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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रयणसार - गाथा 33

From जैनकोष



पुत्त-कलत्तविदूरो दालिद̖दो पंगुमूक बहिरंधो।

चांडालाइकुजाई पूयादाणाइ दव्वहरो।।33।।

   पूजा दानादि के द्रव्य को हरने वालों की दुर्गति―जो पूजा दान आदि के द्रव्यों को हरने वाले हैं वे पुत्र स्त्री से रहित होते हैं, दरिद्री, लंगड़े, लूले होते हैं, बहिरे, अंधे और चांडाल आदिक तुच्छ जाति में उत्पन्न होते हैं। यहाँ द्रव्य हरने के प्रसंग में उसके भाव का पतन होता है और उन भावों के पतन से उसे पाप होता है। जो ज्ञानी पुरुष हैं विवेकी हैं वे इस तथ्य को जानते हैं कि इन जीवन में क्या कर्तव्य है? धनसंचय करके रख जाना इसका क्या परिणाम होगा और अनीति से धर्म के द्रव्य में से अवशेष को भोगना इसका क्या परिणाम है। जीवन किसलिए है? जीवन है यह आत्मसाधना के लिए। अनादि से अब तक अनेकों का संग इस जीव ने पाया। राजा भी हुआ, सेठ भी हुआ, देवगति में भी गया और भी अनेक बड़ी संपन्नतायें पाया मगर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र नहीं पाया, उसका प्रमाण यह है कि अब तक संसार में जन्म मरण कर रहा है। रत्नत्रय का लाभ होने पर ये जन्म मरण नहीं रहते। अपने आत्मा का विश्वास हो, मैं आत्मा सहज अविकार ज्ञानमात्र स्वरूप हूँ। इसका बाहर में कहीं कुछ नहीं है। ये सभी पदार्थ धन दौलत मकान परिजन, सभी के सभी वे अपनी सत्ता में हैं, मेरी सत्ता से उनका कोई संबंध नहीं। अज्ञान अंधेरा जब छाया हुआ है तो अपने आपका प्रकाश नहीं मिल पाता और भाव भी नहीं जगता कि मैं अपने आत्मा का स्वरूप जानूं जिसमें हित है उसको समझें ऐसी रुचि तक भी नहीं होती है, जिसमें मिथ्यात्व का तीव्र उदय है, मोह विभ्रम जिस पर छाया हुआ है वह पुरुष भले ही कुछ संपदा के मिलने से कुछ गर्व आये, कुछ मौज सा माने, पर ये सब इस जीव के अहित की बातें हैं। बाह्य पदार्थ (धन संपदा आदि से) जीव को सुख नहीं हो सकता। सुख का कारण है संतोष। सुख का मूल साधन है आत्मा के सहज स्वरूप का परिचय। जो सुख का हेतु है शांति का कारण है उससे तो है अरुचि और जो संसार में भ्रमाने का कारण उसमें है इसकी रुचि। तो यह कैसे शांति पा सकता है। जिसमें आत्मसाधना की रुचि बनी है, इस दुःखमय संसार से छुटकारा पाने की भावना हुई है उस पुरुष से अन्याय नहीं हो सकता, धर्म के विरुद्ध चलने की उसमें उमंग नहीं हो सकती। तो जो विवेकी पुरुष हैं वे अपने धर्मायतनों को बिगाड़ते नहीं हैं। वे अवशेष धन को भोगते नहीं हैं। यहाँ बतला रहे हैं कि जो पूजा दान आदि के द्रव्य को हरता है वह मोक्षसुख तो दूर रहो, संसार के जो सुख माने जाते हैं, पुत्र, स्त्री, मित्रादिक का होना, स्वस्थ होना, उत्तम जाति में उत्पन्न होना, आदि ये सब उसके नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् पूजा दान आदि के द्रव्य के हरण से वह पुरुष पुत्र स्त्री से हीन रहता है दरिद्री रहता, गूंगा रहता, बहिरा अंधा रहता और निम्न कुल में उत्पन्न होता है।


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