सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया

From जैनकोष

(राग सोरठ)
सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया ।।टेक ।।
टुक विश्वास किया जिन तेरा, सो मूरख पछताया ।।
आपा तनक दिखाय बीज१ ज्यों, मूढमती ललचाया ।
करि मद अंध धर्म हर लीनौं, अन्त नरक पहुँचाया ।।१ ।।सुनि. ।।
केते कंत किये तैं कुलटा, तो भी मन न अघाया ।
किसही सौं नहिं प्रीति निबाही; वह तजि और लुभाया ।।२ ।।सुनि. ।।
`भूधर' छलत फिरै यह सबकों, भौंदू करि जग पाया ।
जो इस ठगनी कों ठग बैठे, मैं तिनको सिर नाया ।।३ ।।सुनि. ।।