्रस जीव भी होते है जो आपको आँखों न दिखे । दूसरी बात―दो मत है इस संबंध में कि दुहरे गाढ़े छन्ने से छानने पर जल काय का जीव भी नहीं रहता, दूसरा मत है कि जलकाय का जीव तो रहता है एकेंद्रिय, पर अन्य त्रस जीव नहीं रहते । तो मानो दुहरे गाढ़े छन्ने से छानने पर 48 मिनट को ही अचित्त मान लिया जाय जल तो देखिये अहिंसा का कितना पालन हुआ । अथवा सूक्ष्म त्रस जीव न आ सकें तो अहिंसा का वहाँ भी पालन हुआ । पानी छनता नहीं है कभी । जैसे कोई कहे कि छन्ने से छान लो, तो जैसे लोहे की बहुत बारीक जाली आती है उस जाली से घी छानते वैसे ही गाढ़े कपड़े से पानी छाना तो बताओ पानी छना क्या? नहीं छना । अरे यदि कोई गाढ़े के सूखे छन्ने से जल छानना चाहे तो न छनेगा । हां जब वह छन्ना पानी से भीग जायगा, उस छन्ने के सब छिद्र पानी से बंद हो जायेंगे तब कहीं वह पानी उस छन्ने से चू-चूकर गिरेगा । इस कारण जिन आचार्यों का यह मत है कि कपड़े से छानने पर उसमें जलकाय का भी जीव नहीं रहता, यह भी ठीक हो सकता, अथवा जो चूसकर पानी निकला वहाँ सूक्ष्म से सूक्ष्म त्रस जीव नहीं आ सकते, इसलिए बताया है गाढ़े छन्ने से छानना । उसमें कोई यह शंका न करे कि अगर गाढ़े छन्ने से छाना गया तो पानी कैसे निकलेगा? याद रहे पानी कभी छिद्रों से नहीं निकलता, जब वह छन्ना भीग जाता तो उसमें से पानी चूकर निकलता है । तो जल छानकर पीना, यह 8 मूल गुणों में भी है । कभी किसी पानी में यह दिखे कि इसमें तो त्रस जीव दिखते ही नहीं, बिल्कुल साफ पानी है, जैसे हैंडपाइप से पानी निकाला गया तो वह यद्यपि देखने में साफ है फिर भी उसको छानकर पीने की आज्ञा है । चाहे कितना ही साफ जल हो फिर भी छानकर पीना यह 8 मूल गुण में से है ।

सद्गृहस्थ की सदयता व सदाचार के कारण विश्वासपात्रता―अष्ट मूलगुणों में एक है जीवदया । कोई राजा या बड़ा पुरुष कहे कि मैं आपको एक हजार रुपया दूंगा, तुम इस चींटी को मार दो, तो वह उस चींटी को नहीं मार सकता । जो अष्टमूल गुणधारी है । श्रावक है उसका हृदय ऐसा जीवदया से भरा है कि क्लेश में, लालच में, किसी भी परिस्थिति में जीव को नहीं मार सकता । एक जगह की घटना है कि कुछ लोगों ने राजा से कहा―महाराज ! जैन लोग जीव हिंसा नहीं करते, तो राजा को उनकी परीक्षा करने का विचार हुआ । उसे कोई जैन दिखा, वह कहीं जा रहा था तो उसे अपने पास बुलवाया । वहीं खड़ी थी कोई बकरी, तो राजा बोला―उस बकरी को यहाँ पकड़ लावो । फिर दिया छुरी और कहा कि अब इस बकरी का गर्दन छुरी से काट दो, तो वह जैन बोला―महाराज ! यह काम तो हम से नहीं हो सकता । राजा ने बहुत-बहुत कहा पर वह जैन अपनी बात पर अत्यंत दृढ़ रहा । उसकी दृढ़ता देखकर राजा बोला―हमने जो बात जैन लोगों के संबंध में सुना था कि वे हिंसा नहीं करते तो यह बात बिल्कुल ठीक है । आज बहुत से जैन लोग अपने आचरण से गिर गए, जब जैसा मौका देखा तब तैसा कर डाला । पर था कभी एक ऐसा जमाना कि लोग जैनियों पर बड़ा विश्वास करते थे । अगर किसी जैन ने कहीं गवाही दे दिया तो उसकी बात सही मानकर निर्णय दे दिया जाता था । आज भी कुछ-कुछ तो विश्वास है जैनियों पर तभी तो बैंकों के खजांची अधिकतर जैन लोग मिलते हैं, विश्वास लोगों को अब बहुत कम हो गया । जैन लोग स्वयं अपने आचरण से गिर गए, अपने आचरण में उन्हें दृढ़ता नहीं रही फिर भी अन्य समूह से आज भी अच्छे है । जैन लोग मांस, अंडा, शराब आदि नहीं खाते पीते । अधिकांश लोग तो अच्छे आचरण वाले अब भी मिलेंगे मगर पूर्ण रूप से यह बात होती तो आज कितनी प्रभावना और प्रशंसा होती । आचरण में दृढ़ता न होने से बड़ी अस्थिरता हो जाती है जीवन तो एक बार के खाने से भी चल जाता है । दो बार खा लिया जाय अब कौनसी कमी रह गई जो रात्रि को खाना ही पड़े? अनेकों बार खाया, रात्रि में खाया तो खा खाकर स्वास्थ्य बिगड़ गया, मन खराब हो गया, दृढ़ता न रही, मन का संकल्प भी लघु हो गया । तो जो अष्ट मूल गुण बतलाये गए हैं, जिनको अपना भला चाहिए उन्हें इन अष्ट मूल गुणों का पूर्ण पालन करना चाहिए ।

