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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 32

From जैनकोष



जिण्णुद्धार-पइट्ठा-जिणपूया-तित्थवंदण-सेसधणं।

जो भुंजइ सो भुंजइ जिणुद्विट̖ठं णिरयगइ दुक्खं।।32।।

   जीर्णोद्धार, प्रतिष्ठा व जिन पूजा के शेष धन को भोगने वालों की दुर्गति―पात्रदान के प्रकरण के बाद कुछ और स्फुट शिक्षायें दी जा रही हैं। जो लोग जिन मंदिर के जीर्णोद्धार, प्रतिष्ठा, जिन पूजा, क्षेत्र का बचा हुआ या बचाया हुआ धन भोगता है वह नरक गति के दुःखों को भोगता है। जीर्णोद्धार का शेष धन है, जीर्णोद्धार के लिए एकत्रित है, जीर्णोद्धार की व्यवस्था चल रही है उसमें जो कोई मुख्य हो या जो कार्यकर्ता है या जिसके पास उसकी रक्षा में सौंपा गया है उसमें से शेष धन याने पूरा तो कोई नहीं भोगता, कुछ तो लगाया ही जाता है, पर कुछ भोगने में लगाता है तो इसे यहाँ बड़ा पाप बताया गया है भाव की अपेक्षा। भाव उसके दूषित हुए हैं। उसको अपने आप में चोर का जैसा अनुभव होता है और उसकी भावना कुछ गिर जाती है, इस कारण पाप का बंध हैं। दूसरा―जिन प्रतिष्ठा जीर्णोद्धार के नाम से लोगों ने धर्मबुद्धि से दान किया है तो उसका कोई पुरुष कर्मचारी मुनीम या कार्यकर्ता जो भी उसके अवशेष धन को भोगता है, कहते हैं कि वह नरक गति के दुःखों को भोगता है, ऐसा जिनेंद्र देव ने बताया है। प्रतिष्ठा में जैसे मंदिर प्रतिष्ठा या पंचकल्याणक प्रतिष्ठा ऐसा कोई बड़ा समारोह होता है तो उनमें धन का संचय होता है खर्च के लिए, अनेक लोग देते हैं भक्ति भाव से, उसका प्रबंध है। उसमें कोई सवैतनिक लोग या अवैतनिक लोग कुछ अवशेष धन को भोगे जो बताया है कि वह पाप है और वह नरक गति के दुःख को भोगता है। जिन पूजा या कोई विधान होना हो या रोज की पूजा कर प्रबंध है उसके अवशेष धन को जो भोगता है वह पाप है।
   तीर्थ वंदना के शेष धन को भोगने वालों की दुर्गति―तीर्थ वंदना―तीर्थों की वंदना कराने के लिए अनेक लोग सामूहिक रूप से प्रबंध करते हैं जिसमें यह प्रसिद्ध करते हैं कि तीर्थ वंदना के लिए जा रहे हैं जो खर्च होगा सो ही लिया जायगा और उसमें का कोई धन बचे और उसे भोगे तो बतलाया कि वह पाप है अथवा वंदनीय तीर्थों का प्रबंध है, क्षेत्रों का प्रबंध है, क्षेत्रों पर भक्त लोग दान करते ही हैं। उसके शेष धन को जो भोगता है वह पाप है। बहुत से लोग तो जब उन पैसों को गिनकर खर्च करते थे तो गिन चुकने के बाद अपने हाथ तक भी धोते थे। इस बात को तो वृद्ध लोग हैं वे जानते होंगे। इस तरह का एक भाव था कि एक पैसा भी इसमें का कोई भूल से हमारी और न रह जाय। यह कहलाता है धर्मार्थ का द्रव्य, उस द्रव्य को जो हरता है, भोगता है वह दुर्गति का दुःख भोगता है।


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