हम तो कबहुँ न निज घर आये

From जैनकोष

हम तो कबहुँ न निज घर आये ।
परघर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये ।।हम तो. ।।
परपद निजपद मानि मगन ह्वै, परपरनति लपटाये ।
शुद्ध बुद्ध सुख कन्द मनोहर, चेतन भाव न भाये।।१ ।।हम तो. ।।
नर पशु देव नरक निज जान्यो, परजय बुद्धि लहाये ।
अमल अखण्ड अतुल अविनाशी, आतमगुन नहिं गाये।।२ ।।हम तो. ।।
यह बहु भूल भई हमरी फिर, कहा काज पछताये ।
`दौल' तजौ अजहूँ विषयनको, सतगुरु वचन सुनाये।।३ ।।हम तो. ।।