सब जगको प्यारा, चेतनरूप निहारा

From जैनकोष

सब जगको प्यारा, चेतनरूप निहारा
दरव भाव नो करम न मेरे, पुद्गल दरव पसारा।।सब. ।।
चार कषाय चार गति संज्ञा, बंध चार परकारा ।
पंच वरन रस पंच देह अरु, पंच भेद संसारा ।।सब. ।।१ ।।
छहों दरब छह काल छहलेश्या, छहमत भेदतैं पारा ।
परिग्रह मारगना गुन-थानक, जीवथानसों न्यारा ।।सब. ।।२ ।।
दरसन ज्ञान चरन गुनमण्डित, ज्ञायक चिह्न हमारा ।
सो%हं सो%हं और सु आैंरे, `द्यानत' निहचै धारा ।।सब. ।।३ ।।