वे कोई निपट अनारी, देख्या आतमराम

From जैनकोष

वे कोई निपट अनारी, देख्या आतमराम
जिनसों मिलना फेरि बिछुरना, तिनसों कैसी यारी ।
जिन कामोंमें दुख पावै है, तिनसों प्रीति करारी ।।वे. ।।१ ।।
बाहिर चतुर मूढ़ता घरमें, लाज सबै परिहारी ।
ठगसों नेह वैर साधुनिसों, ये बातैं विसतारी ।।वे. ।।२ ।।
सिंह दाढ़ भीतर सुख मानै, अक्कल सबै बिसारी ।
जा तरु आग लगी चारौं दिश, वैठि रह्यो तिहँ डारी ।।वे. ।।३ ।।
हाड़ मांस लोहूकी थैली, तामें चेतनधारी ।
`द्यानत' तीनलोकको ठाकुर, क्यों हो रह्यो भिखारी ।।वे. ।।४ ।।