चक्र

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. सनत्कुमार स्वर्ग का प्रथम पटल–देखें स्वर्ग - 5.3;
  2. चक्रवर्ती का एक प्रधान रत्न–देखें शलाका पुरुष - 2;
  3. धर्मचक्र–देखें धर्मचक्र


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पुराणकोष से

(1) चक्रवर्ती के चौदह रत्नों में एक अजीव रत्न । यह सेना में दंडरत्न के पीछे चलता है । इसकी एक हजार देव रक्षा करते हैं । इसके स्वामी के कुटुंबी इससे अप्रभावित रहते हैं । यह नारायण और प्रतिनारायण का आयुध है । इससे नारायण का वध नहीं होता, प्रतिनारायण का होता है । इसमें एक हजार आरे रहते हैं । राम-रावण युद्ध में तथा कृष्णा-जरासंध युद्ध में इसका व्यवहार हुआ था । महापुराण 6.103, 12.208, 28.3, 29.4, 34.26, 36.66, 37. 82-85, 44.180, पद्मपुराण 58.34, 75.44-60, हरिवंशपुराण 52-83-84

(2) सानत्कुमार और माहेंद्र स्वर्ग के सात इंद्रक विमानों में सातवां इंद्रक विमान । हरिवंशपुराण 6.48


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