गृहस्थ के बारह व्रतों का प्रतिपादन―गृहस्थ के अणुव्रत कहा गया है । पूर्ण त्याग नहीं बन सकता । और इस अणुव्रत की रक्षा के लिए गुणव्रत बताये गए । गुणव्रत स्वतंत्र कोई मूल बात नहीं है । कोई कहे कि हम अणुव्रत का पालन तो न करेंगे और गुणव्रत धारण कर लेंगे सो ऐसा नहीं होता । जिसने अणुव्रत धारण किया है । 5 पापों का एक देश त्याग किया है वे पापों के त्याग के पूर्ण निभाव के लिए इन तीन गुण व्रतों का पालन करते हैं―(1) दिग्व्रत (2) देशव्रत और (3) अनर्थ दंडवत । यावज्जीव जाने आने के व्यवहार का परिमाण कर लिया कि हजार मील तक चारों ओर संबंध रखेंगे । इससे आगे नहीं, तो उससे बाहर की हिंसा का तो त्याग हो गया । फिर भी कुछ समय की म्याद लेकर और थोड़ा क्षेत्र रख लेते है । और निष्प्रयोजन जिन पापों का त्याग नहीं हो पाता गृहस्थी में उन पापों को भी गृहस्थ नहीं, करता यह गुणव्रत है । और यह गृहस्थ मुनि धर्म की शिक्षा पाने के लिए 4 शिक्षा व्रतों को लेता है । गुण व्रत से तो होता है अणुव्रत का पूर्ण पालन और शिक्षा व्रत से होता है मुनि बनने का अभ्यास । जैसे तीन बार समता परिणाम करना, सामायिक करना मुनि को तो सदैव हो जाता है, उनके रागद्वेष का भाव ही नहीं होता, तो गृहस्थ सोचता है कि मैं ऐसा नहीं कर पाता तो दो समय तो करूँ । प्रोषधोपवास प्रौषधपूर्वक उपवास करना, यह सब आगे आयगा, वह सप्तमी, अष्टमी, नवमी को शाम को कुछ नहीं लेता, एक ही बार लेगा, यह जघन्य- प्रोषधोपवास है । अष्टमी को केवल पानी ले यह मध्यम प्रोषधोपवास है और अष्टमी को कुछ न ले तो यह उत्तम प्रोषधोपवास है । यहाँ शिक्षा मिली है कि सप्तमी, अष्टमी और नवमी को तीनों दिन वह सद्गृहस्थ कुछ नहीं लेता, पर मुनि तो कभी भी दूसरी बार कुछ नहीं लेता, तो उस मुनि का अभ्यास गृहस्थ भी महीने में 12 दिन करता है । ऐसे ही भोगोपभोग के प्रकरण में अतिथि संविभाग व्रत की बात है ।


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